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क्या होता है गेम जोन? भारत में क्यों बढ़ रहा इसका चलन; जानें 3 मुख्य कारण

Game Zone: क्या आप जानते हैं कि आखिर ये गेम जोन होता क्या है और इसका चलन भारत में इतना क्यों बढ़ने लगा है। गुजरात के राजकोट में गेम जोन में लगी आग ने कई लोगों के घर उजाड़ दिए। देशभर के कई हिस्से में रह रहे लोगों को ये भी नहीं मालूम है कि आखिर ये गेम जोन क्या चीज है। तो चलिए आपको इस रिपोर्ट में समझाते हैं।

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गेम जोन से जुड़ी खास बातें।

What Is A Game Zone: गुजरात के राजकोट में एक गेम जोन में लगी आग ने सबकुछ तबाह कर दिया। इस दर्दनाक अग्निकांड में मासूमों समेत कई लोग झुलस गए। हादसे के शिकार हु लोगों की लाशें तक पहचान में नहीं आ रही हैं। इस घटना के बाद देशभर के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे लोगों के जेहन में गेम जोन से जुड़े कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। ये गेम जोन है क्या, यहां लोग क्यों जाते हैं, यहां पर ऐसा क्या होता है, वगैरह-वगैरह...। तो हम आपके जेहन में उठ रहे तमाम सवालों के जवाब इस रिपोर्ट में देने की कोशिश करेंगे।

आखिर क्या होता है गेम जोन?

एंटरटेनमेंट की दुनिया में गेम जोन को एक नया आयाम माना जा रहा है। एक एक ऐसा स्थान होता है, जहां वीडियो गेम खेलने के लिए लोग इकट्ठा हुआ करते हैं। परिवार के लोग, दोस्त-यार, कोई अकेला खिलाड़ी या फिर बच्चे...। ये प्लेस धीरे-धीरे बच्चों के लिए पसंदीदा जगह बनती जा रही है। गेम जोन की खास बात ये है कि एक ही छत के नीचे यहां गेमिंग के लिए कई तरह की मशीन होती हैं। जिसके जरिए बच्चे अपने गेमिंग स्किल्स का प्रदर्शन करते हैं और आनंद लेते हैं। गेम जोन में बेहद ही आरामदायक माहौल देखने को मिलता है, साथ ही ज्यादातर जगहों पर खाने-पीने की सुविधाएं भी उपलब्ध होती हैं। सीधे शब्दों में समझा जाए तो 'गेम जोन' एंटरटेनमेंट का बड़ा पैकेज है, जहां ऑप्शंस की भरमार होती है।

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गेम जोन।

बढ़ता जा रहा है इसका चलन

भारत में गेम जोन को लेकर लोगों में दिलचस्पी बढ़ती ही जा रही है। अलग-अलग शहरों में कई सारे गेम जोन देखने को मिल ही जाते हैं। बच्चों को यह जगह काफी पसंद आती है, इसकी वजह है कि बदलते दौर के साथ-साथ आज के जनरेशन डिजिटल होती जा रही है, उसे ग्राउंड में खेलने के बजाय मोबाइल और कम्प्यूटर पर खेलने में मजा आने लगा है। आपको अब ये जानना चाहिए कि आखिर भारत में गेम जोन का चलन तेजी से क्यों बढ़ रहा है।

आखिर क्यों बढ़ रही है दिलचस्पी?

गेम जोन बड़े ही तेजी से भारत में लोकप्रिय होने लगा है। खासकर युवाओं में इसे लेकर दिलचस्पी काफी बढ़ने लगी है। आपको इसके पीछे के तीन मुख्य कारणों से रूबरू करवाते हैं।

पहला कारण: लेटेस्ट टेक्नोलॉजी

बदलते जनरेशन के साथ-साथ आज कल के बच्चों के सोचने और समझने का तौर-तरीका भी बदल रहा है। डिजिटल इंडिया का बड़ा असर है कि मोबाइल, कम्यूटर और इंटरनेट जैसे आधुनिक संसाधनों में आजकल के बच्चे डूबे रहते हैं। आप लेटेस्ट गेमिंग टेक्नोलॉजी का लुत्फ गेम जोन के जरिए आसानी से उठा सकते हैं। गेम जोन में VR (वर्चुअल रियलिटी) और AR (ऑगमेंटेड रियलिटी) गेम खेलने का अवसर मिलता है। टेक्नोलॉजी के जरिए गेम खेलते वक्त इतना रियल लगता है कि कोई भी इसमें पूरी तरह डूब जाता है।

Game Zone

गेम जोन।

दूसरा कारण: गेमिंग कल्चर

डिजिटलाइज होने के साथ-साथ भारत में गेमिंग का दौर तेजी से बढ़ रहा है। इसकी बढ़ती लोकप्रियता के चलते बच्चे इस ओर आकर्षित हो रहा हैं। हर घर में आज कल मोबाइल गेम, कंसोल गेम और पीसी गेमिंग ने दस्तक दे दी है। एंटरटेनमेंट के साथ-साथ आजकल लोग कंपटीशन के लिए भी गेम खेल रहे हैं।

तीसरा कारण: सस्ता विकल्प

VR, AR जैसे हैवी गेम्स खेलने के लिए एडवांस टूल्स का होना आवश्यक है। ऐसे हैवी गेमिंग डिवाइस काफी महंगे होते हैं, जिसे खरीदने से बेहतर लोग गेम जोन में जाकर सस्ते में इसे खेलना पसंद करते हैं। गेम जोन हैवी गेम्स के लिए एक किफायती विकल्प बनकर उभरा, जहां महंगे गेमिंग टूल्स खरीदे बिना ही कम पैसों को आप इसे खेल सकते हैं।

कई तरह के एंटरटेनमेंट ऑप्शन, वो भी एक ही छत के नीचे... गेम जोन में आपको इस तरह की सुविधा मिलती है। ये कहावत गलत नहीं है कि हर सिक्के के दो पहलु होते हैं, इस तरह के गेम खेलने के आदी होकर आजकल के बच्चे फिजिकल एक्टिविटीज से दूर होते जा रहे हैं।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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