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खामेनेई का आखिरी सफर: क्यों तेहरान, कर्बला और नजफ से गुजरेगा जनाजा? ईरान का हिडेन मैसेज डिकोड

Ayatollah Ali Khamenei Funeral: ईरान अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का जनाजा मुख्य रूप से पांच शहरों से गुजरेगा, जिसमें दो इराक में शामिल हैं। ये पांचों शहर शिया संप्रदाय के लिए काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

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खामेनेई के अंतिम संस्कार का रूट
Authored by: Shishupal Kumar
Updated Jul 3, 2026, 19:08 IST

Ayatollah Ali Khamenei Funeral: ईरान, इस्लामिक क्रांति के बाद से इस बात पर फोकस रहा है कि हर मौके पर वो अपनी शक्ति, रणनीति और कूटनीतिक का प्रदर्शन इस तरह से करे कि उसका एक खास मतलब निकले- निर्विवाद शिया मुल्क, इस्लामिक शक्ति और पश्चिम से टक्कर लेने वाला। और बात जब ईरान के सुप्रीम लीडर की आती है तो यहां सबकुछ पीछे छूट जाता है। आज जिस तरह से ईरान ने अमेरिका और इजराइल से जंग लड़ा है, नुकसान उठाया है, कोई दूसरा मुल्क होता तो अपने नेता का अंतिम संस्कार चुपचाप कर चुका होता। लेकिन ईरान ने ऐसा नहीं किया, उसने 28 फरवरी से अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के शव को रखे रहा, अब जब जंग थम गई, तब उनका अंतिम संस्कार करने जा रहा है, वो भी बड़े कूटनीतिक संदेश के साथ।

दो देशों से गुजरेगा खामेनेई का जनाजा

ईरान ने अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के लिए जो रूट तय किया है, उसमें पहली बार है कि जनाजा दो देशों से होकर गुजरेगा। पहला ईरान, दूसरा इराक। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई की अंतिम विदाई का खाका महज एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि इस्लामिक गणराज्य की नींव और उसकी विचारधारा का एक जीता-जागता घोषणापत्र जैसा है। उनका जनाजा जिन पांच खास शहरों से होकर गुजरेगा, उनमें से हर एक पड़ाव ईरान की राजनीतिक ताकत, धार्मिक आस्था और रणनीतिक दबदबे की एक अनकही कहानी बयां कर रहा है। अयातुल्ला अली खामेनेई का जनाजा तेहरान से शुरू होगा, फिर कोम, कर्बला, नजफ और आखिर में मशहद में समाप्त होगा। अब सवाल ये है कि ईरान इन पांचों शहरों से जनाजा निकालकर क्या संदेश देना चाहता है, इराक क्यों जा रहा है खामेनेई का जनाजा?

खामनेई का आखिरी सफर (फोटो- AP)

खामनेई का आखिरी सफर (फोटो- AP)

शिया का निर्विवाद नेता

दुनिया में इस्लामिक कौम के सीधे तौर पर दो संप्रदाय हैं, शिया और सुन्नी। वहीं मुस्लिम देशों की संख्या 57 है। इनमें से सिर्फ 4 शिया बहुल देश हैं, जिसमें ईरान, इराक, अजरबैजान और बहरीन शामिल हैं। बाकि 53 देशों में सुन्नी बहुत हैं, जिसमें अरब देश भी शामिल हैं। ईरान अपने आप को शिया के मुखिया के रूप में दुनिया के सामने पेश करते रहे हैं, बहरीन और अजरबैजान से ईरान के संबंध अच्छे नहीं है, जबकि इराक से सद्दाम हुसैन की मौत के बाद संबंध घनिष्ठ हैं। ईरान, इराक से जनाजा निकालकर ये साफ संदेश देना चाह रहा है कि दो बड़े शिया देश एक हैं, अजरबैजान भी अपना प्रतिनिधि इस कार्यक्रम के लिए भेज रहा है। बहरीन से तो ईरान जंग में ही उलझा था, इसलिए वो इस कार्यक्रम से दूर है।

इराक के कर्बला और नजफ क्यों?

ईरान ने खामेनेई के अंतिम सफर के लिए इराक के दो शहरों को चुना है। दोनों का इस्लामिक खासकर शिया समुदाय में बड़ा महत्व है। इसकी पुष्टि पिछले महीने इराक और ईरान की सरकारों ने मिलकर की थी। इराक के विदेश मंत्री फुआद हुसैन और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची ने बताया कि इराक की जनता और श्रद्धालु अयातुल्ला खामनेई के आखिरी दर्शन इराक में कर सकेंगे। सबसे पहले इराक की राजधानी बगदाद के काधमिय्या इलाके में जनाजा जाएगा, उसके बाद शिया समुदाय के पवित्र शहरों नजफ और कर्बला में।

