Bhangaram Devi Temple: क्या आप सोच सकते हैं कि भारत जैसे देश में कभी किसी भगवान को सजा सुनाई जा सकती है? क्या ऐसी कल्पना कर सकते हैं कि देवी-देवताओं पर मुकदमा चलता हो? अगर आपका जवाब ना है तो आपको छत्तीसगढ़ में बस्तर के भंगाराम देवी के मंदिर के बारे में जरूर जानना चाहिए।
बस्तर के केशकाल घाटी क्षेत्र में स्थित इस 1500 साल पुराने मंदिर में हर साल बड़ी संख्या में लोग देवी देवताओं के खिलाफ शिकायत लेकर आते हैं। माता भंगाराम देवी मंदिर के कटघरे में देवी-देवताओं को खड़ा किया जाता है। यहां उनकी सुनवाई होती है, फैसले सुनाए जाते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें दंड भी दिया जाता है।
कटघरे में खड़े होते हैं कुलदेवता
बस्तर के भंगाराम देवी मंदिर में दशकों से ऐसा ही होता आ रहा है। यहां हर साल भाद्रपद महीने में 'भादो जात्रा' के दौरान एक विशेष दरबार आयोजित किया जाता है। इस मौके पर आसपास के करीब 250 गांवों के आदिवासी अपने-अपने कुलदेवताओं और ग्राम देवताओं के प्रतीक स्वरूप मंदिर परिसर में पहुंचते हैं।
इस दरबार की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां भक्त अपनी शिकायतें लेकर आते हैं, लेकिन शिकायतें अपने देवी-देवताओं के खिलाफ होती हैं। अगर किसी परिवार की मनोकामना पूरी नहीं हुई, कोई बीमारी दूर नहीं हुई, फसल खराब हो गई, पशुधन की रक्षा नहीं हो सकी या किसी आपदा से परिवार को नुकसान पहुंचा, तो लोग मानते हैं कि उनके कुलदेवता अपने दायित्व का निर्वाह करने में विफल रहे हैं। ऐसे मामलों की सुनवाई भंगाराम देवी के दरबार में की जाती है।
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पुजारी सुनाते हैं फैसला
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, भंगाराम देवी को इस पूरे इलाके की सर्वोच्च देवी माना जाता है। मंदिर के पुजारी भक्तों की बातें सुनते हैं और फिर देवी की इच्छा के आधार पर अपना निर्णय सुनाते हैं। आदिवासी समुदाय का विश्वास है कि पुजारी का भंगाराम देवी से सीधा आध्यात्मिक संबंध होता है और वही देवी का संदेश लोगों तक पहुंचाते हैं।
अगर सुनवाई के बाद कोई देवी-देवता दोषी पाए जाते हैं, तो उन्हें दंडित कर दिया जाता है। दंडित देवी-देवता के प्रतीक को मंदिर के पीछे अन्य निर्वासित कुलदेवताओं के साथ रख दिया जाता है। इसे एक तरह का धार्मिक निर्वासन माना जाता है।
हालांकि यह सजा हमेशा के लिए नहीं होती। मान्यता है कि यदि दंडित देवता बाद में अपने भक्तों के सपने में प्रकट होते हैं और फिर से उनकी रक्षा करने का आश्वासन देते हैं, तो एक साल बाद उन्हें दोबारा मंदिर में प्रतिष्ठित किया जा सकता है। लेकिन पुनः प्रतिष्ठा से पहले उनसे पूरे समुदाय के कल्याण और संरक्षण की प्रतीकात्मक शपथ भी दिलाई जाती है।
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देवी के साथ होती है डॉ. खान की पूजा
भंगाराम देवी मंदिर की एक और अनोखी बात यह है कि यहां एक डॉक्टर को भी देवता का दर्जा दिया गया है। मंदिर में नागपुर के रहने वाले डॉ. खान की प्रतिमा स्थापित है, जिन्हें स्थानीय आदिवासी भगवान की तरह पूजते हैं। बताया जाता है कि कई दशक पहले जब इस इलाके में हैजा और चेचक जैसी महामारियां फैली थीं, तब डॉ. खान ने अपनी जान की परवाह किए बिना यहां के लोगों का इलाज किया था। वे अपने अंतिम समय तक आदिवासियों की सेवा में लगे रहे।
उनकी इसी निस्वार्थ सेवा और समर्पण के सम्मान में बस्तर के आदिवासियों ने उन्हें अपने कुलदेवताओं के बीच स्थान दिया। उनकी प्रतिमा भी मंदिर में देवी प्रतिमा के पास ही लगी है।
