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एक ही बीमारी, एक ही इंश्योरेंस फिर भी दिल्ली में इलाज महंगा, लखनऊ में सस्ता...कैसे आपकी लोकेशन तय करती है प्रीमियम

क्या आप जानते हैं लखनऊ से दिल्ली शिफ्ट होते ही आपके हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम 50% तक महंगा हो सकता है? यह सुनने में थोड़ा अजीब है, लेकिन आपके शहर के आधार पर ही प्रीमियम की रकम तय होती हैं।

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Health Insurance

जब हम हेल्थ इंश्योरेंस खरीदते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान सिर्फ इस बात पर होता है कि पॉलिसी कितने लाख की है और उसमें कौन-कौन सी बीमारियां कवर हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि अगर वही पॉलिसी दिल्ली में रहने वाला व्यक्ति खरीदे और वही लखनऊ में रहने वाला, तो दोनों के प्रीमियम (किस्त) में जमीन-आसमान का अंतर हो सकता है? जी हां, आपकी भौगोलिक स्थिति यानी आपकी लोकेशन यह तय करने में बड़ी भूमिका निभाती है कि आपकी जेब से कितना पैसा प्रीमियम के रूप में जाएगा। इंश्योरेंस की भाषा में इसे 'ज़ोनल प्राइसिंग' (Zonal Pricing) कहा जाता है।

क्या है यह ज़ोनल प्राइसिंग का मसला?

इंश्योरेंस कंपनियां पूरे देश को उनकी विकास दर, चिकित्सा सुविधाओं और इलाज के खर्च के आधार पर अलग-अलग ज़ोन में बांटती हैं। आमतौर पर ज़ोन-1 में दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे मेट्रो शहर आते हैं, जबकि ज़ोन-2 और ज़ोन-3 में लखनऊ, जयपुर या पटना जैसे टियर-2 और टियर-3 शहर शामिल किए जाते हैं।

इसका सीधा सा तर्क यह है कि दिल्ली जैसे महानगर में एक बड़े अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर का खर्च, डॉक्टर की फीस और रूम रेंट, लखनऊ या किसी छोटे शहर की तुलना में काफी ज्यादा होता है। चूंकि कंपनी को दिल्ली में रहने वाले ग्राहक के लिए बड़ा क्लेम चुकाना पड़ सकता है, इसलिए वे वहां के निवासियों से प्रीमियम भी ज्यादा वसूलती हैं।

शहर बदलने पर क्या होता है?

एक दिलचस्प बात यह है कि अगर आपने लखनऊ में रहते हुए पॉलिसी ली और फिर आपकी नौकरी दिल्ली में लग गई, तो आपको अपनी कंपनी को इसकी जानकारी देनी होगी। जैसे ही आपका एड्रेस अपडेट होगा, आपका प्रीमियम बढ़ जाएगा। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं, तो क्लेम के समय आपको 'को-पेमेंट' (Co-payment) का सामना करना पड़ सकता है। इसका मतलब है कि इलाज के कुल बिल का एक हिस्सा (जैसे 10% से 20%) आपको खुद अपनी जेब से भरना होगा, क्योंकि आपने कम प्रीमियम वाले ज़ोन की पॉलिसी ली थी और इलाज महंगे ज़ोन में करा रहे हैं।

इलाज की गुणवत्ता और सुविधाओं का असर

महंगे शहरों में न केवल इलाज महंगा है, बल्कि वहां उन्नत तकनीक और विशिष्ट डॉक्टरों (Specialists) की उपलब्धता भी अधिक होती है। इन सुविधाओं का उपयोग करने पर अस्पताल का बिल भारी-भरकम बनता है। इंश्योरेंस कंपनियां पिछले कई सालों के 'क्लेम डेटा' का विश्लेषण करती हैं। अगर किसी खास इलाके में बीमारियों की दर ज्यादा है या वहां के लोग ज्यादा क्लेम ले रहे हैं, तो उस पिन कोड या ज़ोन का प्रीमियम अपने आप बढ़ जाता है।

ग्राहक क्या करें?

अगर आप छोटे शहर से बड़े शहर की ओर रुख कर रहे हैं या इसके विपरीत, तो हमेशा अपनी इंश्योरेंस कंपनी को सूचित करें। कई कंपनियां अब 'ज़ोन-न्यूट्रल' पॉलिसी भी पेश करती हैं, जिनमें आप कहीं भी इलाज कराएं, प्रीमियम एक जैसा रहता है, लेकिन इनका आधार मूल्य थोड़ा अधिक हो सकता है। पॉलिसी लेते समय हमेशा 'को-पेमेंट क्लॉज' को ध्यान से पढ़ें, ताकि भविष्य में आपको अपनी लोकेशन की वजह से अस्पताल का बिल चुकाने में कोई झटका न लगे।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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