Edison Of India: अगर हम आपको बताएं कि आजादी से पहले भी कोई ऐसा भारतीय था जो इलेक्ट्रिक मोटर बना रहा था, कार डिजाइन कर रहा था, वोटिंग मशीन का आइडिया दे रहा था, कैमरे के लिए नए उपकरण विकसित कर रहा था और तकनीकी शिक्षा की नींव रख रहा था। झटका लगा ना ये सुनकर। लेकिन ये किसी कहानी का किरदार नहीं, बल्कि हकीकत है। इस शख्स का नाम है जी. डी. नायडू जिनको भारत का एडिसन भी कहा जाता है।
जी. डी. नायडू की चर्चा यहां इसलिए हो रही है क्योंकि अभी तक इतिहास में दबी इनकी कहानी अब पर्दे पर आने को तैयार है। जिस व्यक्ति को आजादी के 75 साल बाद तक याद नहीं किया गया, उसके जीवन को पर्दे पर अभिनेता आर. माधवन जीवंत करने जा रहे हैं। जी डी नायडू की बायोपिक G.D.N का ऑफिशियल ट्रेलर हाल ही में रिलीज हुआ है और जिसने भी इसे देखा है - उसका एक ही सवाल है कि इस गजब की पर्सनैलिटी को आज तक किताबों में पढ़ाया क्यों नहीं गया है। हालांकि इससे पहले भी नायडू के जीवन को दिखाती हुई एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म रिलीज हो चुकी है। जिसे के.रंजीत कुमार ने निर्देशित किया था। इस फिल्म ने 66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी फिल्म का पुरस्कार जीता । इसके साथ ही उनकी जीवनी 'अप्पा' भी प्रकाशित हो चुकी है, जिसे तमिल लेखक 'शिवशंकरि' ने लिखा है।
नायडू क्यों कहलाए 'भारत के एडिसन'
G.D.N (Gopalswamy Doraiswamy Naidu) फिल्म का ट्रेलर नायडू के मजबूत तकनीकी विजन की झलक देता है। उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद भारतीय तकनीक को नई दिशा देने का सपना देखा था और उसे बहुत हद तक पूरा भी किया। उनके भीतर मशीनों को समझने की ऐसी भूख थी, जिसने उन्हें किताबों से आगे जाकर प्रयोगों की दुनिया में पहुंचा दिया। यही कारण है कि उन्हें 'भारत का एडिसन' नाम भी दिया गया।
कौन हैं गोपालस्वामी दोरैस्वामी नायडू
सीमित साधनों के बावजूद बड़े सपने देखने और उसको पूरा करने का दम रखने वाली पर्सनैलिटीज की लिस्ट में शामिल है गोपालस्वामी दोरैस्वामी नायडू का नाम। वह वो असाधारण भारतीय रहे जिन्होंने देश को तकनीक की दुनिया में हाथ पकड़कर चलना सिखाया था। एक साधारण किसान परिवार का लड़का, जिसकी जिज्ञासा ही उसकी सबसे बड़ी डिग्री थी। 23 मार्च 1893 को तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के कलंगल गांव में जन्मे जी. डी. नायडू किसी प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र नहीं थे।
G. D. Naidu के बारे में 5 मुख्य बातें (AI Image)
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तीसरी क्लास में छूटी पढ़ाई पर सीखना नहीं छूटा
गोपालस्वामी दोरैस्वामी नायडू का बचपन बेहद साधारण था। घर की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी। पढ़ाई भी ज्यादा नहीं हो सकी। उन्होंने केवल तीसरी कक्षा तक ही स्कूल की शिक्षा हासिल की। आज के दौर में जहां लोग अच्छी नौकरी के लिए बड़ी-बड़ी डिग्रियों का सपना देखते हैं, वहां जी.डी. नायडू की कहानी बिल्कुल अलग थी। उनके लिए स्कूल की किताबों से ज्यादा आकर्षण मशीनों में था। लोग उन्हें पढ़ाई छोड़ने वाला लड़का कहते थे, लेकिन शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि यही लड़का एक दिन भारत की तकनीकी क्रांति का चेहरा बनेगा।
