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बदल रही है मौसम की चाल, मूसलाधार बारिश से परेशान होंगे ये देश; आग से बेहाल धरती के 'फेफड़े'

WMO की नई रिपोर्ट में साल 2030 तक बढ़ती गर्मी, बदलते बारिश पैटर्न, जंगलों में आग और जीव-जंतुओं पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर असर को लेकर बड़ी चेतावनी दी गई है। अगर हम अब भी नहीं चेते तो भविष्य की तस्वीर भयावह है।

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ग्लोबल वॉर्मिग ने दिखाई भविष्य की भयावह तस्वीर
Authored by: Digpal Singh
Updated May 29, 2026, 17:44 IST
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देश के ज्यादातर हिस्सों में इन दिनों प्रचंड गर्मी पड़ रही है। गर्मी का आलम ये है कि शाम को सूर्यास्त के घंटों बाद आधी रात को भी धरती से आग जैसी आंच आ रही है। भीषण गर्मी के प्रकोप से Heatwave जैसे हालात बने हुए हैं। यह स्थिति भारत की है। लेकिन जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का असर सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने 2026-2030 के बीच तापमान को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में बदलते मौसम के कारण तापमान में होने वाले बदलावों को लेकर आशंकाएं जताई गई हैं। अगर यह आशंकाएं कुछ हद तक भी सही साबित होती हैं तो भविष्य बहुत ही खतरनाक और कष्टदायक हो सकता है। चलिए जानते हैं -

भारत में इस साल भी कई शहरों में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस के आंकड़े को पार कर चुका है। जबकि इसी दौरान सतह का तापमान काफी ज्यादा रहा। दुनिया के कई अन्य देश भी हैं, जहां तापमान लगातार रिकॉर्ड तोड़ रहा है। इस बीच ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ रही है और जंगलों में आग के चलते धरती पर ऑक्सीजन के इकलौते उत्पादक वन संपना नष्ट हो रही है। बारिश का पैटर्न बदलने से अरब देशों में बाढ़ की स्थितियां देखने को मिल रही हैं, जहां पहले कभी सालभर में 2-4 सेंटीमीटर भी बारिश हुआ करती थी। कई जीव-जंतु लुप्त हो चुके हैं और कई लुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। अगर जलवायु परिवर्तन की स्थिति ऐसी ही बनी रही, इसकी रफ्तार में कमी नहीं आई तो आने वाले वर्षों में आपकी और हमारी जिंदगी थोड़ा और दिक्कतभरी होगी।

गर्म हो रहा आर्कटिक क्षेत्र

आप सिर्फ अपने इलाके में पड़ रही भीषण गर्मी से परेशान हैं, लेकिन वैज्ञानिकों की असली चिंता ध्रुवीय क्षेत्रों में बढ़ रही गर्मी है। विभिन्न देशों के 13 अलग-अलग जलवायु मॉडलों से यह पता लगाया गया कि आर्कटिक में वॉर्मिंग बाकी की दुनिया की तुलना में 3.5 गुना तेजी से बढ़ रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि वहां पर बर्फ काफी कम बची है। पिछले कई वर्षों से आर्कटिक और अंटार्टिक के क्षेत्र में बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिसके कारण वहां की पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ रहा है। अगर अब भी ग्लोबल वॉर्मिंग नियंत्रित नहीं हुई तो ध्रुवीय क्षेत्रों की पूरी बर्फ पिघल जाएगी और दुनिया के कई शहर समुद्र में समा जाएंगे।

बारिश का पैटर्न भी बदलेगा

हाल के वर्षों में बारिश की असामान्य चाल तो आपने देखी ही है। हिमाचल से लेकर उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश और तमिलनाडु तक मूसलाधार बारिश से भारी नुकसान हुआ है। यही नहीं उस अरब क्षेत्र में बाढ़ आ जाती है, जहां कभी सालभर बारिश नहीं होती थी। WMO के अनुसार साल 2026-2030 के दौरान मई-सितंबर के महीनों में अफ्रीका, उत्तरी यूरोप, अलास्का और साइबेरिया में बारिश का पैटर्न बदलेगा। इन सभी क्षेत्रों में इस दौरान सामान्य से ज्यादा बारिश की संभावना है।

अरब देशों में आई बाढ़ से बिगड़े हालात

अरब देशों में आई बाढ़ से बिगड़े हालात

दावानल से हलकान होंगे धरती के फेफड़े

अक्सर गर्मियों में हमारे देश के जंगलों में भी आग की खबरें आपने पढ़ी और सुनी होंगी। अमेरिका, कनाडा, ब्राजिल से लेकर दुनिया के अन्य देशों में भी अक्सर जंगलों में आग लगनी की खबरें आती रहती हैं। रिपोर्ट में अमेजन बेसिन में और अधिक गर्म व असामान्य रूप से शुष्क हालात की चेतावनी दी गई है। यह तो आप जानते ही हैं कि अमेजन के जंगलों को धरती के फेफड़े कहा जाता है। दुनिया में सबसे ज्यादा ऑक्सीजन इन्हीं जंगलों से बनती है। ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि स्थानीय निवासियों और हमारे पूरे गृह के लिए यहां लगने वाली आग काफी विनाशकारी हो सकती है।

अमेजन के जंगलों में साल 2024 में लगी आग की तस्वीर

अमेजन के जंगलों में साल 2024 में लगी आग की तस्वीर

धरती के जीवों पर जलवायु परिवर्तन का असर

धरती का तापमान असामान्य रूप से बढ़ रहा है। ऐसे में तमाम इलाकों और जीवों पर असर पड़ रहा है। तापमान में मामूली सी वृद्धि भी मौत, खतरे और जीव-जंतुओं की प्रजातियों के लिए नुकसान का कारण बन सकती है। प्रवाल भित्तियां तापमान के इस अतिरिक्त दबाव को सहन नहीं कर पाएंगी। तापमान बढ़ने से कई प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी।

क्या कहते हैं जानकार

यूरोप, भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में पड़ रही भीषण गर्मी यह दर्शाती है कि अब भी भारी मात्रा में कोयला, तेल और गैस का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह हम नहीं, संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टिल का कहना है। उनका कहना है कि इससे गंभीर मानवीय और आर्थिक दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं। लंदन में इंपीरियल कॉलेज की जलवायु वैज्ञानिक फ्रेडरिक ओटो के मुताबिक अगर पूरे साल या उससे ज्यादा समय तक तापमान 1.5 डिग्री से ऊपर रहता है, तो दुनिया को ऐसे चरम मौसम का सामना करना पड़ेगा, जैसा अब तक कभी महसूस नहीं किया गया।

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