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आखिर क्यों 40 डिग्री तापमान में ही पिघल गई यूरोप की सड़कें, भारत में 50 डिग्री भी झेल जाती हैं

यूरोप में इस बार प्रचंड गर्मी से हर तरफ हाहाकार है। यहां 40°C पर सड़कें पिघलने की खबरें आ रही हैं, जबकि भारत में 50°C पर भी सड़कें सुरक्षित रहती हैं। आखिर भारत और यूरोप के सड़क निर्माण में क्या भिन्नताएं हैं, जिसके कारण ये अंदर देखने को मिल रहा है।

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यूरोप और भारत के सड़क निर्माण में क्या अंदर है?
Authored by: Digpal Singh
Updated Jul 1, 2026, 17:28 IST
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इस साल गर्मी ने सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। भारत में तो लोगो का गर्मी से बुरा हाल हुआ ही। इस साल यूरोप में जो गर्मी पड़ी उससे वहां के लोग भी बेहाल हो गए। बड़ी बात ते ये कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका यानी दक्षिण एशिया के जो लोग यूरोप में रहते हैं, उनका भी कहना है कि यूरोप की इस साल की गर्मी असहनीय है। हालात ऐसे हो गए कि यूरोप में लोग गर्मी से मरने लगे और कई जगह सड़कों के पिघलने के वीडियो भी वायरल हो गए। ऐसे में प्रश्न ये कि भारत में तापमान 48-50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तब भी सड़कें नहीं पिघलती हैं। फिर यूरोप में 40 डिग्री तापमान पर ही सड़कें कैसे पिघलने लगीं? चलिए समझते हैं भारत और यूरोप के मौसम और सड़कों में क्या अंतर है -

यूरोप में भीषण गर्मी और रिकॉर्डतोड़ तापमान के बीच खबरें आईं कि यूनाइटेड किंगडम (UK) में सड़कें तक पिघल गई हैं। इस खबर ने दुनियाभर का ध्यान इस यूरोपीय देश की ओर खींचा। ऐसी गर्मी और पिघलती सड़कों को लेकर भारत की गर्मी से तुलना करते हुए कई रिपोर्ट आने लगीं। जिसमें बताया जाता कि भारत में तो गर्मियों के मौसम में 45 डिग्री तापमान सामान्य बात होती है। भारत में इतने तापमान में सड़कें नहीं पिघलती हैं, फिर यूके में ऐसा क्यों हो रहा है।

तो क्या भारत की सड़कें UK से मजबूत हैं?

बिल्कुल नहीं, इस प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं है। ऐसा नहीं है कि भारत की सड़कें यूके से मजबूत हैं, बल्कि मामला कुछ और ही है। जिस तापमान में भारत की सड़कें मजबूती से जुड़ी हुई हैं, उस तापमान में यूके की सड़कें पिघलने का सीधा कारण तकनीक नहीं, बल्कि सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री है। भारत में सड़कें यहां के सामान्य तापमान के अनुसार बनाई जाती हैं। जबकि यूके में वहां के मौसम के अनुसार सड़कें बनाई जाती हैं, जहां सर्दियों में तापमान कई डिग्री माइनस में चला जाता है।

बर्फीले मौसम के लिए बनती हैं यूरोप की सड़कें

भारत के ज्यादातर हिस्सों में अधिकतम तापमान 30 डिग्री से ऊपर रहता है। जबकि न्यूनतम तापमान माइनस में बहुत कम ही जगहों पर जाता है। लेकिन यूके सहित यूरोप के ज्यादातर देशों में सड़क बनाने में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि वह यहां की कठोर सर्दियों को झेल सकें। यहां की सड़कों को इस तरह से बनाया जाता है, ताकि वह बार-बार जमाव बिंदु से नीचे के तापमान को झेल सकें। लगातार और बार-बार शून्य से नीचे के तापमान में इन सड़कों में दरारें न पड़ें और वह मजबूती से अपनी पकड़ बनाकर रखें।