एक मोटरसाइकिल ने बदली जिंदगी
कहते हैं कि इंसान की जिंदगी बदलने के लिए कभी-कभी सिर्फ एक पल काफी होता है। जी.डी. नायडू के जीवन में भी ऐसा ही पल तब आया था, जब वे करीब 16 साल के थे। उन्होंने पहली बार एक ब्रिटिश अधिकारी को मोटरसाइकिल से जाते हुए देखा। वह सिर्फ एक बाइक नहीं थी बल्कि उनके लिए चलती-फिरती इंजीनियरिंग की किताब थी। उस दिन के बाद मशीनों के प्रति उनका जुनून ऐसा बढ़ा कि उन्होंने तय कर लिया कि उन्हें जिंदगी मशीनों के बीच ही बितानी है।
जब उन्होंने अपनी पहली मोटरसाइकिल खरीदी तो उसे केवल चलाया नहीं, बल्कि पूरी तरह खोलकर उसके हर पुर्जे को समझा। इंजन कैसे काम करता है, गियर कैसे घूमते हैं, बिजली कैसे पैदा होती है- हर सवाल का जवाब उन्होंने खुद खोजा और यहीं से शुरू हुई भारत के सबसे बड़े इनोवेटर्स में से एक की जीवन यात्रा।
देश की पहली इलेक्ट्रिक मोटर की तैयार
साल 1937 भारतीय औद्योगिक इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। इस साल जी. डी. नायडू ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर भारत के लिए अपनी पहली इलेक्ट्रिक मोटर तैयार की। उस समय ज्यादातर मशीनें विदेशों से आती थीं और भारत तकनीकी रूप से विदेशी सामान पर निर्भर था।
उनकी बनाई इलेक्ट्रिक मोटर ने यह साबित कर दिया कि भारत सिर्फ विदेशी तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता भी बन सकता है। बाद में इसी सोच ने भारतीय मशीन निर्माण उद्योग को नई दिशा दी और इसके आधार पर कई औद्योगिक संस्थानों के विकास की नींव रखी। आज जब 'मेक इन इंडिया' की बात होती है, तब जी. डी. नायडू का काम दशकों पहले उसी विचार का बेबी स्टेप दिखाई देता है।
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सैकड़ों आविष्कारों ने दुनिया को किया हैरान
अगर आपको लगता है कि उनका योगदान केवल इलेक्ट्रिक मोटर तक सीमित था, तो यह सबसे बड़ी गलतफहमी होगी। उन्होंने ऐसे-ऐसे प्रयोग किए, जो अपने समय से कई साल आगे थे। उन्होंने एक-दो नहीं बल्कि दर्जनों उपयोगी उपकरण तैयार किए। जिसमें-
- केरोसिन से चलने वाला पंखा
- Rasant Electric Razor
- मैकेनिकल कैलकुलेटर
- टिकट वेंडिंग मशीन
- कम कीमत वाला Five-Valve Radio
- कैमरे के लिए कई उपयोगी उपकरण
- इलेक्ट्रिकल मशीनें
इन आविष्कारों की सबसे खास बात यह थी कि वे आम भारतीयों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। नायडू का मानना था कि टेक्नोलॉजी केवल अमीरों तक सीमित न रहे, बल्कि इसकी पहुंच हर आम भारतीय तक हो। इतना ही नहीं उन्होंने रेडियो निर्माण, ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग और कृषि अनुसंधान में भी काफी योगदान दिया। उस समय कपास, मक्का और पपीते की नई किस्मों पर उनका शोध काफी चर्चित रहा था। यानी वे सिर्फ इंजीनियर नहीं थे, बल्कि उन्हें कई तरह के नए शोधों से देश की तरक्की में अपनी योगदान दिया।
G D Naidu के अविष्कार (AI Image)
देश की पहली कार बनाने का सपना
आज भारत दुनिया के बड़े ऑटोमोबाइल बाजार में शामिल है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जी. डी. नायडू ने साल 1950 के दशक में बेहद कम कीमत वाली भारतीय कार बनाने की कोशिश की थी। उन्होंने टू-सीटर पेट्रोल कार तैयार की, जिसकी कीमत उस समय लगभग 2000 रुपये रखने की योजना थी। हालांकि यह कार कभी बाजार में नहीं उतर पाई।
