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Mali: कौन हैं माली के ये खतरनाक जिहादी संगठन, जिनके आगे रूसी फौज भी बेबस? कई हिस्सों पर कब्जा

Mali Violence: माली में हालात लगातार बिगड़ रहे हैं, वो भी तब जब यहां रूसी फौज तैनात है। यहां मौजूद जिहादी ताकतें अब काफी ताकतवर हो चुकी हैं, वर्तमान सैन्य शासन भी सवालों के घेरे में है।

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माली में जिहादी गुटों ने मचाया उत्पात (AI Photo)
Curated by: Shishupal Kumar
Updated Apr 27, 2026, 16:58 IST
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Mali Violence: पश्चिम अफ्रीकी देश माली में इस समय अफरा-तफरी मची है। देश में हाल ये हो रखा है कि रक्षा मंत्री तक का मर्डर हो गया है। उनके परिवार के कई सदस्यों तक की हत्या हो गई है और ये सब तब हो रहा है, जब माली में सुरक्षा के लिए रूसी सैनिक तैनात हैं, जिन्हें भारी-भरकम रकम मिलती है। इन सारे कारनामों का आरोप जिहादी संगठनों पर है। अब सवाल ये है कि ये जिहादी संगठन आखिर हैं कौन, इनकी ताकत कितनी है, जो माली के सैन्य शासन को चुनौती दे रहे हैं? आइए समझते हैं।

कौन हैं माली के जिहादी संगठन?

माली में सक्रिय प्रमुख जिहादी संगठनों का संबंध वैश्विक आतंकी नेटवर्क से है। इनमें अल-कायदा (Al-Qaeda) से जुड़े गुट और इस्लामिक स्टेट (Islamic State) से प्रेरित संगठन शामिल हैं। ये संगठन लंबे समय से उत्तरी और मध्य माली में अपनी पकड़ मजबूत करते रहे हैं। इनका मकसद सिर्फ हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में अपने कट्टरपंथी शासन की स्थापना करना है। स्थानीय असंतोष, गरीबी और कमजोर सरकारी पकड़ का फायदा उठाकर ये गुट तेजी से अपने नेटवर्क का विस्तार करते हैं।

  • JNIM (जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन)
यह माली का सबसे प्रभावशाली और प्रमुख जिहादी गठबंधन माना जाता है, जो सीधे तौर पर अल-कायदा से जुड़ा हुआ है। राजधानी क्षेत्र सहित कई संवेदनशील ठिकानों—जैसे काती और बमाको एयरपोर्ट—पर बड़े हमलों की जिम्मेदारी इसी संगठन ने ली है। उत्तरी माली के शहरों में भी इसकी मजबूत पकड़ देखी जाती है।
  • इस्लामिक स्टेट इन द ग्रेटर सहारा (ISGS)
यह संगठन मुख्य रूप से सीमा क्षेत्रों में सक्रिय है और JNIM के साथ-साथ सरकारी बलों के खिलाफ लड़ाई में शामिल रहता है। दोनों संगठनों के बीच प्रतिस्पर्धा और सहयोग, दोनों तरह के समीकरण देखने को मिलते हैं, जिससे हालात और जटिल हो जाते हैं।
  • अन्य उप-गुट और पुराने संगठन
माली में जिहादी नेटवर्क केवल इन दो बड़े संगठनों तक सीमित नहीं है। कटिबा मसीना, अंसारुल इस्लाम जैसे गुट और अंसार दीन व MUJAO जैसे पुराने संगठनों के बचे हुए हिस्से भी सक्रिय रहे हैं। समय के साथ इनमें से कई गुट JNIM के तहत एकजुट हो गए हैं, जिससे इसकी ताकत और प्रभाव बढ़ा है।
  • अलगाववादी भी बने बड़ी चुनौती

माली की समस्या सिर्फ जिहादी संगठनों तक सीमित नहीं है। उत्तर में तुआरेग समुदाय से जुड़े अलगाववादी गुट भी सक्रिय हैं, जो ‘अजावाद’ नाम से एक अलग राज्य की मांग करते हैं। Azawad Liberation Front जैसे संगठन वर्षों से इस क्षेत्र में संघर्ष कर रहे हैं।

किदाल में जिहादी ग्रुप के लड़ाके (फोटो- AP)

किदाल में जिहादी ग्रुप के लड़ाके (फोटो- AP)

माली में क्या कर रही है रूसी फौज?

