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दायरा के अक्स में लड़कियों की सुरक्षा पर बात, क्यों नहीं खत्म हो रहा ‘निर्भया’ का दर्द? सिस्टम के लूपहोल पर बात

निर्भया केस के बाद कानून में बड़े बदलाव हुए। लेकिन कानून बना देना और उसका प्रभावी तरीके से लागू होना दो अलग बातें हैं। महिला सुरक्षा की असली परीक्षा पुलिस स्टेशन से लेकर अदालत तक पूरी प्रक्रिया में होती है।

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लड़कियों के खिलाफ अपराध पर लगाम क्यों नहीं लग पा रहा (AI Photo)
Curated by: शिशुपाल कुमार
Updated Sep 1, 2026, 18:21 IST
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दायरा, यानी कि सीमा, हमारे समाज में आमतौर पर इस दायरे की बात बच्चे आमतौर पर जबसे सोचने समझने लायक होते हैं, सुनते रहते हैं, लेकिन बच्चों में लड़के शामिल नहीं होते, लड़कियां होती हैं। ये दायरे का ज्ञान घर से समाज से, स्कूल से हर जगह से उसे मिलता है। वर्तमान समय में दिल्ली में एक ऐसी घटना घटी है, जिससे इस दायरे पर बात होना जरूरी है। दायरे में रखने वाले सिस्टम पर बात करना जरूरी है। आखिर जो सिस्टम लड़कियों को दायरे में रखने की बात करता रहा है, वो सिस्टम क्यों नहीं सुधर रहा है। दिल्ली एनसीआर में दिन दहाड़े एक बस में एक नाबालिग के साथ रेप होता है, बस नोएडा से दिल्ली तक सड़कों पर चलते रहती है और कोई उसे रोक नहीं पाता है, कोई मासूम की चीख सुन नहीं पाता है। दायरे की बात करने वाला सिस्टम खुद सोया रहता है। 16 दिसंबर 2012 को भी कुछ ऐसा ही हुआ था, जब दिल्ली की सड़कों पर एक बस में निर्भया दरिंदों का शिकार बनी थी। 2012 के निर्भया कांड ने देश को झकझोर दिया था, कानून बदले, व्यवस्थाओं में सुधार के दावे हुए, लेकिन अगर आज भी ऐसी घटनाएं हमें वही दर्द महसूस करा रही हैं, तो कहीं न कहीं सिस्टम के उन लूपहोल्स को पहचानना और उन्हें भरना जरूरी है, जिनसे अपराधी बच निकलते हैं और पीड़ित को बार-बार लड़ना पड़ता है। अब सवाल ये है कि आखिर सिस्टम में ऐसा क्या है, जो सुधर नहीं रहा है, सिस्टम में कितने और कहां-कहां लूपहोल्स हैं?

निर्भया के बाद क्या बदला?

फिल्म ‘दायरा’ के अक्स में अगर हम महिलाओं की सुरक्षा की हकीकत को देखें, तो तस्वीर सिर्फ अपराध की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की भी है जो घटना के बाद सक्रिय तो होता है, लेकिन घटना को रोकने में अक्सर नाकाम नजर आता है। निर्भया कांड के बाद आपराधिक कानून में बड़े बदलाव किए गए। बलात्कार, यौन उत्पीड़न, पीछा करने और महिलाओं पर एसिड अटैक जैसे अपराधों को लेकर कानूनी प्रावधानों को मजबूत किया गया। जांच और मुकदमे की प्रक्रिया को तेज करने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था भी बढ़ाई गई। लेकिन कानून बना देना और उसका जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू होना दो अलग बातें हैं। महिला सुरक्षा की असली परीक्षा पुलिस स्टेशन से लेकर अदालत तक पूरी प्रक्रिया में होती है।

क्या कानून कमजोर है?

