अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की 'सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' (Siang Upper Multipurpose Project - SUMP) के खिलाफ स्थानीय निवासियों और जनजातीय संगठनों का गुस्सा हिंसक रूप ले चुका है। पासीघाट (Pasighat) और आसपास के इलाकों में 12 घंटे के बंद के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच हुई झड़पों में एनएचपीसी (NHPC) के दफ्तर, पुलिस स्टेशन और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। यह पूरा विवाद क्या है, सरकार इस प्रोजेक्ट को क्यों लाना चाहती है और स्थानीय लोग इसका कड़ा विरोध क्यों कर रहे हैं, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
क्या है 'सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' (SUMP)?
तिब्बत से निकलने वाली 'यारलुंग त्सांगपो' नदी जब अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, तो इसे सियांग नदी कहा जाता है, और आगे चलकर यही नदी असम में ब्रह्मपुत्र बन जाती है। यह देश के सबसे बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में से एक है, जिसकी प्रस्तावित क्षमता 11,200 मेगावाट है। इस मेगा प्रोजेक्ट को नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) द्वारा क्रियान्वित किया जाना प्रस्तावित है। यह लगभग दो दशक पुरानी योजना है, जिसे हाल के दिनों में फिर से गति मिली है।
सरकार इस प्रोजेक्ट को क्यों लाना चाहती है? केंद्र और राज्य सरकार (विशेषकर मुख्यमंत्री पेमा खांडू की सरकार) इस प्रोजेक्ट के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े तर्क देती है।
चीन की चाल का मुकाबला
चीन द्वारा तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा 'मेडोग डैम' (Medog Dam) बनाया जा रहा है। भारत सरकार का मानना है कि अगर चीन कभी पानी के प्राकृतिक प्रवाह को रोकता है या अचानक छोड़ता है, तो पूर्वोत्तर भारत में भारी तबाही आ सकती है। इस विशाल डैम के जरिए भारत पानी के भंडारण और नियंत्रण को अपने हाथ में रखना चाहता है। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, यह प्रोजेक्ट लगभग 9 अरब क्यूबिक मीटर पानी का भंडारण कर सकता है, जो असम और अरुणाचल प्रदेश की सिंचाई और बाढ़ प्रबंधन की जरूरतों को पूरा करने में मददगार साबित होगा।
प्रदर्शनकारी और स्थानीय लोग इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? स्थानीय जनजातीय समुदायों (विशेषकर आदि समुदाय - Adi Community) और पर्यावरणविदों का मानना है कि इस बांध के फायदे से ज्यादा इसके विनाशकारी परिणाम होंगे।
विस्थापन और अस्तित्व का संकट
इस मेगा प्रोजेक्ट के कारण ऊपरी सियांग जिले के मुख्यालय यांगयोंग समेत कई पारंपरिक गांव और पुश्तैनी जमीनें पूरी तरह जलमग्न हो सकती हैं, जिससे हजारों लोग बेघर हो जाएंगे।
- यह पूरा क्षेत्र अत्यधिक भूकंप-संवेदनशील 'सिस्मिक जोन V' के अंतर्गत आता है। स्थानीय लोगों का तर्क है कि इस भू-भाग पर इतना भारी-भरकम डैम बनाना बड़े भूकंप या भूस्खलनके समय किसी बड़ी महाप्रलय को बुलावा देने जैसा है, जिससे पूरा क्षेत्र तबाह हो सकता है।
- सियांग नदी घाटी की अनूठी जैव विविधता, जंगल, और स्थानीय लोगों की मछली पकड़ने तथा कृषि पर आधारित आजीविका हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी। लोगों का कहना है कि यह नदी उनके लिए सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और पहचान है।
क्या है प्रदर्शनकारियों की मांगें और विवाद?
सरकार द्वारा प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट (PFR) और सर्वे का काम शुरू किए जाने के बाद से ही स्थानीय संगठनों ने इसका विरोध तेज कर दिया था। पासीघाट में 12 घंटे के बंद के बाद स्थिति उस समय बेकाबू हो गई जब प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बैरिकेड्स तोड़ने की कोशिश की। इसके बाद हुई हिंसक झड़पों में एनएचपीसी कार्यालय, पुलिस चौकी और कई पुलिस वाहनों को जला दिया गया। प्रदर्शनकारी मांग कर रहे हैं कि सर्वे का काम तुरंत रोका जाए, पहले गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए, क्षेत्र से केंद्रीय बलों (CAPF) को हटाया जाए और स्थानीय पारंपरिक संस्थाओं का सम्मान किया जाए।
दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि अभी केवल परियोजना की संभावनाओं का अध्ययन किया जा रहा है और किसी भी निर्माण से पहले जनता के हितों को ध्यान में रखा जाएगा। लेकिन सियांग घाटी के लोग इस शुरुआती प्रक्रिया को ही अपनी पहचान और जमीन पर मंडराता हुआ बड़ा खतरा मान रहे हैं।