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Britannia का '100% होल व्हीट ब्रेड' का दावा झूठा, 1 लाख के मामूली जुर्माने पर एक्सपर्ट्स ने उठाए गंभीर सवाल

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज पर उसकी "100% होल व्हीट ब्रेड" (पूरे गेहूं की ब्रेड) की पैकेजिंग के दावों को लेकर गुमराह करने वाले विज्ञापन के लिए 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

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ब्रिटानिया ब्रेड मामला

ब्रेड जैसे रोजमर्रा के खाद्य उत्पाद खरीदते समय उपभोक्ता अक्सर पैकेट पर लिखे दावों के आधार पर फैसला लेते हैं। खासकर जब किसी उत्पाद को '100% होल व्हीट' या 'Zero Maida' बताया जाता है, तो उपभोक्ता को लगता है कि वह अपनी सेहत को ध्यान में रखते हुए बेहतर विकल्प चुन रहा है। लेकिन एफएमसीजी सेक्टर की दिग्गज कंपनी ब्रिटानिया जब लोगों के साथ धोखाधड़ी करें तो आम जनता क्या करें। दरअसल, ब्रिटानिया के '100% Whole Wheat Bread' के दावे को केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने सही नहीं पाया है।

प्राधिकरण की जांच में सामने आया कि संबंधित ब्रेड में होल व्हीट फ्लोर यानी आटे की मात्रा कुल उत्पाद का लगभग 62.5% थी बाकी हिस्से में पानी, यीस्ट, गेहूं का चोकर (bran) और अन्य स्वीकृत चीजें शामिल थीं। CCPA ने 22 अक्टूबर 2026 के आदेश में ब्रिटिनिया पर भ्रामक विज्ञापन और अनुचित व्यापार व्यवहार के लिए ₹1 लाख का जुर्माना लगाया। प्राधिकरण ने कंपनी को संबंधित भ्रामक विज्ञापन तत्काल बंद करने और 15 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट जमा करने का निर्देश भी दिया। वहीं, कंपनी का तर्क था कि '100%' का दावा इस्तेमाल किए गए आटे के आधार पर किया गया था, लेकिन CCPA ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। इस बीच ब्रिटानिया जैसी बड़ी कंपनी पर मात्र 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाए जाने को लेकर कंज्यूमर फोरम के वकील और जानकार ने सवाल उठाए हैं।

सख्त कार्रवाई और जवाबदेही तय की जाए

लीगल एक्सपर्ट व कंज्यूमर राइट्स एडवोकेट, अशोक बर्णवाल ने टाइम्स नाउ नवभारत से बातचीत करते हुए कहा कि Britannia द्वारा '100% होल व्हीट ब्रेड' के नाम पर लाखों उपभोक्ताओं को गुमराह किया गया है। इतने बड़े पैमाने पर हुई इस धोखाधड़ी के सामने CCPA (सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी) द्वारा लगाया गया महज ₹1 लाख का जुर्माना ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। अथॉरिटी ने अपनी 'डिस्क्रिशनरी पावर' (Discretionary Power) का इस्तेमाल करते हुए मिलकर बहुत ही कम जुर्माना लगाया है, जिससे ऐसी कंपनियों को कोई कड़ा संदेश नहीं मिलता। जब मामला लाखों उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और भरोसे से जुड़ा हो, तो यह पेनल्टी बिल्कुल नाकाफी है।

यह मामला सिर्फ एक कंपनी के विज्ञापन या दावे तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लाखों उपभोक्ताओं के भरोसे से जुड़ा है, जिन्होंने उत्पाद की जानकारी के आधार पर खरीदारी की। अगर उपभोक्ताओं को गुमराह किया गया है, तो मामले की गंभीरता के अनुरूप अधिक कड़ा जुर्माना लगाया जाना चाहिए।

इस मामले में यह भी जांच होनी चाहिए कि संबंधित प्राधिकरण ने जुर्माने की राशि तय करते समय किन पहलुओं पर विचार किया। उपभोक्ता इस आदेश और कार्रवाई के आधार को समझने के लिए RTI आवेदन के जरिए संबंधित जानकारी मांग सकते हैं। इसके अलावा, मामले के तथ्यों और उपलब्ध कानूनी विकल्पों के आधार पर प्रभावित उपभोक्ता या पात्र पक्ष उचित मंच पर शिकायत अथवा रिट याचिका दायर करने की संभावना पर विचार कर सकते हैं।

उपभोक्ता मामले के जानकार और चार्टर्ड अकाउंटेंट, कैलाश गोदुका ने बताया कि ब्रिटानिया जैसी दिग्गज और मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए ₹1 लाख का जुर्माना बहुत ही मामूली है। जब पैकेट पर बड़ा-बड़ा '100% होल व्हीट' लिखा होता है और अंदर केवल 62% ही आटा निकलता है, तो यह कंज्यूमर के साथ सीधा विश्वासघात और अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस है। ऐसे में मामूली 1 लाख रुपया का जुर्माना लगाना केवल खानापूर्ति लगती है। ऐसे विज्ञापनों से कंपनियां करोड़ों-अरबों का मुनाफा कमा लेती हैं, इसलिए पेनल्टी ऐसी होनी चाहिए जो कंपनियों की कमाई के अनुपात में हो, ताकि वे भविष्य में ऐसा करने से डरें।

Alok Kumar
आलोक कुमार author

आलोक कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और प्रिंट मीडिया में 17 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव रखने वाले आलोक ने अपने पत्रकारिता करियर में कई प्रमुख कॉर्पोरेट इवेंट्स और चर्चित स्टोरीज कवर की हैं। वह बिजनेस, बैंकिंग, शेयर मार्केट और पर्सनल फाइनेंस पर गहरी समझ रखते हैं और जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और पाठक-केंद्रित तरीके से प्रस्तुत करने में माहिर हैं। अब तक आलोक ने लगभग 18,000 स्टोरीज लिखी हैं। उनकी लेखन शैली भरोसेमंद, विश्लेषणात्मक और व्यावहारिक जानकारी देने वाली होती है।

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