मेजर मनोज तलवार: कारगिल युद्ध का वह हीरो, जिसने कहा था- सेहरा नहीं बाध सकता मां, जीवन तो देश पर कुर्बान है

देश
किशोर जोशी
Updated Jun 13, 2021 | 07:29 IST

कारगिल युद्ध को कौन भूल सकता है जब पाकिस्तान ने पीठ के पीछे से वार किया था। इस वार की कीमत उसे करारी हार के रूप में चुकानी पड़ी थी जिसमें देश के जाबांजो का अहम योगदान रहा और इन्ही में से एक थे मेजर मनोज तलवार।

Major Manoj Talwar, A Hero of the Kargil War who refused several marriage proposals for the sake of the country
मेजर मनोज तलवार 

मुख्य बातें

  • 13 जून 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे मेजर मनोज तलवार
  • मेजर मनोज तलवार के नेतृत्व में सैन्य टुकड़ी ने फहराया था टुरटुक पर तिरंगा
  • मेजर मनोज तलवार के पार्थिव शरीर के साथ ही पहुंची थी उनकी लिखी चिट्ठी

नई दिल्ली:  जून 1999 के उस साल को भला कौन भूल सकता है जब पाकिस्तान ने पीठ पर खंजर भोंकते हुए कारगिल में नापाक हरकत की थी। पाकिस्तान के सारे मंसूबें धरे के धरे रह गए जब भारतीय जाबांजों ने उन्हें मोहतोड़ जवाब दिया। इन्हीं जाबांजों में से एक थे मेजर मनोज तलवार। 12 जून 1999 को मेजर मनोज तलवार कारगिल के टुरटुक सेंटर पर 19 हजार फीट ऊंची चोटी के लिए रवाना हो गए जहां पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कब्जा कर लिया था। 

मेजर तलवार के नेतृत्व में फहराया था टुरटुक की चोटी पर तिरंगा
पाकिस्तानी घुसपैठिये और फौज लगातार फायरिंग औऱ तोप के गोले बरसा रही थी लेकिन भारतीय जवान उन्हें मुंहतोड़ जवाब देते हुए टुरटुक पहाड़ी की तरफ बढ़ रहे थे और मेजर मनोज तलवार के नेतृत्व में सैन्य टुकड़ी ने आखिरकार पाकिस्तानी जवानों और घुसपैठियों को वापस जाने पर मजबूर कर दिया और टुरटुक की पहाड़ी पर तिरंगा फहरा लिया। मेजर मनोज तिरंगा फहराकर आगे बढ़े ही थे कि दुश्मनों ने एक तोप का ऐसा गोला छोड़ा कि वो शहीद हो गए, लेकिन शहीद होने से पहले वो अपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज करा गए।

जिस दिन पहुंचा पार्थिव शरीर, उसी दिन पहुंची चिट्ठी
शहादत के बाद जब 16 जून, 1999 को मेजर मनोज तलवार का तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर उनके घर पहुंचा तो इत्तेफाक से उसी दिन उनके हाथों लिखा वो खत भी पहुंचा जो उन्होंने 11 जून को लिखा था। यह चिट्ठी उन्होंने अपने मां-पिता को लिखी थी जिसमेंउन्होंने लिखा था... डियर मम्मी-पापा चिंता मत करना, मैं युद्ध में अपना फर्ज निभा रहा हूं।

फौजी परिवार में हुई थी परवरिश
मूल रूप से पंजाब के जालंधर के रहने वाले मेजर मनोज तलवार का जन्म एक फौजी परिवार में हुआ था जिनके पिता कैप्टन पीएल तलवार भी देश सेवा कर चुके हैं। सैन्य परवरिश होने की वजह से मेजर मनोज ने भी बचपन में ही आर्मी ज्वॉइन करने की सोच ली थी। वह अपने दोस्तों से कहते थे कि मैं बड़ा होकर सेना में जाऊंगा और अपने इस सपने को पूरा भी कर लिया जब उन्होंने एनडीए की परीक्षा पास कर ली। 1992 में महार रेजीमेंट में कमीशन होने के बाद लेफ्टिनेंट के रूप में उन्हें पहली तैनाती जम्मू-कश्मीर में मिली। इसके बाद वो असम गए जहां उल्फा उग्रवादियों से निपटने में अहम भूमिका निभाई। उनके जूनून का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1999 को उनकी तैनाती अपने गृहराज्य पंजाब के फिरोजपुर में हो गई लेकिन उन्होंने सियाचिन में तैनाती की मांग कर दी।

जब मां को बोला था मुझे नहीं करनी शादी
क्रिकेट के शौकीन मेजर तलवार के देशप्रेम का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जब एक बार उनकी मां तथा बहन ने उनसे शादी की बात छेड़ी थी तो उनका जवाब था, 'मां मैं सेहरा नहीं बांध सकता, क्योंकि मेरा तो समर्पण देश के साथ जुड चुका है और मैं वतन की हिफाजत के लिए प्रतिबद्ध हूं। मैं किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं कर सकता।' हुआ भी वहीं और कारगिल युद्ध के दौरान अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए वो शहीद हो गए।

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