Bhadrapada Amavasya 2020: भाद्रपद अमावस्या कब है? जानिए इसका महत्व, तिथि मुहूर्त और उपाय

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Aug 13, 2020, 07:34 AM IST

Bhadrapada Amavasya Muhurat and Significance: भाद्रपद अमावस्या को कुषा ग्रहणी अमावस्या या पिथौरा अमावस्या भी कहते हैं। भाद्रपद अमावस्या स्नान, दान और पितृ तर्पण (अर्चन) के उद्देश्य से अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

Bhadrapada Amavasya 2020: भाद्रपद अमावस्या कब है? जानिए इसका महत्व, तिथि मुहूर्त और उपाय

Bhadrapada Amavasya: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में अमावस्या को भाद्रपद अमावस्या के रूप में जाना जाता है। इसे भादों या भादी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन हिंदू धर्म में बहुत महत्व रखता है, विशेष रूप से पूर्वजों, दान, और काल-सर्प दोष से छुटकारा पाने के लिए। चूंकि भाद्रपद मास भगवान कृष्ण को समर्पित है, इसलिए इससे भाद्रपद अमावस्या का महत्व भी बढ़ जाता है।  इस दौरान कुशा (हरी घास) को अत्यधिक फलदायी माना जाता है, इसलिए इस दिन इसे धार्मिक गतिविधियों, श्राद्ध, आदि करने के लिए एकत्र करके इस्तेमाल किया जाता है।

भाद्रपद अमावस्या तिथि और मुहूर्त (Bhadrapada Amavasya 2020 Date and Muhurat):

भाद्रपद अमावस्या शुरू: 18 अगस्त, 2020 को 10:41 से
भाद्रपद अमावस्या समाप्‍त: 19 अगस्त, 2020 को 08:12 तक।
भाद्रपद अमावस्या का व्रत रखना चाहते हैं तो इसे 19 अगस्त को रखा जा सकता है।

भाद्रपद अमावस्या का महत्व (Significance of Bhadrapada Amavasya):

कुशा (हरी घास) को धार्मिक गतिविधियों को करने के लिए एकत्र किया जाता है, इसलिए इस अमावस्या को कुषा ग्रहणी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। प्राचीन धार्मिक शास्त्रों में, इसका नाम कुशोत्पातिनी अमावस्या है। चूंकि अमावस्या पर अनुष्ठान करने के लिए कुशा का उपयोग किया जाता है, इसलिए, यदि भाद्रपद अमावस्या सोमवार को पड़ती है, तो एक ही कुशा का उपयोग 12 साल तक किया जा सकता है।

पिथौरा अमावस्या: भाद्रपद अमावस्या को पिथौरा अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन, देवी दुर्गा की पूजा की जाती है।  प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मां पार्वती ने इंद्राणी को पिथौरा अमावस्या व्रत का महत्व बताया।

भाद्रपद अमावस्या के उपाय (Bhadrapada Amavasya Upay / Rituals):

  1. सुबह किसी पवित्र नदी, कुंड या तालाब में स्नान करें। सूर्य देव को अर्घ अर्पित करें, और बहते जल में तिल डालकर अर्पित करें।
  2. किसी नदी के तट पर, अपने पूर्वजों को पिंड दान (तर्पण) अर्पित करें और गरीबों को चीजें दान करें। इस तरह, आपके पूर्वजों को शांति और मुक्ति प्राप्त होगी।
  3. इस दिन, एक कुंडली में काल-सर्प दोष के प्रभाव को कम करने के लिए धार्मिक संस्कार भी किए जा सकते हैं।
  4. शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए 7 बार परिक्रमा करें।
  5. इस अमावस्या को शनिदेव का दिन भी माना जाता है, इसलिए इस दिन देवता की पूजा करना बहुत महत्वपूर्ण है।

भाद्रपद अमावस्या स्नान, दान और पितृ तर्पण (अर्चन) के उद्देश्य से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यदि यह अमावस्या सोमवार को पड़ती है और उसी दिन सूर्य ग्रहण भी होता है, तो इससे इसका महत्व दस गुना बढ़ जाता है।

End of Article