Pahalgam Attack Anniversary: पहलगाम की बैसरन घाटी में 22 अप्रैल 2025 का मंजर कोई नहीं भूल सकता है। यहां पर्यटकों को निशाना बनाकर किए गए आतंकवादी हमले में 26 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद पूरे देश में मातम का माहौल था। अब जब इस भयावह हमले की पहली बरसी है तो पीड़ित परिवारों का दर्द एक बार फिर छलक उठा है, जहां यादें आज भी जख्मों को ताजा कर देती हैं। सोशल मीडिया की पुरानी तस्वीरों से लेकर उस खौफनाक दिन के मंजर तक, हर पल मानो फिर से जीने जैसा महसूस होता है। कई परिवार आज भी अपनों को खोने के सदमे से उबर नहीं पाए हैं, लेकिन उनकी यादों के साथ जीने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, इस त्रासदी के बीच कुछ कहानियां इंसानियत, साहस और बलिदान की मिसाल बनकर सामने आई हैं....
पुणे की असावरी ने साझा किया अपना दर्द
पुणे की रहने वाली असावरी जगदाले के स्मार्टफोन पर दो दिन पहले सोशल मीडिया पर साझा की गई उन तस्वीरों से जुड़ा नोटिफिकेशन आया, जो एक साल पहले कश्मीर की यात्रा के दौरान उनके परिवार की ओर से पहलगाम की दिलकश वादियों में बिताए गए मौज-मस्ती भरे पलों की याद दिलाती थीं। ज्यादातर लोगों के लिए ऐसे पोस्ट गुजरे पलों की खुशनुमा यादों में फिर से झांकने का जरिया होते हैं, लेकिन असावरी के लिए यह पहलगाम की बैसरन घाटी में आतंक के उस खौफनाक मंजर को ताजा करने वाले पोस्ट साबित हुए, जिसमें उनकी दुनिया उजड़ गई थी। असावरी ने कहा, "हम जब भी हम उस दिन के बारे में बात करते हैं, तो ऐसा लगता है कि हम फिर से उसे जी रहे हैं।
आज भी आंखों के सामने तैरता है खौफनाक मंजर
यह अतीत की याद नहीं है। इसका खौफनाक मंजर आज भी हमारी आंखों के सामने तैरता है।" मृतकों में असावरी के पिता जगदीश जगदाले और उनके सबसे करीबी दोस्त कौस्तुभ गणबोटे भी शामिल थे। असावरी की मां प्रगति जगदाले ने 22 अप्रैल 2025 के दिन को अपने जीवन का "काला दिन" करार दिया। उन्होंने कहा, "उस दिन हम सभी बहुत खुश थे। हम बैसरन घाटी में तस्वीरें लेने में व्यस्त थे कि तभी अचानक गोलियों की आवाज सुनाई दी। अगले कुछ ही पलों में आतंकवादियों ने मेरे पति, उनके दोस्त कौस्तुभ गणबोटे और अन्य निहत्थे पर्यटकों को धर्म के आधार पर निशाना बनाया और उनकी हत्या कर दी।"
"मेरी मां पिछले एक साल से सदमे में हैं"
वहीं, कौस्तुभ गणबोटे के बेटे कुणाल ने कहा कि वह और उनकी मां पिछले एक साल से सदमे में हैं। उन्होंने कहा, "वे खौफनाक दृश्य मेरी मां के जहन से ओझल होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। वह अभी भी सदमे में हैं। एक साल बीत चुका है, लेकिन हम अभी भी इस दर्द से उबरने की कोशिश कर रहे हैं।" अपने पिता का स्नैक्स कारोबार संभाल रहे कुणाल ने कहा, "मुझे सरकारी नौकरी का प्रस्ताव मिला था, लेकिन मैंने उसे ठुकरा दिया, क्योंकि मैं अपने पिता के कारोबार को आगे बढ़ाना चाहता था। मनोवैज्ञानिक पक्ष पर कठिनाइयों के बावजूद, हम इसे जारी रखने में कामयाब रहे हैं और यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।"
दूसरों की जान बचाने के लिए खुद को किया कुर्बान
हमले में शहीद हुए आदिल को याद करते हुए उनके पिता सैयद ने भावुक शब्दों में कहा कि उनके बेटे ने इंसानियत को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने बताया कि आदिल ने अपनी जान की चिंता किए बिना दूसरों की जान बचाने के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। उसके लिए न कोई धर्म मायने रखता था, न कोई भेदभाव, वह हर इंसान को समान मानता था। सैयद ने गर्व के साथ कहा कि आदिल का बलिदान मानवता के सच्चे मूल्यों को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि आदिल परिवार का सहारा था और घर की अधिकांश जिम्मेदारियां उसी के कंधों पर थीं। माता-पिता और भाइयों की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी वह निभा रहा था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उन्होंने कहा कि एक साल बीत जाने के बाद भी आदिल की यादें आज भी उतनी ही ताजा हैं। परिवार हर पल उसे याद करता है, और घर में लगी उसकी तस्वीरें उनके जख्मों को फिर से ताजा कर देती हैं। सैयद ने भावुक होकर बताया कि हर साल इस समय आदिल पहलगाम जाया करता था, लेकिन आज वह इस दुनिया में नहीं है। परिवार को इस बात का गर्व है कि उसने अपने जीवन से ज्यादा दूसरों की जान को अहमियत दी।
