BJP की मिशन 2022 पर नजर, जितिन प्रसाद के जरिए ब्राह्मण समुदाय को साधने की कोशिश

जितिन प्रसाद भाजपा में ऐसे समय शामिल हुए हैं जब कोरोना की दूसरी लहर के प्रबंधन को लेकर योगी सरकार पर सवाल उठे हैं और पार्टी नेताओं के एक तबके में एक तरह के असंतोष की बात सामने आई है।

BJP wants to attract Brahmin voters through Jitin Prasada
कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए हैं जितिन प्रसाद।  |  तस्वीर साभार: PTI

मुख्य बातें

  • कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं जितिन प्रसाद
  • उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण अदा करते आए हैं अहम भूमिका
  • नितिन प्रसाद के शामिल होने से भाजपाा को मिला है एक युवा ब्राह्मण चेहरा

कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। शाहजहांपुर से आने वाले जितिन प्रसाद ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। वह पढ़े-लिखे और युवा नेता हैं। कांग्रेस के पूर्व  अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी के कोर टीम का हिस्सा रहे जितिन के भगवा पार्टी में शामिल होने से क्या यूपी की सियासत में कोई फर्क पड़ेगा। देश के सबसे बड़े राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में जितिन प्रसाद भाजपा के लिए कितने फायदेमंद और अन्य पार्टियों के लिए कितने नुकसानदेह साबित हो सकते हैं, सियासी गलियारे में इसकी चर्चा अभी से होने लगी है।  

राज्य में 12 प्रतिशत से ज्यादा है ब्राह्मणों का वोट प्रतिशत 
यूपी में ब्राह्मणों का वोट बैंक 12 प्रतिशत से ज्यादा है। यह राज्य के करीब 28 प्रतिशत वोटरों को प्रभावित करता है। राज्य में सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो ब्राह्मण समुदाय का सत्ता में दबदबा हमेशा रहा है। सभी पार्टियों की नजर इस वोट पर बैंक है। भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा कोई भी ब्राह्मण समुदाय को नाराज करने की जोखिम नहीं उठाता लेकिन माना जाता है कि 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद ब्राह्मण समुदाय में एक तरह से नाराजगी है। ब्राह्मण समुदाय का मानना है कि योगी के सीएम बनने के बाद उनके रसूख एवं रूतबे में कमी आई है। ऐसी चर्चा चलती है कि योगी प्रशासन में दो एक लोगों को छोड़कर बाकी मंत्रियों को अहम पद नहीं दिया गया है। लाल फीताशाही में भी उनकी धमक कम हुई है। 

पंचायत चुनाव में भाजपा को लगा है झटका
प्रसाद भाजपा में ऐसे समय शामिल हुए हैं जब कोरोना की दूसरी लहर के प्रबंधन को लेकर योगी सरकार पर सवाल उठे हैं और पार्टी नेताओं के एक तबके में एक तरह के असंतोष की बात सामने आई है। हाल में संपन्न हुए पंचायत चुनावों के परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं आए हैं। भाजपा को इस चुनाव में हिंदुओं के सांस्कृतिक शहरों अयोध्या और वाराणसी में झटका लगा है। माना जाता है कि गैर-ठाकुर जातियों की नाराजगी के चलते इन दो शहरों में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। विकास दुबे एनकाउंटर को लेकर भी ब्राह्मण समाज नाराज बताया जाता है। लोगों का कहना है कि योगी सरकार में ठाकुरों को ज्यादा अहम एवं प्रभावशाली पद दिया गया है।

योगी कैबिनेट में कई ब्राह्मण चेहरे
भाजपा में ब्राह्मण नेताओं की कमी नहीं है और उन्हें अहम जिम्मेदारियां भी दी गई हैं। डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा, मंत्री महेंद्र नाथ पांडे, श्रीकांत शर्मा, ब्रजेश पाठक और रीता बहुगुणा जोशी ब्राह्मण समुदाय से हैं और इन्हें अहम जिम्मेदारियां मिली हुई हैं। इनके अलावा राम नरेश अग्निहोत्री, नीलकंठ तिवारी, सतीश चंद्र द्विवेदी, चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय और आनंद स्वरूप शुक्ला योगी कैबिनेट में मंत्री हैं। राज्य में भाजपा के 50 से ज्यादा विधायक इसी समुदाय से हैं। 

भाजपा को मिला युवा चेहरा
समझा जाता है कि जितिन प्रसाद के शामिल होने से ब्राह्मण वोटरों को आकर्षित करने के लिए भाजपा को एक नया और युवा चेहरा मिला है। इससे भाजपा को ब्राह्मण समुदाय की थोड़ी नाराजगी दूर करने में मदद मिलेगी। राज्य में इस समुदाय के प्रभाव को देखते हुए कोई भी पार्टी इन्हें नाराज नहीं करना चाहती। कुछ समय पहले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि उनकी पार्टी यदि सत्ता में आती है तो वह परशुराम जयंती के दिन अवकाश घोषित करेगी। जबकि मायावती की 'सोशल इंजीनियरिंग' उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा चुकी है।  

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