नवरात्रि का उत्सव पूरे देश में धूम-धाम से मनाया जा रहा है और देवी की अलग-अलग रूपों में पूजा की जा रही है। नवरात्रि ईश्वर की स्त्री प्रकृति को समर्पित 9 दिन हैं और इस समय के दौरान प्रकृति में सहज ही स्त्री गुण प्रभावी होता है। देवी की उत्पत्ति को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं और सद्गुरु भी ऐसी ही एक कथा का वर्णन करते हैं जो अस्तित्व में देवी की उत्पत्ति से जुड़ी हुई है। स्त्री तत्व के गुण को दर्शाने वाला मूल शब्द 'री' है और इसी से स्त्री शब्द की भी उत्पत्ति हुई है।
'री' शब्द का अर्थ होता है 'गति', 'संभावना' या 'ऊर्जा'। 'री' से ही 'आर्या' शब्द भी आया है जो एक सभ्यता या संस्कृति को दर्शाता है। सद्गुरु कहते हैं जब पुरुष तत्व का प्रभुत्व होता है जो प्रभुत्व, कुछ पाने या जीत लेने पर केंद्रित होता है तो संघर्ष की प्रधानता होती है लेकिन वास्तव में एक सभ्यता का निर्माण स्त्री तत्व की मौजूदगी में ही होता है इसलिए इस संस्कृति में स्त्री तत्व को सम्मान दिया गया है।
देवी के प्रकट होने की कथा: स्त्री तत्व की उत्पत्ति के बारे में कथा है कि एक समय हानिकारक शक्तियों का प्रभाव इतना बढ़ा कि इससे अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया जो अपनी शैशव अवस्था या शुरुआती अवस्था में था। तब अलग-अलग गुणों वाले तीन प्रमुख देवता - ब्रम्हा, विष्णु या महेश मिले और सांस छोड़ते हुए उन्होंने अपनी सर्वश्रेष्ठ ऊर्जा को खुद से बाहर निकाला और उनकी सम्मिलित ऊर्जा के एक साथ विलीन होने पर देवी का जन्म हुआ।
आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में हम इस कथा में बताए देवाताओं का वर्णन प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन के रूप में कर सकते हैं। आज भौतिक विज्ञान के अनुसार, यह स्पष्ट रूप से समझ में आ रहा है ये तीन मूल बल हैं जो अस्तित्व के लिए निर्माण ब्लॉक हैं, जिनसे सृजन घटित होता है। देवी या स्त्री तत्व कोई कण या तत्व नहीं हैं बल्कि वह ऐसा स्थान या आकाश हैं जो इन तीन मूलभूत शक्तियों को थाम कर रखती हैं।
महिला या पुरुष तक सीमित नहीं स्त्री तत्व: वह ऊर्जा जो परमाणु को कार्यशील बनाती है, वही ऊर्जा जो ब्रम्हांड को कार्यान्वित करती है। इसी से अस्तित्व में सबकुछ घटित होता है और इस ऊर्जा को हमेशा स्त्रैण के रूप में पहचाना जाता है। सद्गुरु यह भी जोर देकर कहते हैं कि स्त्री तत्व से अर्थ महिलाओं से नहीं है बल्कि यह अस्तित्व का एक विशेष गुण है जो शरीर के रूप में महिला या पुरुष तक सीमित नहीं है।
सद्गुरु नवरात्रि में देवी के तीन रूपों दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का भी वर्णन करते हैं और इन्हें तमस, रजस और सत्व के गुणों के रूप में जाना जाता है। नवरात्रि के पहले तीन दिन दुर्गा, अगले तीन दिन लक्ष्मी और अंतिम तीन दिन सरस्वती को समर्पित हैं। यहां दिए वीडियो में सद्गुरु से जानिए इन तीन शक्तियों का महत्व।
देवी के तीन आयाम: दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती स्त्री प्रकृति के तीन आयाम हैं। इन्हें जड़ता, गतिशीलता और परे जाने की आकांक्षा के रूप में पहचाना जाता है। नवरात्रि के अवसर पर इन तीन रूपों की आराधना से जीवन में स्थिरता, सुख-शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक विकास सब कुछ संभव हो सकता है।