ऐसे मिश्रण से बनती हैं यूरोप की सड़कें

यही कारण है कि यूरोप की कई सड़कों के निर्माण में हॉट-रोल्ड डामर (Hot-Rolled Asphalt - HRA) और डेंस एस्फाल्ट कंक्रीट जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। सड़क बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले इन मिश्रणों में बिटुमिन की मात्रा और बारीक एग्रीगेट्स (छोटे-छोटे कंक्रीट कण) का इस्तेमाल ज्यादा होता है। इस तरह की सामग्री के इस्तेमाल से यूरोप की सड़कें ज्यादा लचीली बनती हैं। इस तरह से मिक्स से बनने वाली लचीलाबन लिए सड़कें यूरोप की कड़ाके की सर्दियों में ज्यादा उपयोगी साबित होती हैं। क्योंकि सड़कें तापमान के अनुसार सिकुड़ और फैल सकती हैं, जिससे उनमें आसानी से दरारें नहीं पड़ती हैं। बिटुमिन का अपेक्षाकृत नरम ग्रेड यहां के शून्य से नीचे के तापमान में भी सड़कों को मजबूत और टिकाऊ बनाए रखने में मदद करता है।

बहुत ज्यादा गर्मी के लिए उपयोगी नहीं ये तकनीक

यूरोप के अत्यधिक ठंडे मौसम में सड़क की मजबूती के लिए अपनाई जाने वाली यह तकनीक बहुत अधिक गर्मी के लिए उपयोगी नहीं है। यानी जो तकनीत ठंडे मौसम में हीरो थी, वह भीषण गर्मी में कमजोर पड़ गई। जब तापमान 40 डिग्री के आसपास या उससे अधिक होता है तो एस्फाल्ट मिक्स में मौजूद बिटुमिन सॉफ्ट होने लगता है। इसके बाद भारी वाहनों के दबाव में सड़क का आकार बिगड़ने लगता है। बिटुमिन सॉफ्ट होकर भारी वाहनों के दबाव से कहीं एक जगह इकट्ठा होने लगता है तो कहीं से पूरी लेयर गायल हो जाती है और सड़क पर पैच बन जाते हैं। यूके सहित यूरोप की सड़कें ऐसी प्रचंड गर्मी के लिहाज से नहीं बनाई जाती हैं।

भीषण गर्मी झेलने के लिए बनती हैं भारतीय सड़कें

यूरोप के उलट भारत में सड़कों को यहां के मौसम के अनुसार भीषण गर्मी झेलने के लिए बनाया जाता है। गर्मी के लिहाज से बनाई गई भारत की सड़कें भी प्रचंड गर्मी का प्रहार नहीं झेल पाएंगी। उन्हें बनाने में इस तरह से मैटेरियल को इस्तेमाल किया जाता है, ताकि वह महीनों तक तेज धूप, भीषण गर्मी और भारी ट्रैफिक को झेल सकें। इसके लिए भारतीय सड़कों को बनाने में बिटुमिन का हार्ड ग्रेड का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें VG-30 और VG-40 शामिल हैं। यह मैटेरियल ज्यादा तापमान में अपनी मजबूती बनाए रखता है।

एक ही तरह के मैटेरियल का अलग-अलग इस्तेमाल

भारत जैसे देशों में सड़क बनाने के लिए बिटुमिन मिक्स में बड़े कंक्रीट पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे भीषण गर्मी के बीच भी सड़क पिघलती नहीं है, वह अपना आकार बनाए रखती है। इस तरह से आप देखेंगे तो यूरोप इंजीनियर सड़क बनाने में फ्लेक्सिब्लिटी का ज्यादा ध्यान रखते हैं, ताकि प्रचंड ठंड में सड़क सुरक्षित रहे। जबकि भारत जैसे देशों में सड़क बनाते समय भीषण गर्मी को ध्यान में रखकर मिक्स तैयार होता है। इस तरह भारत और यूरोपीय देशों में अपने-अपने मौसम के अनुसार सड़कें बनाई जाती हैं। ऐसे में अगर यूरोप में भारत जैसी गर्मी पड़े तो उनकी सड़कों का पिघलना तय है और भारत में यूरोप जैसी ठंड पड़ने पर सड़कों में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ जाएंगी।

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