2012 के निर्भया कांड के बाद कानून में कई बदलाव हुए। पहली बार स्टॉकिंग, वोयरिज्म (छिपकर किसी महिला को देखना/रिकॉर्ड करना), यौन उत्पीड़न और महिला को निर्वस्त्र करने की कोशिश जैसे अपराधों के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान किए गए। लेकिन उसके बाद भी हो रही लगातार महिला अपराधों को देखकर यही लगता है कि कानून में बदलाव से अपराधियों पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। उत्तर प्रदेश के डीजीपी रहे ओपी सिंह (ओम प्रकाश सिंह) कहते हैं कि कानून कमजोर नहीं है। समस्या उसके प्रभावी और निरंतर अमल की है। निर्भया के बाद कानून अधिक कठोर हुए, लेकिन केवल कठोर सजा अपराध नहीं रोकती। असली डिफरेंस तब पैदा होता है जब अपराधी को यह भरोसा हो कि पकड़े जाने की संभावना बहुत अधिक और कार्रवाई त्वरित होगी। इस घटना को कानून की नहीं, बल्कि इंफोर्समेंट और प्रिवेंटिव पुलिसिंग की विफलता के रूप में देखना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ओपी सिंह

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ओपी सिंह

सिस्टम का पहला लूपहोल- शिकायत दर्ज कराने की चुनौती

किसी महिला के साथ अपराध होने के बाद सबसे पहला सवाल होता है-क्या वह बिना डर पुलिस के पास जा सकती है? कई मामलों में पीड़िता और उसका परिवार शिकायत ही दर्ज करना में फंसा रह जाता है। सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि पुलिस व्यवस्था मौजूद है। सवाल यह है कि जरूरत के वक्त वह कितनी आसानी से उपलब्ध होती है। महिलाओं के मुद्दे पर काम करने वाली और 'शी इज इंडिया' की फाउंडर ऋचा सिंह कहती हैं, "कहीं न कहीं सिस्टम सहभागी लगता है, क्योंकि अधिकतर बार ऐसी घटना होने के बाद जब पुलिस के पास पीड़िता पहुंचती है तो उसकी सुनवाई सही से नहीं होती है, प्रशासन की ओर से तुरंत और जरूरी जो मदद मिलनी चाहिए, वो नहीं मिलती है, तो ये सिस्टम के पार्ट पर फेलियर से ज्यादा सहभागिता ही है, फेलियर तो तब होता, जब आपने प्रयास किया, आप प्रयास ही नहीं कर रहे हैं।"

पुलिस की शुरुआती जांच कितनी मजबूत?

गंभीर अपराध के मामलों में शुरुआती कुछ घंटे बेहद अहम होते हैं। घटनास्थल को सुरक्षित रखना, सबूत जुटाना, CCTV फुटेज हासिल करना, डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखना और गवाहों के बयान दर्ज करना-इन सभी में थोड़ी भी लापरवाही बाद में केस को कमजोर कर सकती है। यही वजह है कि महिला सुरक्षा को सिर्फ पुलिस गश्त और CCTV कैमरों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। तकनीक तभी प्रभावी है, जब उसके जरिए मिले सबूतों पर तेजी और पेशेवर तरीके से कार्रवाई भी हो।

जांच से न्याय तक लंबा रास्ता

किसी आरोपी की गिरफ्तारी को न्याय नहीं कहा जा सकता। न्याय तब होगा जब जांच पूरी हो, आरोप साबित हों और अदालत समय पर फैसला दे। लंबी कानूनी प्रक्रिया पीड़ित परिवार के लिए मानसिक और आर्थिक तौर पर बेहद मुश्किल हो सकती है। गवाहों का मुकरना, जांच में देरी, फॉरेंसिक रिपोर्ट में समय लगना और अदालतों में लंबित मामलों का दबाव-ये सभी न्याय की रफ्तार को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए सवाल सिर्फ “आरोपी पकड़ा गया या नहीं?” का नहीं है। सवाल यह भी है कि “मामला कितनी मजबूती से अदालत तक पहुंचा और पीड़िता को न्याय कब मिला?”

महिला कार्यकर्ता ऋचा सिंह

महिला कार्यकर्ता ऋचा सिंह

कहां है सुधार की जरूरत?

