One Dose Vaccine Theory: कोरोना वायरस के खिलाफ वन डोज वैक्सीन थ्योरी में कितना दम, यहां जानें

देश
ललित राय
Updated Jun 01, 2021 | 08:59 IST

कोरोना से उबरे लोगों के लिए क्या वैक्सीन की एक डोज पर्याप्त है या सिर्फ टीकों की कमी की वजह से इस तरह के सुझाव दिए जा रहे हैं।

One Dose Vaccine Theory: कोरोना वायरस के खिलाफ वन डोज वैक्सीन थ्योरी में कितना दम, यहां जानें
बीएचयू के रिसर्चर ने कोरोना से उबरे लोगों के एक वैक्सीन की एक डोज देने की वकालत की है 

मुख्य बातें

  • कोरोना से उबरे लोगों को वैक्सीन की एक डोज देने की हिमायत
  • बीएचयू के शोधकर्ताओं ने पीएम नरेंद्र मोदी को खत लिखा
  • विशेषज्ञों कहना है कि वन डोज वैक्सीन के फायदे के बारे में पूरी जानकारी नहीं

कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में वैक्सीन ही वो हथियार है जो प्रभावी तौर पर वायरस से लोगों को बचा सकता है। इस समय देश में वैक्सीनेशन कार्यक्रम को चलाया जा रहा है लेकिन इन सबके बीच टीकों की कमी एक बड़ा मुद्दा है। राज्य सरकारों के साथ साथ विपक्ष केंद्र सरकार पर हमलावर है। कुछ शोधकर्ताओं ने मिक्स वैक्सीन के साथ साथ कोरोना से उबरे लोगों को वैक्सीन की एक डोज को ही पर्याप्त बताया जा रहा है। ये बात अलग है कि कुछ एक्सपर्टस का कहना है कि यह समझदारी वाली बात नहीं होगी क्योंकि इस संबंध में ज्यादा आंकड़े उपलब्ध नहीं है जो इस बात पर मुहर लगा सकें कि कोरोना से उबरे लोगों के लिए वैक्सीन की एक ही डोज पर्याप्त होगी।

क्या सिंगल डोज  वैक्सीन कारगर है
एनटीएजीआई के डॉक्टर एन के अरोरा का कहना है कि अगले कुछ हफ्तों में मिक्स वैक्सीन के प्रभावी होने का परीक्षण कर सकता है। इन सबके बीच बीएचयू के शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि अगर कोविड से उबरे मरीजों को सिर्फ एक डोज दिया जाए तो वो पर्याप्त होगा। इस संबंध में कोविड संक्रमित और नॉन कोविड लोगों के बारे में अध्ययन किया गया और यह देखने में मिला है कि कोरोना से ठीक हुए लोगों में एक हफ्ते में एंटीबॉडीज डेवलप हुई है। जबकि नॉन कोविड मरीजों में एंटीबॉडी डेवलप होने में तीन से चार हफ्ते का समय लगा है।

विशेषज्ञों की अलग अलग राय
इस संबंध में विश्वविद्यालय की तरफ से पीएम नरेंद्र मोदी को खत भी लिखा गया है। लेकिन ज्यादातर जानकारों का कहना है कि इस संबंध में पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं है लिहाजा इस तरह के फैसले को उचित नहीं ठहराया जा सकता है। ऐसा देखा जा रहा है कि पहला डोज उतना प्रभावी नहीं है लेकिन जब दूसरा डोज लगाया जा रहा है कि उसके बाद किसी भी शख्स पर कोरोना का खतरा कम हो रहा है। अभी जो साक्ष्य हैं उसके मुताबिक दो डोज के बाद मौत का खतरा कम हो रहा है। एंटीबॉडी स्तरों को देखने से कोई प्रभावकारिता साबित नहीं होती है कि व्यक्तिगत स्तर पर भी, वे केवल जनसंख्या स्तर पर हैं।


एक खुराक के संबंध में, किसी भी परीक्षण ने कोई सबूत नहीं दिया है कि यह मौतों या गंभीर बीमारी को रोकने में पर्याप्त होगा। हमें विशेष रूप से कमजोर आबादी के लिए दोनों खुराक को कवर करने की आवश्यकता है। दी गई समय सीमा में यदि हम दो खुराक को कवर करने में असमर्थ हैं, तो शायद हम एक खुराक को कवर कर सकते हैं, लेकिन दूसरी खुराक कुछ समय बाद कम से कम 12 सप्ताह की अवधि में दी जानी चाहिए, जब प्रभावकारिता लगभग 84 प्रतिशत हो।
कहां से आया यह विचार
एकल-खुराक टीकाकरण का विचार ऐसे समय में आया है जब यूके ने अपनी कमजोर आबादी की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के खुराक अंतराल को आठ सप्ताह तक कम करने का निर्णय लिया है। भारत ने यूके के साक्ष्यों का हवाला देते हुए कोविशील्ड के लिए खुराक अंतराल को बढ़ाकर 12 सप्ताह करने का निर्णय लिया है।हाल ही में, जैसा कि यूके जून में अनलॉक होने की उम्मीद कर रहा है, सरकार को प्रस्तुत एक अध्ययन में जोर दिया गया है कि दो खुराक एकल खुराक की तुलना में वायरस के विशिष्ट रूपों के खिलाफ बेहतर सुरक्षा प्रदान करते हैं।

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