शुभम द्विवेदी की पत्नी ने बयां किया अपना दर्द
कानपुर के शुभम द्विवेदी की पत्नी ने अपने दर्द बयां किए। उन्होंने कहा कि कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें जिंदगी भर भुलाया नहीं जा सकता। इस घटना ने उनके परिवार को इतना तोड़ दिया था कि बोलने और खुद को संभालने की हिम्मत भी नहीं बची थी। कई लोग ऐसे सदमे में डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं, लेकिन आज वह मजबूती से सामने आकर अपनी बात रख पा रही हैं, क्योंकि उन्होंने अपने दर्द को अपनी ताकत बनाने का फैसला किया है। उन्होंने कहा, "यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसी घटना की वजह से लोग मुझे जानने लगे। मैं बिल्कुल नहीं चाहती थी कि लोग मुझे इस तरीके से जानें। मैं जिस बैकग्राउंड से आती हूं, वह एक आर्टिस्ट का बैकग्राउंड है। मेरा सपना हमेशा यही रहा कि लोग मुझे मेरी कला के नाम से, मेरी मेहनत और टैलेंट से जानें। जिस तरीके से आज लोग मुझे जान रहे हैं, वह मैं कभी नहीं चाहती थी। लोग अब मुझसे मिलने आते हैं, चाहे वो नेता हों, बिजनसमैन हों या आम इंसान, सभी एक ही मोटिव से आते हैं। वे श्रद्धांजलि देने आते हैं, शुभम के बारे में पूछते हैं, मेरे परिवार के बारे में जानना चाहते हैं। अभी तक किसी ने भी राजनीति या कोई दूसरा मोटिव लेकर बात नहीं की।" उन्होंने कहा कि अच्छी बात यह रही कि किसी ने भी इस दुख में राजनीति नहीं घुसाई। सभी लोग एक ही मकसद से आए, श्रद्धांजलि देने और हमारे परिवार का हाल जानने।
26 पर्यटकों में कर्नाटक के नागरिक भी थे शामिल
एक साल बाद मंजुनाथ राव के परिवार का कहना है कि जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश के बावजूद, उस घटना का दर्द उनके मन में आज भी ताजा है। उनके चचेरे भाई रवि किरण ने यह बात कही। हमले में मारे गए 26 पर्यटकों में दो कर्नाटक के नागरिक भी शामिल थे और उनके परिवारों के लिए उस घटना की खौफनाक यादें आज भी ताजा हैं। शिवमोगा के रहने वाले 47 वर्षीय रियल एस्टेट कारोबारी मंजुनाथ राव भी पीड़ितों में से एक थे। उनकी पत्नी पल्लवी और बेटे के सामने ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। परिवार के सदस्यों के अनुसार, राव अपनी पत्नी और बेटे के साथ कश्मीर की अपनी पहली यात्रा के तहत पहलगाम गए थे और उन्हें 24 अप्रैल को वापस लौटना था। किरण ने बताया, "वे कुछ भी नहीं भूल सकते। यह उनके मन में बसा हुआ है। लेकिन जिंदगी तो चलती रहती है…उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि वे इस दर्द को सह लें। उनकी पत्नी इस बारे में बात करने को तैयार नहीं हैं। कहने के लिए क्या बचा है? जिंदगी तो चलती ही रहती है।"
पीड़ितों के सम्मान में बनाया गया स्मारक
इसी के साथ 25 पर्यटकों और एक स्थानीय व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने के लिए एक स्मारक भी बनाया गया। लिद्दर नदी के किनारे काले संगमरमर से बने इस स्मारक पर 26 मृतकों के नाम अंकित हैं, जिन्हें बैसरन घाटी में मौत के घाट उतार दिया गया था। एक साल बाद, यह घाटी बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित कर रही है। कुछ लोगों ने सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय लोगों के आतिथ्य सत्कार की बहुत प्रशंसा की। नवजोत सरकार नाम के एक पर्यटक ने बताया, "जो होना था वह हो चुका है। लेकिन अगर हम अब इस जगह की यात्रा न करने का फैसला करते हैं, तो यह गलत होगा। भारत में लगभग हर घर के लोग कश्मीर जाने का सपना देखते हैं। मैं असम से हूं हम भी कश्मीर की यात्रा करना चाहते थे।" नवजोत, देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में आए पर्यटकों के साथ, वर्तमान में पहलगाम के एक रिसॉर्ट में ठहरे हुए हैं, जो इस लोकप्रिय पर्यटन स्थल पर पर्यटकों की निरंतर वापसी को दर्शाता है। प्रशासन ने पहलगाम और उसके आसपास के इलाकों में अतिरिक्त पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया है, साथ ही कई स्थानों पर गहन जांच और कड़ी निगरानी रखी गई है ताकि शांतिपूर्ण तरीके से बरसी का आयोजन हो सके। वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि इस कार्यक्रम के लिए सभी जरूरी व्यवस्थाएं कर ली गई हैं, जिसमें कई राजनीतिक नेताओं, नागरिक संस्थाओं के सदस्यों, मृतकों के परिजनों और स्थानीय प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है।
(इनपुट - भाषा)