2020 में माली में तख्तापलट हुआ, जिसमें तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम बूबाकर कीता को सत्ता से हटा दिया गया और उनकी सरकार की जगह कर्नल असिमी गोइता के नेतृत्व में सैन्य शासन स्थापित हो गया। इस घटनाक्रम में रूस की भूमिका को लेकर कई तरह की अटकलें भी सामने आईं। 2021 में गोइता के सीधे तौर पर सत्ता संभालने के बाद माली सरकार का झुकाव रूस की ओर और ज्यादा बढ़ गया। माली में रूसी सैन्य उपस्थिति भी इसी दौर में मजबूत होती गई। पहले जहां वागनर ग्रुप के लड़ाके सक्रिय थे, 2023 में वागनर ग्रुप से जुड़े विद्रोह के बाद माली में मौजूद रूसी बलों का पुनर्गठन किया गया और उन्हें सीधे क्रेमलिन के नियंत्रण में “अफ्रीका कॉर्प्स” के रूप में ढाल दिया गया, ताकि क्षेत्र में रूस का प्रभाव और पकड़ बनी रहे। ये बल माली की सैन्य सरकार को विद्रोही और जिहादी समूहों के खिलाफ समर्थन दे रहे हैं, जिनकी संख्या करीब 1500 से 2500 के बीच बताई जाती है। शुरुआत में इन रूसी लड़ाकों को फ्रांसीसी सेना की जगह लाने के तौर पर देखा गया था, लेकिन समय के साथ इन्हें भारी नुकसान और आम नागरिकों के खिलाफ कथित अत्याचारों के आरोपों का भी सामना करना पड़ा।

क्यों भारी पड़ रहे हैं जिहादी गुट?

अलगाववादी वर्षों से उत्तरी माली में एक स्वतंत्र राज्य बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। जिहादी जुट सैन्य शासन के खिलाफ है। अब गरीबी और बेरोजगारी से परेशान जनता भी उनका साथ देने लगी है। नए रास्ते की तलाश में जवान हो रहे युवा, अलोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुकी है। मौजूदा सरकार एक जुंटा (सैन्य शासन) है, जिसने चुनाव कराने के वादे किए हैं, लेकिन बार-बार देरी भी होती रही है। इन सब चीजों से जिहादी गुट ताकतवर होते जा रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, जिहादी और विद्रोही गुट गुरिल्ला युद्ध में माहिर हैं। वे छोटे-छोटे समूहों में हमला करते हैं, स्थानीय समर्थन हासिल करते हैं और कठिन भौगोलिक इलाकों का फायदा उठाते हैं। इनका मकसद सिर्फ हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में अपने कट्टरपंथी शासन की स्थापना करना है। स्थानीय असंतोष, गरीबी और कमजोर सरकारी पकड़ का फायदा उठाकर ये गुट तेजी से अपने नेटवर्क का विस्तार करते हैं।

माली के रक्षामंत्री (फोटो- AP)

माली के रक्षामंत्री (फोटो- AP)

माली में क्या हैं वर्तमान हालात?

शनिवार को माली की राजधानी बमाको समेत कई शहरों में एक साथ हुए हमलों ने देश की सुरक्षा व्यवस्था को हिला कर रख दिया। यह हमला माली की सेना पर अब तक के सबसे बड़े और संगठित हमलों में गिना जा रहा है। इस हिंसक घटनाक्रम में देश के रक्षा मंत्री जनरल सादियो कमारा की भी मौत हो गई, जिससे हालात और गंभीर हो गए। हमलावरों ने न केवल बड़े पैमाने पर हमले किए, बल्कि कई अहम शहरों और सैन्य ठिकानों पर कब्जा जमाने में भी कामयाबी हासिल की। अलगाववादी तुआरेग समूह, अजावाद लिबरेशन फ्रंट के प्रवक्ता ने दावा किया कि हमलों के बाद रूसी “अफ्रीका कॉर्प्स” के सैनिकों और माली की सेना ने किदाल शहर से पीछे हटना शुरू कर दिया। उनके मुताबिक यह वापसी एक तय समझौते के तहत शांतिपूर्ण तरीके से की गई। प्रवक्ता मोहम्मद अल मौलूद रमजान ने यहां तक कहा कि “किदाल अब आजाद हो चुका है।” इस घटनाक्रम की पुष्टि रविवार देर रात सरकारी टेलीविजन पर भी की गई। सशस्त्र बलों के प्रमुख जनरल उमर डियारा ने स्वीकार किया कि माली की सेना किदाल छोड़ चुकी है। उन्होंने बताया कि अब सेना के दस्ते किदाल से करीब 100 किलोमीटर दक्षिण में स्थित अनेफिस शहर में पुनः तैनात किए जा रहे हैं।

आगे का रास्ता माली के लिए कितना कठिन?

माली में बढ़ती हिंसा और जिहादी कब्जा न सिर्फ देश के लिए, बल्कि पूरे पश्चिम अफ्रीका के लिए खतरे की घंटी है। रक्षा मंत्री की मौत और सैन्य ठिकानों के गिरने से यह साफ है कि हालात अभी और बिगड़ सकते हैं। कुल मिलाकर, माली आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां जिहादी संगठन, अलगाववादी विद्रोही और कमजोर शासन- तीनों मिलकर एक जटिल संकट पैदा कर रहे हैं, जिसे काबू करना आसान नहीं दिख रहा।

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