सुधार कानून से ज्यादा, उसे जिनपर पालन करवाने की जिम्मेदारी है, वहां जरूरत है। सिस्टम में बैठे अधिकारी और कर्मियों को सतर्क होने की जरूरत है, त्वरित कार्रवाई की जरूरत है, ताकि अपराधियों के मन में डर बैठे। अब दिल्ली की ही घटना को लीजिए, रेप 4 अगस्त हुआ, शिकायत भी पीड़िता ने तुरंत दर्ज करवाई, लेकिन आरोपी की गिरफ्तारी 31 अगस्त को हुई। आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ही यह मामला सामने आया, इस मामले पर भी पर्दा डाला गया। मतलब एक तो घटना घटी, उसमें प्रशासन की लापरवाही तो है ही, बाद में भी लापरवाही होती दिखी। पूर्व आईपीएस अधिकारी ओपी सिंह कहते हैं, " यही हमारी व्यवस्था की एक बड़ी कमी है। आपराधिक जवाबदेही और प्रशासनिक जवाबदेही अलग-अलग हैं। आरोपी को सजा मिलना जरूरी है, लेकिन यदि किसी अधिकारी या संस्था की लापरवाही से अपराध का अवसर बना, तो उसकी भी विभागीय जवाबदेही तय होनी चाहिए। हर घटना के बाद केवल 'किसने अपराध किया?' नहीं, बल्कि 'किस स्तर पर उसे रोकने में फेल हुआ?' यह भी जांच का हिस्सा होना चाहिए।"

महिला कार्यकर्ता ऋचा सिंह कहती है, "कानून और अधिकार, खासकर लड़कियों के मामलों में किताबों का हिस्सा बनकर रह गए हैं, धरातल पर उनकी कोई हकीकत बन नहीं पाई है। कानून ने हमें अधिकार दिए हैं, लेकिन वो अगर एक्शन में नहीं बदल रहे हैं, तो फिर उनका होने या नहीं होने का मतलब ही नहीं है। जो कानून बनाएं है, उनको बनाने वाले भी पुरुष हैं, लागू करने वाले भी अधिकतर पुरुष ही हैं, तो सोचिए अत्याचार महिलाओं के ऊपर हो रहा है, कर पुरुष रहे हैं और हम रक्षा के लिए भी उनके पास ही जा रहे हैं। तो ये अपने आप में ही सवाल उठाता है। अगर हमारी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है, तो जो महिलाओं के लिए निर्णय लिया जाता है, जिन कमरों में निर्णय लिया जाता है, वहां हमारी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तो है नहीं, तो हमारे लिए कानून हम बना भी नहीं पाते हैं, क्योंकि हमारी हिस्सेदारी नहीं है।"

ऋचा सिंह आगे कहती हैं- "हमारे यहां ऐसे मामलों में पूरी की पूरी जिम्मेदारी पीड़िता पर शिफ्ट कर दी जाती है, जैसे दिल्ली वाली जो दुर्भाग्यपूर्ण घटना है, सोचिए किसी लड़के को बस में बैठने से पहले क्या ख्याल होता है, कि उसके पहुंचना कहां है, लेकिन अगर कोई महिला है तो वो ये सोचती है कि क्या मैं पहुंच भी पाऊंगी? ये बस सही है? हमने जो व्यवस्था बनाई है, जो सामाजिक व्यवस्था बनी हुई है, उसमें सीधे लड़की पर जिम्मेदारी डाल जाती है, वो वहां पर गई क्यों थी, क्या करने गई थी?"

दायरा कहां तक?

निर्भया के बाद कानून बदले, सजा सख्त हुई, व्यवस्थाएं बनाने के दावे हुए। लेकिन अगर आज भी एक नाबालिग बस में सफर करते हुए सुरक्षित नहीं है, अगर घटना के बाद भी उसे न्याय के लिए इंतजार करना पड़ता है, तो फिर हमें लड़की के दायरे पर नहीं, सिस्टम की सीमाओं पर सवाल करना होगा।

‘दायरा’ अगर बनना ही है, तो अपराधियों के लिए बने-लड़कियों के सपनों, उनकी आजादी और उनकी जिंदगी के लिए नहीं। और जब तक यह नहीं होता, तब तक निर्भया का दर्द सिर्फ एक पुरानी घटना नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम के सामने खड़ा एक जिंदा सवाल बना रहेगा- आखिर लड़कियां कब बिना डरे जी पाएंगी?

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