Pahalgam Terror Attack: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की बैसरन घाटी में निर्दोष नागरिकों पर किए गए कायराना हमले को भारत क्या, पूरा विश्व कभी भूल नहीं पाएगा। पाकिस्तान परस्त आतंकवादी हमले में 26 निर्दोषों की मौत हुई थी। जिसके बाद भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया। ऐसे में भारतीय सेना के जांबाज़ खुद आपको ऑपरेशन सिंदूर की अनसुनी दास्तां सुनाने वाले हैं।
टाइम्स नाउ नवभारत ने वीर चक्र विजेता कर्नल कोशांक लांबा, 'मेंशन इन डिस्पैच' से सम्मानित मेजर एमसन इनपुइ और सेना मेडल से सम्मानित हवलदार विकास मेदाडे के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत की। इस दौरान जांबाजों ने ऐसी शौर्य गाथा सुनाई, जिसे सुनकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा।
दुश्मनों के ठिकानों पर बरपाया कहर
कर्नल कोशांक लांबा ने खास बातचीत में बताया कि 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले के बाद हमारी यूनिट ने अपनी तैयारी शुरू कर दी और कुछ दिन बाद हमें मोबलाइज करके कश्मीर जाना था, जहां हमें ऑपरेशन को अंजाम देना था, लेकिन उस वक्त उसकी ज्यादा जानकारी नहीं दी गई।
यहां सुनें जवानों की वीर गाथा
'ऑपरेशन सिंदूर की कैसे शुरुआत हुई' इस सवाल का जवाब देते हुए कर्नल कोशांक लांबा ने बताया, ''हमारी तैयारी का स्तर एक लेवल और ऊपर चला गया और हम वहां से निकले और अपनी यूनिट को लेकर कश्मीर चले गए। जहां हमें बताया गया कि हमें दुश्मनों के टेरर ठिकानों के ऊपर स्ट्राइक करनी है। इसको लेकर हमने अपनी तैयारी शुरू की... 6-7 मई की रात को 1:00 बजे जब हमें आदेश मिले तो हमने दुश्मन के टेरर ठिकानों के ऊपर अचूक प्रहार करके उन्हें बर्बाद कर दिया।
क्या थी सबसे बड़ी चुनौती?
इस दौरान, कर्नल कोशांक लांबा ने सामने आई सबसे बड़ी चुनौती के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने कहा, ''हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि अपनी यूनिट को देर से कश्मीर लेकर आना है... और उसकी सीक्रेसी को बरकरार रखना।''
ऑपरेशन को दौरान, जब मेजर एमसन इनपुइ से उनकी भूमिका से जुड़ा सवाल पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत से पहले हमने एलओसी के पार एक लॉन्च पैड को स्ट्राइक के लिए सलेक्ट किया था... जब आदेश मिला तो हमने हर एक जवान तक अपने काम को बांट कर रहा था। उन्होंने बताया कि हमने यहां तक की प्लानिंब की हुई थी कि दुश्मन के बंकर के किस लूप होल (दाहिने, मध्य या बाएं) पर निशाना साधना है।
बकौल एमसन इनपुइ, जवानों के दिमाग में महज पहलगाम हमले का बदला लेने और दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने की बात थी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सेना में "जो डर गया वो मर गया" का सिद्धांत काम करता है और वे दुश्मन के फायर की परवाह किए बिना अपना काम करने के लिए तैयार थे।