यदि यह परियोजना आगे बढ़ती तो शायद भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग का इतिहास कुछ और ही होता। लेकिन उस समय कुछ जरूरी सरकारी लाइसेंस न मिलने के कारण इसका बड़े स्तर पर उत्पादन नहीं हो सका और भारत का अपनी पहली किफायती कार बनाने का सपना अधूरा रह गया। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा अधूरा सपना माना जाता है।
तकनीकी शिक्षा को दी एक नई दिशा
जी. डी. नायडू का मानना था कि भारत तभी आगे बढ़ेगा जब यहां के युवा सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि उनका कौशल विकास भी होगा। उन्होंने तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कोयंबटूर में पॉलिटेक्निक शिक्षा के विकास में बड़ा योगदान दिया। कुछ समय बाद यही संस्थान आगे चलकर तकनीकी शिक्षा के प्रमुख केंद्रों में शामिल हुए।
उनका मानना था कि इंजीनियरिंग केवल किताबों से नहीं सीखी जा सकती है। बल्कि इसके लिए लैब, मशीन और जमीनी काम ही सबसे बड़े शिक्षक हैं। आज जब स्किल डेवलपमेंट और स्टार्टअप की बात होती है, तब उनके विचार और भी प्रासंगिक लगते हैं।
क्यों कहा गया उन्हें 'भारत का एडिसन'?
थॉमस अल्बा एडिसन को दुनिया उनके हजारों पेटेंट और डेली यूज के आविष्कारों के लिए जानती है। जी. डी. नायडू के साथ भी कुछ ऐसा ही था। उन्होंने तकनीक को आम लोगों के काम की चीज बनाने की कोशिश की। उनका ध्यान सिर्फ प्रयोग करने पर नहीं, बल्कि ऐसी मशीनें बनाने पर था जिन्हें लोग आम जीवन में इस्तेमाल कर सकें। इसी वजह से उन्हें 'Edison of India' और 'Miracle Man' भी कहा जाता था।
युवाओं के क्यों खास है G.D.N फिल्म
जानेमाने अभिनेता आर. माधवन द्वारा अभिनीत फिल्म G.D.N सिर्फ एक बायोपिक नहीं, बल्कि भारत के इनोवेशन फील्ड की भूली हुई विरासत को सामने लाने की कोशिश दिखाई देती है। हाल ही में जारी ट्रेलर में जी. डी. नायडू के संघर्ष, एक्सपेरिमेंट, असफलताओं और उपलब्धियों की झलक देखने को मिलती है। इस फिल्म का उद्देश्य नई पीढ़ी को यह बताना है कि भारत में भी ऐसे वैज्ञानिक और आविष्कारक हुए हैं जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने कारनामों से दुनिया को चौंका दिया। इसके अलावा फिल्म में यह संदेश भी साफ दिखाई देता है कि असली प्रतिभा किसी डिग्री की मोहताज नहीं होती है।
इतिहास के पन्नों से बाहर निकला असली हीरो
कुछ लोग अपने समय से बहुत आगे होते हैं। इसलिए उनका महत्व अक्सर आने वाली पीढ़ियां समझती हैं। जी. डी. नायडू ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उन्होंने भारत की पहली इलेक्ट्रिक मोटर बनाई, तकनीकी शिक्षा को नई दिशा दी, इंडस्ट्री को रफ्तार दी, सैकड़ों उपयोगी आविष्कार किए और यह साबित किया कि जुनून, मेहनत और एक्सपेरिमेंट की शक्ति किसी भी बड़ी डिग्री से बड़ी हो सकती है। शायद यही वजह है कि दशकों बाद जब G.D.N का ट्रेलर रिलीज हुआ, तो लाखों लोगों ने पहली बार उस शख्स के बारे में जानना शुरू किया जिसे कभी 'भारत का एडिसन' कहा जाता था।
बहरहाल अब उनकी कहानी पर्दे पर आने को तैयार है तो उम्मीद है कि देश के सैंकड़ों युवाओं के लिए यह एक प्रेरणा बनेगी और देश को मेक इन इंडिया के तहत युवा शक्ति के साथ और मजबूत करेगी।
