Israel Election 2026: 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमलों और उसके बाद गाजा पट्टी में शुरू हुए युद्ध के बाद इजरायल में पहली बार आम चुनाव (Legislative Elections) के लिए मतदान हो रहा है। देश के इतिहास में इस चुनाव को बेहद निर्णायक माना जा रहा है, क्योंकि यह इजरायल की भावी सरकार की दिशा, कई मोर्चों पर जारी संघर्ष, देश के भीतर बढ़ती राजनीतिक ध्रुवीकरण और अंतरराष्ट्रीय दबाव का भविष्य तय करेगा।
संसद (Knesset) की 120 सीटों के लिए हो रहे इस चुनाव से जुड़ी 5 प्रमुख बातें नीचे दी गई हैं:
1. कौन सी हैं मुख्य पार्टियां और सर्वे क्या कह रहे हैं?
इजरायल में 3.25% वोट हासिल करने वाली पार्टी ही 4 साल के कार्यकाल वाली संसद में प्रवेश कर पाती है। इस बार मुख्य रूप से दो बड़े गठबंधन आमने-सामने हैं:
नेतन्याहू समर्थक गठबंधन: इसका नेतृत्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की 'लिकुड' (Likud) पार्टी कर रही है। इसमें दक्षिणपंथी और कट्टर-रूढ़िवादी दल शामिल हैं, जैसे यूनाइटेड टोरा जुडैज्म (UTJ), शास (Shas), ओत्जमा येहुदी (इतामार बेन-ग्विर) और रिलिजियस जायोनिज्म-जेहुत (बेजालेल स्मोट्रिच)।
विपक्षी गठबंधन (Anti-Netanyahu Opposition): इसमें मुख्य रूप से चार दल शामिल हैं- पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट की 'यशार' (Yashar) पार्टी, यायर गोलान की 'डेमोक्रेट्स', पूर्व वित्त मंत्री एविग्डोर लिबरमैन की 'इजराइल बीटेनु', और पूर्व पीएम नफ्ताली बेनेट व विपक्ष के नेता यायर लापिड का 'टुगेदर' (Together) गठबंधन।
सर्वे के नतीजे: अंतिम जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार किसी भी गठबंधन को स्पष्ट 61 सीटों का बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। KAN के पोल के अनुसार विपक्षी गठबंधन को 52 और नेतन्याहू के खेमे को 50 सीटें मिलने का अनुमान है। बाकी सीटें निर्दलीय और अरब-बहुसंख्यक पार्टियों के पास जा सकती हैं। यदि दोनों खेमे बहुमत साबित करने में नाकाम रहते हैं, तो देश में फिर से अल्पमत सरकार या दोबारा चुनाव की नौबत आ सकती है।
2. चुनाव के सबसे बड़े मुद्दे क्या हैं?
सुरक्षा चूक और जवाबदेही: 7 अक्टूबर 2023 की सुरक्षा विफलताओं को लेकर जनता में भारी गुस्सा है और इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है।
अति-रूढ़िवादी समुदाय को सैन्य छूट: इजरायल की अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स (Haredi) आबादी को दी गई अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट पर देश के भीतर गहरा असंतोष है।
न्यायिक सुधार विवाद: नेतन्याहू द्वारा लाए गए विवादित न्यायिक सुधारों को लेकर धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी विपक्ष का मानना है कि यह देश के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर कर रहा है।
युद्ध से थकी जनता: लगातार जारी सैन्य संघर्षों के बीच नागरिक सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता चाहते हैं, हालांकि गाजा, वेस्ट बैंक और लेबनान के मोर्चों पर किसी तरह के समझौते को लेकर जनता विभाजित है।
3. यह चुनाव इतना खास क्यों है?
7 अक्टूबर के हमलों के बाद यह पहला मौका है जब इजरायली जनता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रही है। देश में कट्टर-दक्षिणपंथी विचारधारा का उभार हुआ है और समाज में विभाजन गहराया है।
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजरायल की साख पर गहरा असर पड़ा है। कई सहयोगी देशों ने वेस्ट बैंक की अवैध बस्तियों पर प्रतिबंध लगाए हैं और संयुक्त राष्ट्र महासभा में नेतन्याहू के भाषण के दौरान दर्जनों देशों के प्रतिनिधियों ने वॉकआउट किया था। इस चुनाव का परिणाम तय करेगा कि इज़राइल अपने कड़े अंतरराष्ट्रीय रुख को बरकरार रखता है या दुनिया के साथ संबंधों को सुधारने की कोशिश करता है।

बेंजामिन नेतन्याहू इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहे
4. बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?
इजरायल पर सबसे लंबे समय (कुल 19 वर्षों) तक शासन करने वाले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं:
7 अक्टूबर की सुरक्षा विफलता और 2019 से चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों में उन पर जांच का भारी दबाव है।
यदि वे चुनाव हारते हैं, तो उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मुकदमों में सजा की संभावना बढ़ जाएगी और अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) द्वारा जारी वारंट के बाद जांच आयोग के गठन का खतरा भी गहरा सकता है।
5. इजरायल के फिलिस्तीनी (अरब) नागरिकों का क्या रुख है?
इजरायल के कुल 73 लाख मतदाताओं में से लगभग 12 लाख फिलिस्तीनी (अरब) नागरिक हैं। (हालांकि गाजा, वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम के 30 लाख वयस्क फिलिस्तीनियों के पास इस चुनाव में वोट का अधिकार नहीं है)।
टर्नआउट और सीटें: सर्वे के अनुसार अरब नागरिकों का वोटिंग टर्नआउट 60% से 70% तक रह सकता है। यदि टर्नआउट 65% रहता है, तो दो प्रमुख अरब सूचियां-'राअम' (Ra'am) और 'जॉइंट लिस्ट' (Joint List) कनिसेट में 15 तक सीटें जीत सकती हैं।
राजनीतिक स्थिति: यद्यपि दोनों बड़े इजरायली गठबंधनों ने अरब दलों के साथ सरकार बनाने से इनकार किया है, लेकिन उनके समर्थन के बिना किसी के लिए भी बहुमत हासिल करना लगभग असंभव होगा। जानकारों का कहना है कि अरब पार्टियों को राजनीतिक रूप से अलग-थलग रखना नेतन्याहू की रणनीति का हिस्सा रहा है ताकि वे राजनीतिक गतिरोध की स्थिति में कार्यवाहक पीएम के रूप में पद पर बने रह सकें।