कर्बला- कर्बला को शहादत का शहर कहा जाता है। कर्बला में पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन का बेहद पवित्र मजार है। सातवीं शताब्दी में इस धरती पर हुई उनकी शहादत, शिया इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे झकझोर देने वाली घटना मानी जाती है। कर्बला में होने वाला कोई भी समारोह सिर्फ दुख मनाने के लिए नहीं, बल्कि हक और हौसले की कहानी को दुनिया के सामने दोबारा दोहराने के लिए होता है।

नजफ- इस्लामिक धर्म, विशेषकर शिया इस्लाम में नजफ शहर का स्थान बेहद पवित्र और ऐतिहासिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। मक्का और मदीना के बाद शिया समुदाय के लिए इसे सबसे प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में से एक माना जाता है। यहां पैगंबर मोहम्मद के चचेरे भाई और शिया समुदाय के पहले इमाम, हजरत अली इब्न अबी तालिब की पवित्र मजार है। इस्लामिक इतिहास में हजरत अली का स्थान ज्ञान, न्याय और बहादुरी का प्रतीक माना जाता है। नजफ में ही 'वादी-उस-सलामी' स्थित है, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा कब्रिस्तान माना जाता है। इराक में स्थित यह शहर सदियों से न्याय के खिलाफ दृढ़ता और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक रहा है।

खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुंचे हैं कई अंतर्राष्ट्रीय नेता (फोटो- AP)

खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुंचे हैं कई अंतर्राष्ट्रीय नेता (फोटो- AP)

ईरान के तीन शहर, तीनों की भूमिका महत्वपूर्ण

तय कार्यक्रम के अनुसार, 4-5 जुलाई को तेहरान में समारोह आयोजित किए जाएंगे और इसके बाद 6 जुलाई को वहां एक जुलूस निकाला जाएगा। इसके बाद 7 जुलाई को यह सफर कोम पहुंचेगा, 8 जुलाई को इराक जाएगा और अंत में 9 जुलाई को खामनेई के जन्मस्थान मशहद में स्थित इमाम रजा के पवित्र मजार में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। तेहरान से राजनीति, कोम से ज्ञान और मशहद से आस्था- इन तीन शहरों के जरिए ईरान पूरी दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि उसके सुप्रीम लीडर की विरासत इन तीनों स्तंभों पर मजबूती से टिकी हुई है।

तेहरान- ईरान की राजधानी और उसकी राजनैतिक शक्ति का दिल है। यह वह जगह है जहां बैठकर खामनेई ने दशकों तक पूरे देश पर शासन किया। तेहरान में होने वाला विशाल जनसैलाब दुनिया (विशेषकर अमेरिका और इजरायल) को यह दिखाता है कि तमाम अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों और विरोध के बावजूद ईरान की सरकार अंदरूनी तौर पर आज भी कितनी मजबूत है। यह शासन की राजनैतिक ताकत का प्रदर्शन है।

कोम- ईरान का सबसे पवित्र शैक्षणिक शहर है, जहां शिया जगत का सबसे बड़ा मदरसा और धार्मिक विश्वविद्यालय (हौज़ा-ए-इल्मिया) है। ईरान की पूरी शासन व्यवस्था 'विलायत-ए-फकीह' (धार्मिक विद्वान का शासन) के सिद्धांत पर चलती है। कोम वही जगह है जहां से ईरान के इस्लामी इंकलाब की वैचारिक बुनियाद रखी गई थी।

मशहद- मशहद ईरान का सबसे पवित्र धार्मिक शहर है, जहां शिया समुदाय के 8वें इमाम, इमाम रजा का भव्य मजार स्थित है। इसके अलावा, मशहद खुद अयातुल्ला खामनेई का जन्मस्थान भी है। यह इस आखिरी सफर का अंतिम पड़ाव है। अपनी जन्मभूमि पर लौटने के साथ-साथ, इमाम रजा के हरम में दफन होना शिया आस्था में किसी भी नेता को एक 'संत या शहीद' जैसा सर्वोच्च दर्जा देता है। यह अंतिम विदाई को एक गहरे आध्यात्मिक और भावुक मोड़ पर लाकर पूरा करती है, जो देश की जनता को एकजुट रखने के लिए बेहद जरूरी है।

ईरान का संदेश साफ

ईरान अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार से अपना संदेश और मंशा दोनों दुनिया के सामने साफ कर दे रहा है, खासकर-अमेरिका, इजराइल, यूरोप और उन अरब मुल्कों के सामने, जो उससे सीधे और परोक्ष दोनों तरीके से जंग लड़ते रहे हैं- हम हारे नहीं है, हमारा सर्वोच्च नेता शहीद हुआ है, उसके बाद भी हम टूटे नहीं, हम उन्हें तब दफनाने जा रहे हैं, जब दुश्मन हमारी शर्तों पर झुक चुका है। सभी दुश्मन के एक साथ आने के बाद भी हम बहादुरी से लड़े और दुश्मन को समझौते के लिए मजबूर किया। जंग से पहले जिन शर्तों को मानने के लिए तैयार थे, आज भी उन्हीं पर टिके हैं...।
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