क्या दिखावा है विचारधारा और संघर्ष की राजनीति जैसी बातें? पार्टियां ही नहीं दल बदलने वाले नेताओं से हों सवाल

देश
लव रघुवंशी
Updated Jun 19, 2021 | 14:11 IST

हमारी राजनीति में चुनाव से पहले या बाद में कई नेता दल बदलते हैं। इसे काफी सामान्य बना दिया गया है, जबकि यहां नेताओं से कई सवाल होने चाहिए।

Jitin Prasada and mukul roy
जितिन प्रसाद और मुकुल रॉय 

मुख्य बातें

  • हाल ही में कांग्रेस के जितिन प्रसाद बीजेपी में शामिल हुए हैं
  • वहीं मुकुल रॉय बीजेपी छोड़ फिर से टीएमसी का हिस्सा बन गए हैं
  • दोनों नेताओं ने चुनाव से पहले या बाद में अपना-अपना दल बदला है

हाल ही में दो बड़े नेताओं ने दल बदले, जिसकी खूब चर्चा हुई। पहले जितिन प्रसाद कांग्रेस छोड़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए। इसे कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में बड़ा झटका बताया गया। उन्हें ब्राह्मण नेता के रूप में पेश किया गया। कहा गया कि कांग्रेस अपने नेताओं को नहीं रोक पा रही है। एक के बाद एक युवा नेता पार्टी छोड़ रहे हैं। कांग्रेस कब जागेगी? कांग्रेस किस स्थिति में आ गई है कि हर कोई वहां से निकलना चाहता है। कांग्रेस से कई सवाल हुए। 

वहीं दूसरे मुकुल रॉय हैं, जो भाजपा छोड़ वापस से तृणमूल कांग्रेस (TMC) में शामिल हो गए। इसे पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए बड़ा झटका बताया गया और ममता बनर्जी का मास्टरस्ट्रोक कहा गया। हालांकि बंगाल में चुनाव हो गए हैं तो इस पर उतनी ज्यादा चर्चा नहीं हो पाई।

इस बीच जब नेता इधर-उधर हो रहे हैं तब दलों से सवाल किए जा रहे हैं। हालांकि यहां सवाल उन नेताओं से ज्यादा होने चाहिए जो दल बदल रहे हैं। उनसे पूछा जाना चाहिए कि जिस दल के साथ आप लंबे समय से जुड़े रहे, बात-बात पर उसकी विचारधारा की दुहाई देते रहे, क्या आज उसे सिर्फ इसलिए छोड़ रहे हैं कि वो सत्ता में नहीं है और वहां आगे भी सत्ता की रहा मुश्किल दिख रही है? 

पूछे जाने चाहिए कई सवाल

उनसे पूछा जाना चाहिए कि आप बात-बात पर खुद को जमीन से जुड़ा कार्यकर्ता कहते थे, लेकिन जब सत्ता गई तो बहुत दिन तक आप उससे दूर क्यों नहीं रह सके? जो दल सत्ता में है क्या वहां आपको अब सब सही लग रहा है? जिस दल में गए हैं उसके विरोध में आपने न जाने क्या-क्या कहा, अब जब वहां चले गए हैं तो जाने से पहले उन सब कमियों पर आपने उनसे बात की थी? या अब वो कमियां दूर हो गई हैं?

चुनाव के आस-पास बदलते हैं दल

इन नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि जिस दल को आप छोड़कर आए हैं, उसमें कमी आपको चुनाव के आस-पास ही क्यों दिखती है? अगर पहले से दिक्कतें थीं तो तभी आपने क्यों नहीं छोड़ा, क्या चुनाव का इंतजार कर रहे थे? क्या यहां बढ़िया डील होने पर आप आए हैं? सवाल कई हैं। हालांकि कई बार नेताओं के लिए किसी दल में इस तरह के हालात बन जाते हैं कि उन्हें फैसले लेने पड़ते हैं, लेकिन हमारे यहां राजनेता अक्सर चुनाव के आस-पास ही दल बदलते हैं, जो कई सवाल खड़े करता है।  

इसलिए भी उठ रहे सवाल

जितिन प्रसाद और मुकुल रॉय के मामलों में ये सवाल उठते भी हैं, क्योंकि जितिन ने कांग्रेस तब छोड़ी है जब यूपी में अगले साल चुनाव होने हैं और राज्य में कांग्रेस की स्थिति बेहतर नहीं है। यानी वो अपने दम पर सत्ता में आने की बिल्कुल स्थिति में नहीं है। यहां कहा जा सकता है कि जितिन बीजेपी में आकर आगे भविष्य में केंद्र या राज्य में सत्ता सुख खोज रहे हों। वहीं मुकुल रॉय ने टीएमसी में उस समय वापसी की है जब बीजेपी विधानसभा चुनाव हार गई है। अगले 5 साल एक बार फिर ममता बनर्जी के हाथ में सत्ता रहने वाली है।
 

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