बिहार में भाजपा के पहले सीएम के रूप में सम्राट चौधरी ने शपथ ग्रहण कर ली है। इससे जहां भाजपा की चिर-प्रतीक्षित अभिलाषा पूरी हुई वहीं सम्राट भारत के उन नेताओं में शुमार हो गए हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत भले ही किसी अन्य पार्टी से की लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री भाजपा ने ही बनाया। सम्राट का आरजेडी और फिर जदयू दोनों से जुड़ाव रहा। इतना ही नहीं, सम्राट चौधरी उर्फ राकेश ने राजद से ही अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी। फिर बाद में वे जदयू में आए और वहां से भाजपा में। जहां उन्हें अपनी मेहनत का असली फल मिला।
वहीं, जहां भाजपा के बारे में यह कहा जाता है कि भगवा पार्टी में संघ से आने वाले नेताओं को ज्यादा तरजीह दी जाती है, और उन्हें भाजपा संगठन और सरकार में अहम पद दिए जातें हैं, वहीं भाजपा अब यह पहचान बदल रही है। भाजपा ने कई राज्यों में दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को भी शीर्ष पद की जिम्मेदारी दी है। सम्राट ऐसे नेताओं में सबसे नई कड़ी हैं। ऐसे में हम आज उन्हीं नेताओं के बारे में आपको बताएंगे जिन्होंने भले ही अपनी राजनीति किसी और दल से शुरू की हो, लेकिन उनकी मेहनत का असली फल उन्हें भाजपा में ही मिला। आइए जानते हैं....
अर्जुन मुंडा (झारखंड)
अर्जुन मुंडा का राजनीतिक सफर झारखंड की क्षेत्रीय राजनीति और आदिवासी आंदोलन से जुड़ा रहा है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के साथ की और अलग राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 1995 में वे झामुमो के टिकट पर विधायक बने, जिससे उनकी पहचान एक जमीनी नेता के रूप में स्थापित हुई।बाद में उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की झारखंड राज्य बनाने की नीति पर भरोसा जताते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। 2000 में झारखंड के गठन के बाद वे सरकार में मंत्री बने और 2003 में महज 35 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने तीन अलग-अलग कार्यकाल में राज्य का नेतृत्व किया। मुंडा का उदाहरण दिखाता है कि कैसे भाजपा ने क्षेत्रीय आंदोलन से जुड़े नेताओं को अपने साथ जोड़कर सत्ता में मजबूत पकड़ बनाई।
गेगॉन्ग अपांग (अरुणाचल प्रदेश)
गेगॉन्ग अपांग पूर्वोत्तर राजनीति के सबसे अनुभवी और लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने कांग्रेस से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और 1980 में पहली बार अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। लंबे समय तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने राज्य की राजनीति में गहरी पकड़ बनाई।1990 के दशक में कांग्रेस से मतभेद के बाद उन्होंने अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाई और बाद में 2003 में भाजपा में शामिल हो गए। उनके भाजपा में आने से अरुणाचल प्रदेश में पहली बार भाजपा सरकार बनी। हालांकि, यह गठजोड़ ज्यादा लंबा नहीं चला और वे बाद में फिर कांग्रेस में लौट गए। अपांग का राजनीतिक सफर यह दिखाता है कि पूर्वोत्तर में विचारधारा से ज्यादा राजनीतिक समीकरण और नेतृत्व क्षमता अहम होती है।
सर्वानंद सोनोवाल (असम)
सर्वानंद सोनोवाल का राजनीतिक करियर छात्र राजनीति से शुरू हुआ। वे ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (NESO) जैसे संगठनों से जुड़े रहे। इसके बाद उन्होंने असम गण परिषद (AGP) से राजनीति में कदम रखा और विधायक व सांसद बने।2011 में वे भाजपा में शामिल हुए और पार्टी ने उन्हें जल्दी ही असम में एक प्रमुख चेहरा बना दिया। 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया और जीत के बाद वे राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने। सोनोवाल की छवि साफ-सुथरे और जनप्रिय नेता की रही, जिसने भाजपा को असम में मजबूत आधार देने में मदद की।