‘ऐसा कोई सगा नहीं जिसको नीतीश ने ठगा नहीं’, जानिए लालू के नीतीश पर इस सियासी हमले की कहानी

पटना समाचार
श्वेता सिंह
श्वेता सिंह | सीनियर असिस्टेंट प्रोड्यूसर
Updated Oct 15, 2020 | 14:04 IST

Bihar Chunav 2020: सियासी अखाड़ा ऐसा स्थान है, जहां खून के रिश्ते भी दुश्मनी में तब्दील हो जाते हैं, फिर इसके आगे दोस्ती क्या चीज है। बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव के बीच 36 का आंकड़ा पुराना है।

 Lalu Yadav's jibe on Nitish Kumar political tussle between two leaders
लालू यादव और नीतीश के बीच 36 का आंकड़ा पुराना है।  |  तस्वीर साभार: PTI

मुख्य बातें

  • वर्ष 1990 में लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री पद पर बिठाने के लिए नीतीश ने एड़ी-चोटी का बल लगाया
  • चारा घोटाले में जेल की सजा काट रहे लालू यादव के पीछे नीतीश का हाथ बताया जाता है
  • 1994 में नीतीश लालू का साथ छोड़कर जॉर्ज फर्नांडीज के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई

नीतीश लालू के खट्टे-मीठे रिश्ते जानने के लिए आपको अतीत के पन्नों की सुगंध लेना बहुत आवश्यक है। इतिहास और अतीत के बिना न तो वर्तमान खड़ा रह सकता है और न ही इस पर भविष्य रूपी इमारत खड़ी हो सकती है। लालू-नीतीश की दोस्ती के वो पल भी थे जब लालू को मुख्यमंत्री बनाने के लिए नीतीश ने एड़ी चोटी का बल लगा दिया था। समय के करवट बदलने के साथ ही नीतीश लालू के रिश्ते में इतनी दूरी आ गई कि लालू यादव अपने उस जिगरी दोस्त को ठग कहने लगे। चलिए एक नजर डालते हैं नीतीश-लालू के इस बनते-बिगड़ते रिश्ते पर।  

लालू-नीतीश की जय वीरू वाली दोस्ती  
राजनीति के इतिहास के उन पन्नों को जरा खंगालें जिसमें 1990 की राजनीति दर्ज है। वो भी क्या दौर था। नीतीश की अपने जिगरी दोस्त लालू को मुख्यमंत्री बनाने की ऐसी ललक थी कि वो जमकर मेहनत किए और दोस्ती का फर्ज अदा करते हुए दोस्त को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा भी दिया। नीतीश कुमार लालू प्रसाद यादव के अहम सलाहकार के रूप में उभरकर सामने आए।  

चुनावी दंगल में दोस्त से बने प्रतिद्वंदी
1990 की ये दोस्ती चार साल में ही ऐसी दुश्मनी में बदली कि 1994 में नीतीश लालू का साथ छोड़कर जॉर्ज फर्नांडीज के साथ आ गए और उनके साथ मिलकर समता पार्टी बनाई। अगले चुनाव में नीतीश को केवल सात सीटें मिलीं। हालांकि लालू यादव फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बने। खबर तो ये भी थी कि नीतीश ने लालू के साथ ऐसी दुश्मनी साधी कि चारा घोटाले मामले में जांच के लिए याचिका के पीछे इन्हीं का हाथ था। नीतीश ने दोस्ती के साथ साथ खूब दुश्मनी भी निभाई। आजतक लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले मामले में जेल में हैं। राज्य में विधान सभा चुनाव में प्रचार के लिए भी लालू को जमानत नहीं मिली। 2003 में नीतीश ने बीजेपी के साथ हाथ मिलाया और 2005 के विधान सभा चुनाव से लालटेन की लौ को फूंक मरकर बुझा दिया। ये पहला समय था जब नीतीश मुख्यमंत्री बने।  

2015 में फिर आए साथ और मोदी लहर को किया फीका  
नीतीश-लालू की दुश्मनी दोस्ती एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कभी एक ऊपर होता है तो कभी दूसरा। बीजेपी से मन मुटाव होने के बाद और मन में प्रधानमंत्री का सपना संजोने वाले नीतीश कुमार बीजेपी से अलग हो गए और एक बार फिर से राष्ट्रीय जनता दल में शामिल हो गए। दोनों की दोस्ती रंग लायी. मोदी लहर के बाद भी बीजेपी को बड़ा नुकसान हुआ। अगले ही साल 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक का नीतीश ने समर्थन क्या किया, लालू नीतीश की दोस्ती में दरार पड़ने लगी।  

‘ऐसा कोई सगा नहीं जिसे नीतीश ने ठगा नहीं’
सियासत ने अपना रंग खूब दिखाया। दो जिगरी दोस्तों को राजनीती के अखाड़े में आमने-सामने ला खड़ा किया। नीतीश बिन पेंदी के लोटे की तरह राजद और बीजेपी के बीच झूलते रहे। नीतीश की चालबाजियों को देख लालू ने अपने इसी जिगरी दोस्त को एक ठग बना दिया। लालू ने कहा कि नीतीश का कोई सगा नहीं है। राजनीति में ऐसा कोई नहीं जो नीतीश की ठगी का शिकार न हुआ हो।  

राजनीति के गलियारे में भले ही उन्हें बिन पेंदी का लोटा कहा जाने लगा लेकिन असलियत तो ये है कि नीतीश बड़ी होशियारी से पाला बदलते हैं। यही कारण है कि चाहे वो जिस पार्टी के साथ रहें मुख्यमंत्री वही रहते हैं।  
 

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