एलन मस्क को तो आप जानते ही होंगे। वह मशहूर कार कंपनी टेसला (Tesla), प्राइवेट स्पेस और रॉकेट बनाने वाली कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX), मशहूर सोशल मीडिया कंपनी X के साथ ही सैटेलाइट इंटरनेट कंपनी स्टारलिंक (Starlink) के मालिक हैं। वैसे तो एलन मस्क अक्सर सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन इधर भारत में वह काफी चर्चा में हैं। कभी वह सोशल मीडिया पर अंबानी को भारत का असली बॉस कहते हैं तो कभी मुकेश अंबानी को मिस्टर प्राइम मिनिस्टर कहकर पुकारते हैं। वह भारत में स्टारलिंक के प्रति भेदभाव का आरोप लगा रहे हैं और देश के बड़े कारोबारी मुकेश अंबानी पर हमला बोल रहे हैं। उनका आरोप है कि मुकेश अंबानी अपनी मोनोपॉली बचाने के लिए स्टारलिंक की राह में रोड़ा अटका रहे हैं। इधर सरकार की तरफ से स्टारलिंक को लेकर सुरक्षा चिंताओं का हवाला दिया जा रहा है। चलिए जानते हैं स्टारलिंक को लेकर भारत की सुरक्षा चिंताएं क्या हैं? इन सुरक्षा चिंताओं का संबंध 1999 के कारगिल युद्ध से भी है। चलिए समझते हैं पूरे मुद्दे को -
राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा निगरानी अहम सवाल
एलन मस्क भारत में अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं सबसे पहले शुरू करने के लिए छटपटा रहे हैं। लेकिन स्टारलिंक की भारत में एंट्री के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा की निगरानी और बॉर्डर इलाकों में संचार पर नियंत्रण जैसे कुछ सवाल काफी अहम हो गए हैं। सैटेलाइट इंटरनेट का मुद्दा सिर्फ तेज इंटरनेट और कॉम्पटीशन तक ही सीमित नहीं है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि देश के भीतर होने वाला संचार भारतीय कानूनों, सुरक्षा एजेंसियों और राष्ट्रीय हितों के दायरे में हो।
सैटेलाइट नेटवर्क खास है, क्योंकि इसके पारंपरिक जमीन आधारित टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर से कोई संबंध नहीं होते हुए भी यह कनेक्टिविटी उपलब्ध कराता है। ऐसी स्थिति में भारतीय यूजर का डेटा सैटेलाइट के जरिए विदेश स्थित नेटवर्क या गेटवे तक पहुंच जाएगा। ऐसा होने पर उस डेटा की निगरानी, उसके वैध तरीके से इंटरसेप्शन और नियंत्रण से जुड़े प्रश्न भी पैदा होते हैं।
DoT ने तय की सुरक्षा शर्तें
मई 2025 में दूरसंचार विभाग (DoT) ने सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए जरूरी सुरक्षा शर्तें तय की थीं। सुरक्षा शर्तों के अनुसार नेटवर्क कंट्रोल एंड मॉनिटरिंग सेंटर (NCMC) के प्रमुख कार्य, वैध इंटरसेप्शन, टर्मिनल कंट्रोल और ट्रैफिक रूटिंग जैसी व्यवस्थाएं भारत में होनी चाहिए। भारतीय टर्मिनलों को विदेशी गेटवे के जरिए कनेक्ट करने पर भी रोक है। संघर्ष या सुरक्षा संकट के दौरान जरूरत पड़ने पर ऑपरेटरों को किसी क्षेत्र अथवा व्यक्ति की सेवा बंद करने में सक्षम होना होगा।
स्टारलिंक ने पहले ही बढ़ा दी सुरक्षा चिंताएं
कोई भी व्यक्ति या संस्था लॉ ऑफ लैंड से बड़ा नहीं सकता। लेकिन स्टारलिंक भारत में लॉन्च से पहले ही देश की सुरक्षा चिंताएं बढ़ा चुका है। सुरक्षा एंजेंसियों को पिछले कुछ वर्षों से अशांत मणिपुर और अंडमान-निकाबार द्वीपसमूह में कार्रवाई के दौरान स्टारलिंक टर्मिनल मिल चुके हैं। साल 2024 में अंडमान के पास मेथामफेटामाइन की खेप जब्त की गई थी। उस समय पता चला था कि तस्करों ने कथित तौर पर स्टारलिंक टर्मिनल से ही रास्ता तय किया था। ये घटनाएं देश की समुद्री सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्रों में सैटेलाइट संचार की निगरानी की जरूरतों को सामने रखती हैं।
संकट के समय धोखा दिया तो...
