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सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवाद में रद्द की FIR, कहा- दहेज उत्पीड़न से जुड़े कानून के दुरुपयोग पर रोक जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों में सभी पर सामान्य आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज करना कानून का दुरुपयोग है। अदालत ने देवर के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया, लेकिन पति पत्नी का विवाद जारी रहेगा। जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप बहुत सामान्य थे।

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साफ किया है कि वैवाहिक विवाद से जुड़े आपराधिक मामलों को अदालतों को बड़ी सतर्कता और व्यावहारिक सच्चाई को ध्यान में रखते हुए देखना चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी पर कार्रवाई नहीं की जा सकती।

आखिरी मामला क्या था?

यह मामला उत्तर प्रदेश से जुड़ा है। पत्नी ने अपने पति, सास और देवर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप लगाए गए थे कि ससुराल पक्ष ने दहेज की मांग की और मानसिक तथा शारीरिक उत्पीड़न किया। मामला आईपीसी की धारा 323, 498ए और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत दर्ज किया गया था।

इस एफआईआर को चुनौती देते हुए पति के छोटे भाई यानी देवर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप बहुत सामान्य थे। इसमें समय, स्थान और उत्पीड़न के तरीके का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था। अदालत ने माना कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक आपराधिक मुकदमे में घसीटना अन्याय करने जैसा होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवादों में यह प्रवृत्ति बढ़ रही है कि पत्नी अपने पति के साथ पूरे परिवार को मुकदमे में फंसा देती है। अदालत ने आगाह किया कि इस प्रवृत्ति को रोकना जरूरी है ताकि कानून के दुरुपयोग को रोका जा सके।

पुराने फैसलों का सुप्रीम कोर्ट ने दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 1992 के मशहूर फैसले स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल का हवाला दिया। इसमें कहा गया था कि जब आरोप असंभव, अविश्वसनीय या संज्ञेय अपराध नहीं नजर आते हैं, तो अदालतें ऐसे मामले को शुरू से ही खत्म कर सकती हैं।

इसी तरह अदालत ने हाल ही के दारा लक्ष्मी नारायण बनाम स्टेट ऑफ बिहार 2025 केस का भी जिक्र किया। उसमें कहा गया था कि अगर पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप सामान्य और अतिश्योक्तिपूर्ण हों तो उन्हें शुरुआत में ही खत्म कर देना चाहिए। वरना यह IPC की धारा 498ए का गलत इस्तेमाल होगा।

सुप्रीम कोर्ट का क्या आदेश आया?

अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए देवर के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। हालांकि, पति और पत्नी के बीच चल रहे वैवाहिक मुकदमे अपनी जगह जारी रहेंगे। कोर्ट ने साफ किया कि यह फैसला केवल देवर तक ही सीमित है।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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