समान नागरिक संहिता देश की जरूरत, इसे अनिवार्य रूप से लाया जाना चाहिए : इलाहाबाद हाई कोर्ट

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Nov 19, 2021, 09:22 AM IST

Allahabad High court on Uniform Civil Code: समान नागरिक संहिता पर छिड़ी बहस और तमाम आशंकाओं के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस पर बड़ी टिप्‍पणी की है। इसे देश की जरूरत बताते हुए कोर्ट ने इसे अनिवार्य रूप से लाने की बात कही है।

समान नागरिक संहिता देश की जरूरत, इसे अनिवार्य रूप से लाया जाना चाहिए : इलाहाबाद हाई कोर्ट
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प्रयागराज : समान नागरिक संहिता के मसले पर देशभर में छिड़ी बहस के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस पर बड़ी टिप्‍पणी की है। कोर्ट ने कहा कि समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) देश की जरूरत है और इसे अनिवार्य रूप से लाया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा, जैसा कि 75 साल पहले डॉक्टर बीआर अंबेडकर ने कहा था,  अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा व्यक्त की गई आशंका और भय के मद्देनजर इसे सिर्फ स्वैच्छिक नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट ने यह टिप्‍पणी अंतर्धार्मिक विवाह से संबंधित 17 याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दी और केंद्र सरकार से संविधान के अनुच्छेद 44 के उन प्रावधानों को लागू करने के लिए एक पैनल गठित करने पर विमर्श के लिए कहा, जिसमें कहा गया है कि 'राज्य नागरिकों के लिए एक समान संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।'

कोर्ट ने इस मामले में मैरिज रजिस्ट्रार को तत्‍काल याचिकाकर्ताओं के विवाह को पंजीकृत करने के भी निर्देश दिए और कहा कि वे धर्म परिवर्तन के संबंध में सक्षम जिला प्राधिकारी के अनुमोदन का इंतजार न करें और न ही ऐसा होने पर ही पंजीकरण पर जोर दें।

'संसद करे हस्‍तक्षेप'

कोर्ट ने कहा, यह समय की आवश्यकता है कि संसद में 'एक परिवार संहिता' लाया जाए, ताकि अंतर्धार्मिक शादी करने वाले जोड़ों के साथ समाज में 'अपराधियों के जैसा सलूक न हो।' कोर्ट ने कहा कि अब वह स्थिति आ गई है कि संसद इस मामले में हस्तक्षेप करे और इस पर विचार करे कि क्या देश को अलग-अलग विवाह व पंजीकरण कानूनों की आवश्यकता है या इसे एकल परिवार संहिता के अंतर्गत लाया जाना चाहिए।'

कोर्ट की यह टिप्‍पणी उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए वकील की उस दलील पर आई, जिसमें उन्‍होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं के विवाह को जिला प्राधिकरण द्वारा जांच के बगैर पंजीकृत नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्‍होंने व‍िवाह के उद्देश्‍य से अपने पार्टनर के धर्म में परिवर्तन किया और इससे पहले जिला मजिस्ट्रेट से उन्‍हें अनिवार्य मंजूरी नहीं मिली थी।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने हालांकि दलील दी कि नागरिकों को अपने साथी और धार्मिक विश्वास को चुनने का अधिकार है और धर्म परिवर्तन उन्‍होंने अपनी इच्‍छा से किया। उन्‍होंने यह भी कहा कि धर्म परिवर्तन और विवाह से पहले जिला प्राधिकरण की स्वीकृति के बाद ही विवाह का पंजीकरण कोई अनिवार्य शर्त नहीं है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि दो लोगों के एक साथ होने को विवाह महज कानूनी मान्‍यता प्रदान करता  है। विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग कानूनों के तहत विवाह में कुछ भी 'विशेष' नहीं है। याचिकाकर्ताओं के साथ अपराधियों जैसा सलूक नहीं किया जा सकता।

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