एलन मस्क भारत में अपनी स्टारलिंक सेवाओं को शुरू करने के लिए सरकार पर हर तरह से दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनकी सेवाओं को लेकर एक अलग तरह की चिंता भी है, जो यूक्रेन में देखने को मिली है। साल 2022 में एलन मस्क ने क्रीमिया के पास यूक्रेन के एक सैन्य अभियान के लिए स्टारलिंक कवरेज बढ़ाने की रिक्वेस्ट को नकार दिया था। इस घटना से पता चलता है कि किसी निजी कंपनी के नियंत्रण वाले सैटेलाइट नेटवर्क से जुड़े फैसले किसी देश के सैन्य अभियानों को प्रभावित कर सकते हैं।
बॉर्डर पर साधारण स्मार्टफोन भी बन जाएगा चुनौती
स्टारलिंक डायरेक्ट-टू-डिवाइस तकनीक भी भारत ला सकता है। कुछ परिस्थितियों में साधारण मोबाइल फोन सीधे सैटेलाइट से जुड़ सकते हैं। इससे विशेषतौर पपर बॉर्डर इलाकों में निगरानी से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। क्योंकि सैटेलाइट से जुड़ने वाले फोन की पहचान सामान्य स्मार्टफोन से अलग करना आसान नहीं होगा।
भारत में सैटेलाइट इंटरनेट को लेकर खास लाइसेंस शर्तें रखी गई हैं। शर्तों में बॉर्डर के भीतर 50 किमी तक विशेष निगरानी क्षेत्र, सटीक जियोफेंसिंग और सीमवर्ती इलाकों में सैटेलाइट सिग्नल के अनधिकृत प्रसार को रोकने जैसे प्रावधान शामिल हैं।
कारगिल युद्ध से क्या है इन चिताओं का संबंध?
साल 1999 के कारगिल युद्ध के समय भारत को पाकिस्तानी घुसपैठियों द्वारा ऊंची चोटियों पर बनाए गए शिविरों पर हमला करने के लिए GPS सिस्टम की बहुत जरूरत थी। लेकिन उस समय अमेरिका ने मिलिट्री ग्रेड GPS डाटा देने से साफ इनकार कर दिया। इसके चलते भारतीय वायु सेना को घुसपैठियों के ठिकाने पर निशाना साधने में बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसके चलते भारत को काफी नुकसान उठाना पड़ा और युद्ध भी लंबे समय तक चला। अगर समय पर अमेरिका ने GPS डाटा उपलब्ध कराने से इनकार नहीं किया होता तो भारतीय वायु सेना बहुत जल्दी पाकिस्तानी घुसपैठियों को अपने इलाके से मार भगाती। ऐसा ही डर स्टारलिंक की सैटेलाइट इंटरनेट को लेकर भी हैं। भविष्य में इस तरह की कोई समस्या होने पर स्टारलिंक भी डाटा देने से इनकार न करे, भारत पहले इस बात के प्रति सुनिश्चित होना चाहता है।
किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं
चूंकि, भारत एक लोकतांत्रिक देश है। इसलिए स्टारलिंक सहित सभी कंपनियों के लिए समान और पारदर्शी नियम लागू होंगे। भारत सरकार ने साफ किया है कि स्टारलिंक के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा रहा है, बल्कि किसी भी कंपनी का कॉमर्शियल ऑपरेशन नियमों और सुरक्षा पर निर्भर करता है।