Maa Dhumavati Puja: कौन हैं मां धूमावती, जानिए कैसा है मां का स्वरूप, कैसे करें मां धूमावती का पूजन
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Jan 25, 2026, 09:58 PM IST
Maa Dhumavati Puja: गुप्त नवरात्रि के सातवें दिन मां धूमावती का पूजन किया जाता है। मां का यह स्वरूप बेहद ही शक्तिशाली है। 10 महाविद्याओं में मां धूमावती सातवीं महाविद्या हैं। मां को तंत्र साधना, रहस्य और वैराग्य की देवी माना गया है। मां का स्वरूप सामान्य देवियों से बिलकुल अलग है। आइए जानते हैं मां की पूजन विधि क्या है?
मां धूमावती पूजा विधि
Maa Dhumavati Puja: गुप्त नवरात्रि के सातवें दिन दस महाविद्याओं में से एक मां धूमावती की विशेष पूजा की जाती है। मां धूमावती को तंत्र साधना, रहस्य, वैराग्य और आत्मज्ञान की देवी माना जाता है। उनका स्वरूप सामान्य देवी स्वरूप से बिल्कुल अलग है, जो संसारिक मोह, आडंबर और आकर्षण से परे आध्यात्मिक सत्य को दर्शाता है। मां धूमावती की साधना बाहरी सुख-सुविधाओं के लिए नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि, आत्मिक जागरण और जीवन के कष्टों से मुक्ति के लिए की जाती है। गुप्त नवरात्रि में की गई उनकी उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है क्योंकि यह साधना गूढ़, रहस्यमयी और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर होती है। माघ माह की गुप्त नवरात्रि का सातवां दिन साल 2026 में 25 जनवरी को है।
कौन हैं मां धूमावती?
मां धूमावती दस महाविद्याओं में सातवीं महाविद्या हैं। उन्हें विधवा स्वरूप वाली देवी के रूप में जाना जाता है, जो सांसारिक आकर्षण, भोग-विलास और भौतिक सुखों से पूर्णतः मुक्त स्वरूप का प्रतीक हैं। वे वैराग्य, त्याग, तपस्या और आत्मज्ञान की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। मां धूमावती जीवन के उस सत्य को दर्शाती हैं जहां व्यक्ति भ्रम, अहंकार और माया से ऊपर उठकर आत्मिक शांति की ओर बढ़ता है। उनका स्वरूप यह संकेत देता है कि संसार की चकाचौंध अस्थायी है और वास्तविक शक्ति आत्मा की शुद्धता में निहित है।
मां धूमावती का स्वरूप और महत्व
मां धूमावती का स्वरूप साधारण नहीं बल्कि गूढ़ अर्थों से भरा हुआ है। उन्हें वृद्धा रूप में दर्शाया जाता है, जिनका शरीर धुएं के समान धूसर होता है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और उनका वाहन कौआ माना जाता है। उनके हाथों में सुपा, झाड़ू और ध्वज जैसे प्रतीकात्मक चिन्ह होते हैं, जो जीवन की क्षणभंगुरता, शुद्धि और त्याग का संदेश देते हैं। उनका स्वरूप यह दर्शाता है कि जीवन में दुख, पीड़ा और शून्यता भी आध्यात्मिक विकास का मार्ग बन सकती है। मां धूमावती का महत्व इस बात में है कि वे व्यक्ति को संसारिक बंधनों से मुक्त कर आत्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाती हैं।
मां धूमावती की पूजा विधि
मां धूमावती की पूजा सादगी, शुद्धता और मानसिक एकाग्रता के साथ की जाती है। गुप्त नवरात्रि के सातवें दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को शांत और एकांत स्थान पर तैयार किया जाता है। देवी की प्रतिमा या चित्र को स्थापित कर धूप-दीप जलाया जाता है। मां धूमावती को सफेद पुष्प, धूप, ध्वज और साधारण भोग अर्पित किया जाता है। पूजा के दौरान मन को शांत रखते हुए उनका ध्यान किया जाता है और मंत्र जप किया जाता है। यह पूजा बाहरी आडंबर से अधिक आंतरिक साधना और भावनात्मक शुद्धता पर आधारित होती है। सुहागिन स्त्रियों के लिए मां की पूजा और दर्शन वर्जित माना गया है।
मां धूमावती के मंत्र
