मानसून आया भी और हम सूखे रह गए, जबकि दूसरी तरफ इतनी बारिश हुई की तबाही मच गई। देश में इस साल मानसून की चाल अब तक ऐसी ही रही है। इस साल के मानसून की सबसे बड़ी कहानी बारिश की कमी या अधिकता नहीं, बल्कि उसका बहुत ज्यादा असमान वितरण है। एक तरफ मेघालय है, जिसका नाम ही 'बादलों का घर' के रूप में रखा गया है और मॉसिनरम इसी राज्य में है, जहां दुनिया की सबसे ज्यादा बारिश होती है। इसके बावजूद मेघालय में सामान्य से 58 फीसद कम बारिश हुई, बिहार में 43 फीसद कम और झारखंड में 32 फीसद कम बारिश दर्ज हुई है। वहीं दूसरी तरफ लद्दाख (ठंडा मरूस्थल) है, जहां बहुत कम बारिश होती है, लेकिन इस साल सामान्य से 184 फीसद ज्यादा बारिश हो चुकी है। गुजरात में 21 फीसद और ओडिशा में अब तक 27 फीसद ज्यादा बारिश दर्ज की गई है। यानी देश के कुछ हिस्सों में खेत बारिश के इंतजार में बंजर हो गए, जबकि कुछ अन्य हिस्सों में बहुत ज्यादा बारिश और बाढ़ से फसलें बर्बाद हो गई।
UN महासचिव गुटेरेस की चेतावनी
ऐसे में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की बात सुनना जरूरी है। गुटेरेस ने उभरते अल नीनो को वैश्विक जलवायु संकट के लिए गंभीर चेतावनी बताया है। जून में उन्होंने कहा था कि अल नीनो के आने की 90 फीसदी संभावना है और यह पहले से गर्म हो रही दुनिया पर दबाव और बढ़ा सकता है। उनका कहना है कि अल नीनो हमारे दरवाजे पर ही नहीं, बल्कि घर के अंदर घुस चुका है। यह तो बस शुरुआत भर है। उनका कहना है कि अल नीनो और भी मजबूत हो रहा है और यह पहले से ही भीषण गर्मी, जंगल में आग और रिकॉर्ड तोड़ गर्म समुद्रों से जूझ रही धरती पर आग में घी डालने का काम कर रहा है।
अगस्त-सितंबर में सामान्य से कम बारिश का अनुमान
भारत के लिए चिंता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि IMD के अनुसार अगस्त-सितंबर में बारिश दीर्घकालिक औसत (Long Period Average - LPA) की लगभग 94 फीसद (सामान्य से कम) रह सकती है। हालांकि, जुलाई में बारिश ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया था, लेकिन अल नीनो के मजबूत होने के साथ मानसून के दूसरे हिस्से में बारिश की कमी का जोखिम बना हुआ है।
कुछ अपेक्षाकृत कम बारिश वाले राज्यों में भीषण बारिश
कहीं सूखा तो कहीं आसमान से बरसी आफत
संयुक्त राष्ट्र महासचिव मौसम के इस चक्र को बड़ी समस्या की शुरुआत भर बता रहे हैं। वह जिस बड़ी समस्या की तरफ इशारा कर रहे हैं, उसके निशान हमारे देश में इस साल हर तरफ दिख रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इस साल कई राज्यों में औसत से बहुत कम बारिश दर्ज की गई है। जैसे मेघालय (-58%), बिहार (-43%), गोवा (-37%), आंध्र प्रदेश (-36%), झारखंड (-32%), उत्तर प्रदेश (-28%), केरल (-23%), पंजाब (-39%), हरियाणा (-32%), राजस्थान (-17%) और मध्य प्रदेश (-16%) जैसे राज्य अच्छी बारिश को तरस रहे हैं।
इसके उलट दूसरी तरफ लद्दाख (+184%), गुजरात (+21%), जम्मू-कश्मीर (+15%), ओडिशा (+27%), महाराष्ट्र (+7%), सिक्किम व नागालैंड (+2%), पश्चिम बंगाल (+1%) में बारिश सामान्य से ज्यादा रही है। बारिश के यह सभी आंकड़े IMD के 1 जून से 3 अगस्त तक हुई बारिश के आंकड़ों पर आधारित हैं।
