देश

सजधज के तैयार हो गई Vande Bharat Sleeper Train, पहले लुक में ही बना देगी दीवाना

Vande Bharat Sleeper Train: वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में यात्रियों को सभी सुविधाएं फ्लाइट वाली मिलेंगी। इसमें बेस्‍ट कैटेगरी की डिजाइन है। टच करते ही दरवाजा खुलेगा, इसके अलावा टायलेट में सेंसर सिस्टम मिलेगा। इसमें सेंसर एक्‍ट‍िव इंटरकनेक्टिंग दरवाजे लगाए गए हैं। इतना ही नहीं टच फ्री बायो-वैक्यूम टॉयलेट और टॉक-बैक यूनिट लगाई गई हैं।

Image

वंदे भारत स्लीपर ट्रेन।

Vande Bharat Sleeper Train: वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के इंतजार की घड़ियां खत्म होने वाली हैं। यह बहुप्रतीक्षित ट्रेन चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्टरी में बनकर लगभग तैयार हो चुकी है। ट्रेन में एडवांस सिक्योरिटी सिस्टम दिया गया है, जो इसे भारतीय रेलवे की अन्य ट्रेनों से अलग करता है। इसके अलावा वंदे भारत ट्रेन में किसी भी अन्य स्लीपर ट्रेन से ज्यादा यात्री सुविधाओं का ध्यान रखा गया है। वंदे भारत ट्रेन के फर्स्ट लुक सामने आया है, जिसमें इसके AC1 और AC2 का लुक बिल्कुल अलग लग रहा है।

Vande Bharat Sleeper Train

Vande Bharat Sleeper Train

टच करते ही खुलेगा दरवाजा

वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में यात्रियों को सभी सुविधाएं फ्लाइट वाली मिलेंगी। इसमें बेस्‍ट कैटेगरी की डिजाइन है। टच करते ही दरवाजा खुलेगा, इसके अलावा टायलेट में सेंसर सिस्टम मिलेगा। इंटीग्रल कोच फैक्ट्री ICF के जनरल मैनेजर यू. सुब्बा राव ने बताया कि वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को एडवांस टेक्नोलॉजी से तैयार किया गया है। इसमें सेंसर एक्‍ट‍िव इंटरकनेक्टिंग दरवाजे लगाए गए हैं। इतना ही नहीं टच फ्री बायो-वैक्यूम टॉयलेट और टॉक-बैक यूनिट लगाई गई हैं। फर्स्ट क्लास कूपों में अपर बर्थ तक आसानी से पहुंचने के लिए सीढ़ियां और फ्लाइट-स्टाइल अटेंडेंट बटन होंगे। उन्होंने बताया कि एक ट्रेन को बनाने में 120 करोड़ की लागत आई है।

Vande Bharat Sleeper Train (17)

Vande Bharat Sleeper Train (17)

16 कोच वाली ट्रेन में सफर करेंगे 820 यात्री

जानकारी के मुताबिक, वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में 16 कोच होंगे। इसमें एक साथ 820 यात्री सफर कर पाएंगे। इसकी स्‍पीड 160 क‍िलोमीटर प्रत‍ि घंटे तक पहुंच सकती है, यानी यह राजधानी एक्सप्रेस से भी तेज दौड़ेगी। ट्रेन का 90 किमी प्रति घंटे से लेकर 180 किमी प्रति घंटे की स्‍पीड तकसे दो महीने तक टेस्‍ट क‍िया जाएगा। हादसे से बचने के लिए इसमें इमर्जेंसी ब्रेक सिस्‍टम लगाया गया है। ट्रेन हादसों से बचाने के ल‍िए टक्‍कर रोधी प्रणाली ‘कवच’ और एंटी-क्लाइम्बिंग टेक्‍नोलॉजी भी लगाई गई है। यह हादसे की स्‍थ‍िति में कोच को एक दूसरे के ऊपर चढ़ने नहीं देती है।

(इनपुट- भावना किशोर)

Pranjul Srivastava
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

और पढ़ें
End of Article