Aja Ekadashi Date 2020: कब मनाई जाएगी अजा एकादशी 2020? जानिए इस दिन का व्रत कथा, मुहूर्त और महत्व

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Aug 14, 2020, 08:40 AM IST

Aja Ekadashi 2020 Vrat Katha: कृष्ण पक्ष के भाद्रपद मास में कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 2 दिन बाद अजा एकादशी मनाई जाने वाली है हैं। यहां जानिए शुभ दिन का महत्व, तिथि, व्रत कथा और पूजा विधि।

Aja Ekadashi Date 2020: कब मनाई जाएगी अजा एकादशी 2020? जानिए इस दिन का व्रत कथा, मुहूर्त और महत्व

Aja Ekadashi 2020: एकादशी हमेशा से हिंदू परंपरा में अहम दिन रहा है। इसी में से एक है अजा एकादशी जिसे भगवान विष्णु की कृपा वाला दिन माना जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और इस एकादशी व्रत को अन्नदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। अजा एकादशी को उत्तर भारत में 'भाद्रपद' के हिंदू महीने में मनाया जाता है और अन्य क्षेत्रों में इसे 'श्रावण' के महीने में मनाया जाता है।

अजा एकादशी तिथि (Aja Ekadashi 2020 Date)

कृष्ण पक्ष के भाद्रपद मास में कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 2 दिन बाद अजा एकादशी पड़ती है। साल 2020 में अजा एकादशी 15 अगस्त, शनिवार को पड़ रही है।

एकादशी तिथि शुरू: 14 अगस्त जुलाई, दोपहर 02:01 बजे से 
एकादशी तिथि समाप्‍त: 15 अगस्त, दोपहर 02.20 बजे तक। 
अजा एकादशी का व्रत आप 15 अगस्त को रख सकते हैं। अगर व्रत न रखें तो सुबह पूजा करने के बाद दान भी कर सकते हैं।

अजा एकादशी व्रत का महत्व (Significance of Aja Ekadashi):

हिंदू धर्म में एकादशी को बहुत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है और अजा एकादशी उनमें से एक है। ऐसा माना जाता है कि यदि कोई इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत करता है और पूरी प्रक्रिया का सही ढंग से पालन करे तो उसके अज्ञानता में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।​ साथ ही उसे जीवन में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अजा एकादशी व्रत और पूजन विधि (Aja Ekadashi Puja Vidhi):

  1. इस दिन जल्दी उठें (सूर्योदय से पहले) और हो सके तो कुशा घास, तिल और मिट्टी से पवित्र स्नान करें।
  2. भगवान विष्णु की पूजा करने के लिए, कुछ अनाज शुद्ध और पवित्र स्थान पर रखें।
  3. मिट्टी से भरे क्षेत्र के ऊपर लाल रंग से सजाया गया मिट्टी का कलश रखें।
  4. उस मिट्टी के बर्तन कलश की स्थापना के बाद पवित्र अनुष्ठान शुरू करने के लिए बर्तन में पवित्र जल, सिंदूर और चावल चढ़ाएं।
  5. मिट्टी के बर्तन के ऊपर भगवान विष्णु की मूर्ति रखें।
  6. भगवान विष्णु की मूर्ति के बगल में बैठकर अजा एकादशी व्रत का संकल्प लें।
  7. संकल्प लेने के बाद भगवान की धूप, दीप, भोग और फूल से पूजा करें।
  8. ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद अगले दिन (द्वादशी) को व्रत तोड़ना चाहिए।

अजा एकादशी व्रत कथा (Aja Ekadashi Vrat Katha):

अर्जुन ने पूछा- 'हे पुण्डरीकक्ष! मुझे भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में बताइए। इस एकादशी का नाम क्या है और इसके व्रत का विधान क्या है? इस एकादशी व्रत का क्या फल है?'

श्री कृष्ण कहते हैं- 'हे कुंती पुत्र! भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष पर यह एकादशी पड़ती है। इसका पालन करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान की पूजा करने वाले सभी लोगों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी के व्रत के समान संसार में और कोई व्रत नहीं है जो संसार के लोगों की सहायता करता है।

अब इस एकादशी की महिमा पर ध्यान दें - पौराणिक काल में अयोध्या नगरी में एक चक्रवर्ती राजा राज्य करते थे। उनका नाम हरिश्चंद्र था। वह बहुत बहादुर, राजसी और सच्चा राजा थे। राजा ने स्वप्न में अपने राज्य को एक ऋषि को दान कर दिया और उन्हें अपनी स्त्री और पुत्र को भी बेचना पड़ा। वह स्वयं एक चांडाल के दास बने। उन्होंने उस चांडाल के लिए कफन लेने का काम किया, लेकिन इस दौरान काम में भी सच्चाई नहीं छोड़ी।

जब इस तरह से कई साल बीत गए, तो उन्होंने अपने कर्मों को लेकर बहुत दुःख महसूस किया और उससे छुटकारा पाने के तरीके खोजने लगे। उन्हें हमेशा यह चिंता सताने लगी कि मुझे क्या करना चाहिए? मैं इस दुष्ट कृत्य से कैसे छुटकारा पा सकता हूं? एक बार गौतम ऋषि उनके पास पहुंचे। हरिश्चंद्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुख भरी कहानी सुनाई।

राजा हरिश्चंद्र की दुःख भरी कहानी सुनकर महर्षि गौतम भी बहुत दुखी हुए और उन्होंने राजा से कहा- राजन! भादों के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा है। आपको उस एकादशी का व्रत करना चाहिए और रात्रि जागरण करना चाहिए। इससे आपके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।

अजा नामक एकादशी के दिन, राजा हरिश्चंद्र ने उपवास किया और महर्षि के निर्देशों के अनुसार रात्रि जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव के कारण राजा के सभी पाप नष्ट हो गए। उस समय, स्वर्ग में ढोल बजने लगे और फूलों की बारिश होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश और देवेंद्र जैसे देवताओं को अपने सामने खड़ा पाया। अपने मृत पुत्र को जीवित देखा और उनकी पत्नी शाही वस्त्र और गहनों से सजी हुई थीं।

व्रत के प्रभाव से राजा ने अपना राज्य वापस पा लिया। वास्तव में, एक ऋषि ने राजा की परीक्षा लेने के लिए यह सब किया था, लेकिन अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से, ऋषि द्वारा बनाए गए सभी भ्रम समाप्त हो गए और अंत में हरिश्चंद्र अपने परिवार के साथ स्वर्ग चले गए।

मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने वाले और रात्रि जागरण करने वालों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इस एकादशी व्रत की कथा सुनने मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ का फल मिल सकता है।

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