किसी ने बुलाया भी नहीं, फिर भी कभी-कभी हमें खुद का ही नाम सुनाई देता है, आखिर क्यों

किसी ने बुलाया भी नहीं और फिर भी खुद का नाम सुनाई देना डरने वाली बात नहीं है, बल्कि यह दिमाग का खेल है। आज हम आपको इसी अनुभव के पीछे का कारण बताएंगे कि आखिर लोगों के साथ इस तरह की घटनाएं क्यों होती हैं।

Authored by: पंकज यादवUpdated Jan 14 2026, 14:56 IST
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क्या आपके साथ कभी हुआ ऐसा?

कभी ऐसा हुआ है कि आप कहीं जा रहे हों या फिर बिल्कुल किसी शांत माहौल में बैठे हों और अचानक लगे कि किसी ने आपका नाम पुकारा है, लेकिन आसपास देखने पर कोई नहीं होता है। ऐसा अक्सर कई लोगों के साथ होता है, ऐसा हमें क्यों लगता है? आज हम आपको इसी बारे में बताने जा रहे हैं।

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क्यों होता है ऐसा?

दरअसल, इसके पीछे कुछ और नहीं बल्कि हमारे दिमाग की करतूत होती है। असल में हमारा नाम ही हमारी पहचान है, और यह हमारे लिए बहुत मायने रखती है। हमारे दिमाग में सबसे पहले हमारा नाम ही डाला जाता है, इसलिए हमारा दिमाग हमारे नाम को ऐसी जगह स्टोर करता है जिसे भूलना थोड़ा मुश्किल होता है।

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हमेशा अलर्ट मोड में रहता है दिमाग

इसके पीछे एक वजह यह भी है कि इंसान के दिमाग को कुछ ऐसा बनाया गया है कि वह हर वक्त संभावित खतरों पर तुरंत अलर्ट हो जाता है। चूंकि हमारे दिमाग के लिए हमारा नाम काफी अहम लगता है, इसलिए दिमाग किसी भी हल्की आवाज, हवा की सरसराहट या दूर की आवाज को भी नाम की तरह समझ लेता है।

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​क्या कहते हैं इसे?

विज्ञान की भाषा में इसे श्रवण मतिभ्रम (ऑडिटरी मिसपरसेप्शन) (Auditory Misperception) कहते हैं। इस नाम से साफ है कि यह घटना हमारे दिमाग को भ्रम में डाल देती है।

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​थकान या तनाव भी हो सकती है इसके पीछे की वजह

इसके पीछे दूसरी वजह यह हो सकती है कि जब भी हम थके या फिर तनाव में होते हैं, तब दिमाग सही तरीके से किसी भी जानकारी को प्रोसेस नहीं कर पाता। ऐसे में वह खुद-ब-खुद आवाजें बना लेता है। इस तरह की घटना अक्सर लोगों के साथ रात के समय या फिर उनके अकेले होने पर होती है।

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दिमाग की याददाश्त का खेल

चूंकि हम दिन में कई बार अपना नाम सुनते हैं, इसलिए दिमाग उसे सबसे आसान पहचान मान लेता है। किसी अनजान आवाज को समझने में वह उसी नाम का सहारा लेता है। इस वजह से लोगों को शांत माहौल में कभी-कभी खुद का नाम सुनाई देता है।

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कब देना चाहिए ध्यान

दिमाग के साथ होने वाली यह घटना कोई मानसिक बीमारी नहीं है। जब तक यह बहुत बार या लगातार न हो, तब तक इसे नॉर्मल ही माना जाता है। अगर आपके साथ इस तरह की घटनाएं बार-बार होती हैं और यह आपकी जिंदगी को प्रभावित कर रही है, तो इस मामले में आप किसी डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह जरूर ले लें।