मां धूमावती के मंत्र साधना में विशेष प्रभावशाली माने जाते हैं। उनका बीज मंत्र और ध्यान मंत्र साधक के मन, विचार और चेतना को शुद्ध करने का कार्य करता है। मां धूमावती का मंत्र जप साधक के भीतर की नकारात्मक ऊर्जा, भय, भ्रम और मानसिक अशांति को धीरे-धीरे समाप्त करता है। मां का मूल मंत्र ‘ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा’ है। मां का सप्ताक्षर मंत्र ‘ॐ धूं धूमावत्यै स्वाहा’ और शत्रु नाशक मंत्र ‘ॐ ह्रीं धूं धूं धूमावत्यै दूरजटयै ठः ठः शत्रु विनाशय फट् स्वाहा’ है। मंत्र साधना से व्यक्ति के भीतर स्थिरता, धैर्य और आत्मिक शक्ति का विकास होता है, जिससे साधक जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना आत्मबल से कर पाता है। मां की साधना कठिन है, इस कारण किसी योग्य गुरु की आज्ञा की आवश्यकता होती है।
मां धूमावती की पूजा से मिलने वाले लाभ
मां धूमावती की उपासना से जीवन में स्थिरता और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है। उनकी साधना से भय, तनाव, अवसाद और नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है। जो लोग जीवन में लगातार बाधाओं, दुख और मानसिक पीड़ा से गुजर रहे होते हैं, उनके लिए मां धूमावती की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। यह साधना व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है और आत्मिक शांति प्रदान करती है। साथ ही यह पूजा वैराग्य, संयम और आत्मज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करती है।
मां धूमावती की उत्पत्ति की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां धूमावती को दस महाविद्याओं में सातवां स्थान प्राप्त है। उनका स्वरूप और उत्पत्ति बाकी महाविद्याओं से बिल्कुल अलग मानी जाती है। मां धूमावती का प्रकट होना वैराग्य, तप, अभाव और जीवन के कठोर सत्य का प्रतीक है।
कहा जाता है कि एक बार माता सती अपने पति भगवान शिव के साथ हिमालय में निवास कर रही थीं। एक दिन माता सती को अत्यधिक भूख लगी और उन्होंने शिव से भोजन की इच्छा प्रकट की, लेकिन उस समय भगवान शिव ध्यान में लीन थे और उन्होंने माता की बात पर ध्यान नहीं दिया। भूख से व्याकुल होकर माता सती ने शिव से कई बार आग्रह किया, लेकिन जब शिव की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला, तो माता का स्वरूप उग्र हो गया।
कथाओं में वर्णन मिलता है कि भूख और क्रोध के उस क्षण में माता सती ने स्वयं भगवान शिव को ही निगल लिया। इसके बाद माता का स्वरूप धुएं से भरा हुआ, उजड़ा हुआ और भयावह हो गया। जब शिव पुनः प्रकट हुए, तो माता सती का यही रूप मां धूमावती कहलाया। इस स्वरूप में न तो सौंदर्य था और न ही श्रृंगार, बल्कि जीवन के कष्ट, शून्यता और वैराग्य का भाव था।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, जब माता सती ने स्वयं को यज्ञ कुंड में समर्पित किया, तब उनके धुएं से भरे स्वरूप से मां धूमावती प्रकट हुईं। इस कारण मां धूमावती को विधवा, शोक और तपस्या का प्रतीक माना गया। उनका जीवन यह दर्शाता है कि संसार का हर सुख स्थायी नहीं होता और अंततः व्यक्ति को सत्य, त्याग और वैराग्य की ओर जाना ही पड़ता है।मां धूमावती का प्रकट होना यह भी बताता है कि जीवन में दुख, अभाव और अकेलापन भी आत्मिक विकास का मार्ग बन सकते हैं। इसलिए तांत्रिक साधना में मां धूमावती को विशेष स्थान दिया गया है और उन्हें कठिन परिस्थितियों में शक्ति देने वाली देवी माना जाता है।
गुप्त नवरात्रि में मां धूमावती की विशेष उपासना
गुप्त नवरात्रि में मां धूमावती की उपासना का विशेष महत्व होता है क्योंकि यह काल तांत्रिक साधना, रहस्यमयी उपासना और आत्मिक जागरण का समय माना जाता है। इस अवधि में की गई उनकी साधना गूढ़ शक्तियों को जाग्रत करती है और साधक के भीतर छिपी चेतना को सक्रिय करती है। गुप्त नवरात्रि की साधना व्यक्ति को बाहरी दुनिया से हटाकर आत्मिक मार्ग पर केंद्रित करती है, जिससे आत्मिक शुद्धि, आत्मबल और आध्यात्मिक उन्नति होती है।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी शास्त्रों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।