मानसून के दौरान बारिश की यह असमानता सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है। कम बारिश वाले क्षेत्रों में मिट्टी की नमी, सिंचाई और जलाशयों पर दबाव बढ़ता है, जबकि ज्यादा बारिश वाले इलाकों में खेतों में पानी भरने, फसल सड़ने और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
मौसम की अटपटी चाल में बूंदों को तरसे ये शहर
देश की कुछ प्रमुख राज्यों की राजधानियां भी इस असमान मानसून की तस्वीर साफ दिखाती हैं। मौसम की इस अटपटी चाल का असर देश की राजधानी नई दिल्ली पर साफ दिखाई दिया है, जहां अभी तक 26 फीसद कम बारिश दर्ज की गई है। ऐसा ही कुछ लखनऊ में 42 फीसद, पटना में 52 फीसद, रांची में 26 फीसद और देहरादून में 12 फीसद बारिश कम हुई है।
जहां होती थी खूब बारिश, आज सूखे पड़े हैं वो इलाके
औसत आंकड़े भी पारंपरिक सोच को गच्चा दे रहे
उत्तराखंड के कुछ पहाड़ी इलाकों में अत्यधिक बारिश के चलते जनजीवन अस्त-व्यस्त है। भूस्खलन के चलते तबाही के हालात हैं, जबकि देहरादून में बारिश की अच्छी खासी कमी दर्ज की गई है। खासतौर पर देहरादून जैसे अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में भी बारिश का कमी दर्ज होना बताता है कि पूरे राज्य की तस्वीर और राजधानी या किसी एक जिले की स्थिति अलग हो सकती है। यही वजह है कि सिर्फ देश या राज्य के औसत आंकड़े से मानसून की वास्तविक स्थिति को समझना मुश्किल होता जा रहा है। किसी एक जिले के ही दो हिस्सों में एक तरफ बाढ़ और दूसरी तरफ सूखे जैसी स्थितियां बनना आम बात हो गया है।
2015 से क्या सीख सकता है भारत?
साल 2015 में भी अलनीनो के हालात बने थे। तब दुनिया के 12 फीसद देशों पर अलनीनो का प्रत्यक्ष असर पड़ा था, जबकि अन्य पर अप्रत्यक्ष असर देखने को मिला था। साल 2015 में दुनिया के गरीब और कम आय वाले देशों में 80 फीसद तक सूखा पड़ गया था। ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर प्रभावित देशों में सामान्य की तुलना में 50 फीसद तक कम बारिश हुई थी। इन आंकड़ों को और करीब से देखें तो पता चलता है कि साल 2015 में दुनियाभर के 9.92 करोड़ लोगों पर सुपर अल-नीनो का असर पड़ा था। यही नहीं, अफ्रीका महाद्वीप में ही 5.20 करोड़ लोगों को खाद्यान्न संकट से गुजरना पड़ा था। इसके अलावा इंडोनेशिया में 4.30 करोड़ लोग बीमार पड़ गए थे।
भारत में भी 2015 में मानसूनी बारिश 14 फीसद कम हुई थी। जबकि इस साल मानसूनी बारिश 10 फीसद तक कम रहने का अनुमान है। साल 2015 का अल नीनो भारत के लिए खास सबक है। उस साल भी अल नीनो के साथ कमजोर मानसून और कृषि उत्पादन पर दबाव देखने को मिला था। ऐसे में 2026 में भी बारिश के वितरण में असमानता खेती के लिए जोखिम बढ़ा सकती है। इस साल भी कहीं बारिश की कमी से फसलें प्रभावित हो रही हैं, तो कहीं बहुत ज्यादा बारिश के कारण नुकसान हो रहा है।
आयात पर बढ़ सकती है निर्भरता
असमान मानसून का सीधा असर देश के खाद्य आयात पर पड़ सकता है। अगर कम बारिश से धान, दाल, तिलहन या कपास का उत्पादन घटता है तो घरेलू मांग पूरी करने के लिए आयात बढ़ाना पड़ सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों और घरेलू महंगाई पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। इस चुनौती से निपटने में फसल विविधता काफी अहम उपाय हो सकती है। पानी की अधिक जरूरत वाली फसलों पर निर्भरता घटाकर बाजरा, ज्वार, दालें और तिलहन जैसी अपेक्षाकृत कम पानी वाली फसलों का दायरा बढ़ाना जोखिम को कम कर सकता है।
