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‘दायरा’ की कहानी, दिल्ली की वारदात और निर्भया की याद: आखिर महिलाओं की सुरक्षा का सवाल खत्म क्यों नहीं हुआ?

'दायरा' का ट्रेलर ऐसे अपराध के बाद पैदा होने वाले सबसे मुश्किल सवालों को सामने रखता है जैसे अपराध के बाद न्याय कैसे मिले? न्याय दिलाने के लिए पुलिस किस हद तक जा सकती है और अगर कानून लागू करने वाला ही कानून की सीमा लांघ दे तो जवाबदेही किसकी होगी?

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निर्भया के बाद भी क्यों नहीं बदला देश?
Edited by: शिव शुक्ला
Updated Aug 31, 2026, 23:01 IST
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महिलाओं के प्रति दुष्कर्म जैसे घृणित अपराध और उसके बाद पुलिसिया एक्शन और उससे उठे न्याय और सजा के बीच उलझे सवालों के जवाब खोजती करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन स्टारर बहुप्रतीक्षित फिल्म 'दायरा' (Daayra) का ट्रेलर आज यानी 31 अगस्त को रिलीज हो गया है। 'दायरा' का ट्रेलर ऐसे अपराध के बाद पैदा होने वाले सबसे मुश्किल सवालों को सामने रखता है जैसे अपराध के बाद न्याय कैसे मिले? न्याय दिलाने के लिए पुलिस किस हद तक जा सकती है और अगर कानून लागू करने वाला ही कानून की सीमा लांघ दे तो जवाबदेही किसकी होगी? इस फिल्म में करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन दो पुलिस अधिकारियों के किरदार में आमने-सामने हैं। इसकी कहानी एक महिला के साथ दुष्कर्म के बाद अपराधियों के विवादित एनकाउंटर की जांच के जरिए न्याय और प्रक्रिया के बीच के तनाव को सामने लाती है।

महिला अपराध को केंद्र में रखकर आने वाली फिल्म'दायरा'का ये ट्रेलर तब सामने आया है जब राजधानी दिल्ली और उससे सटे नोएडा में एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने महिला सुरक्षा के दावों की कलई खोलकर रख दी है। राजधानी दिल्ली और उससे सटे नोएडा में चलती बस में ड्राइवर और कंडक्टर द्वारा 16 साल की नाबालिग संग सामूहिक दुष्कर्म की हालिया वारदात के बाद टीवी से लेकर सड़क और सोशल मीडिया तक हर कहीं सिर्फ ऐसे दरिंदों को दी जाने वाली सजा, पुलिसिया और कानूनी कार्रवाई के साथ ही महिला सुरक्षा को लेकर बहस शुरू हो गई है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर देश में महिलाएं आखिर कितनी सुरक्षित हैं? कानून बनने और सख्त होने के बावजूद महिलाओं के प्रति अपराध आखिर क्यों नहीं रुक रहे? क्या समस्या सिर्फ पुलिस व्यवस्था की है या इसके पीछे समाज की सोच,न्याय प्रक्रिया और अपराधियों में कानून का डर कमजोर होना भी बड़ी वजह है?

आज की दिल्ली की घटना ने फिर डराया

आज दिल्ली-एनसीआर में सामने आई एक वारदात ने भी इसी पुराने सवाल को फिर जिंदा कर दिया है। दिल्ली-एनसीआर 16 साल की एक किशोरी के साथ चलती बस में कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया है। ये घटना इस महीने की शुरुआत यानी चार-पांच अगस्त की बताई जा रही है। पुलिस ने बस के चालक और कंडक्टर को गिरफ्तार किया है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक बस में लगे कैमरे भी काम नहीं कर रहे थे। फिलहाल पुलिस इस मामले में जांच कर रही है और मामले की तह तक जाने में लगी है।

निर्भया की याद हुई ताजा

लेकिन इस घटना ने एक बार फिर 16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड की याद ताजा कर दी हैं।उस रात दिल्ली की सड़कों पर जो हुआ था, देश उसे आज भी भूल नहीं पाया है। उस रात एक चलती बस में 23 साल की युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। उसके साथ बर्बरता की गई और कुछ दिनों बाद उसकी मौत हो गई। उस घटना के बाद दिल्ली ही नहीं, पूरा देश सड़कों पर उतर आया था।

निर्भया आंदोलन ने सरकार को कानून बदलने के लिए मजबूर किया। यौन अपराधों से जुड़े कानूनों को सख्त किया गया। बलात्कार और यौन हिंसा के कई मामलों में सजा के प्रावधान बढ़ाए गए। पुलिस और न्याय व्यवस्था में सुधार की मांग तेज हुई। महिलाओं की सुरक्षा के लिए CCTV, हेल्पलाइन, सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा और दूसरी व्यवस्थाओं पर भी जोर दिया गया। उस वक्त लगा था कि शायद अब चीजें बदलेंगी, लेकिन करीब डेढ़ दशक बाद भी सवाल जस का तस है।

ये है महिला सुरक्षा का असली मतलब

हम जब महिला सुरक्षा की बात करते हैं तो अक्सर रात में सड़क पर पुलिस गश्त,स्ट्रीट लाइट या CCTV की चर्चा करते हैं। ये जरूरी हैं,लेकिन सबसे जरूरी है पारदर्शी और निश गर उसके साथ कुछ गलत होता है तो वह बिना डर के पुलिस के पास जा सके।

निर्भया के बाद बहुत कुछ बदला,लेकिन सब कुछ नहीं

यह कहना भी सही नहीं होगा कि निर्भया के बाद कुछ बदला ही नहीं। कानून में बदलाव हुए, पुलिस व्यवस्था में कई सुधार हुए,महिलाओं के लिए हेल्पलाइन और सहायता तंत्र मजबूत हुए और यौन अपराधों को लेकर समाज में पहले के मुकाबले ज्यादा खुलकर बात होने लगी। लेकिन किसी कानून की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जाती कि उसे कितनी सख्ती से लिखा गया है। यह भी देखना पड़ता है कि वह जमीन पर कितना लागू हो रहा है। पुलिस से लेकर परिवहन व्यवस्था तक,स्कूलों से लेकर अदालतों तक और परिवार से लेकर समाज की सोच तक महिला सुरक्षा कई स्तरों पर जुड़ी हुई है।

‘दायरा’ हमें क्या सोचने पर मजबूर करती है?

आगामी फिल्म का नाम ही ‘दायरा’ है और शायद यही शब्द इस पूरे मुद्दे को समझने में मदद करता है। 'दायरा’जैसी फिल्में हमें अपराध के बाद न्याय की प्रक्रिया पर सोचने के लिए मजबूर करती हैं। वहीं, वास्तविक घटनाएं इससे भी कठिन सवाल सामने रखती हैं क्या हमारी व्यवस्था अपराध होने से पहले किसी लड़की को सुरक्षित रखने में सक्षम है?

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