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BJP के ‘आउटसाइडर’ CM: सम्राट ही नहीं…इन ‘बाहरियों को भी भाजपा ने बनाया मुख्यमंत्री, दक्षिण से पूर्वोत्तर तक इन्हें मिली कुर्सी

भाजपा ने कई राज्यों में दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को भी शीर्ष पद की जिम्मेदारी दी है। सम्राट ऐसे नेताओं में सबसे नई कड़ी हैं। ऐसे में हम आज उन्हीं नेताओं के बारे में आपको बताएंगे जिन्होंने भले ही अपनी राजनीति किसी और दल से शुरू की हो, लेकिन उनकी मेहनत का असली फल उन्हें भाजपा में ही मिला। आइए जानते हैं....

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भाजपा के वो नेता जो अन्य पार्टियों से आकर बन गए सीएम।
Authored by: Shiv Shukla
Updated Apr 15, 2026, 18:48 IST
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बिहार में भाजपा के पहले सीएम के रूप में सम्राट चौधरी ने शपथ ग्रहण कर ली है। इससे जहां भाजपा की चिर-प्रतीक्षित अभिलाषा पूरी हुई वहीं सम्राट भारत के उन नेताओं में शुमार हो गए हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत भले ही किसी अन्य पार्टी से की लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री भाजपा ने ही बनाया। सम्राट का आरजेडी और फिर जदयू दोनों से जुड़ाव रहा। इतना ही नहीं, सम्राट चौधरी उर्फ राकेश ने राजद से ही अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी। फिर बाद में वे जदयू में आए और वहां से भाजपा में। जहां उन्हें अपनी मेहनत का असली फल मिला।

वहीं, जहां भाजपा के बारे में यह कहा जाता है कि भगवा पार्टी में संघ से आने वाले नेताओं को ज्यादा तरजीह दी जाती है, और उन्हें भाजपा संगठन और सरकार में अहम पद दिए जातें हैं, वहीं भाजपा अब यह पहचान बदल रही है। भाजपा ने कई राज्यों में दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को भी शीर्ष पद की जिम्मेदारी दी है। सम्राट ऐसे नेताओं में सबसे नई कड़ी हैं। ऐसे में हम आज उन्हीं नेताओं के बारे में आपको बताएंगे जिन्होंने भले ही अपनी राजनीति किसी और दल से शुरू की हो, लेकिन उनकी मेहनत का असली फल उन्हें भाजपा में ही मिला। आइए जानते हैं....

अर्जुन मुंडा (झारखंड)

अर्जुन मुंडा का राजनीतिक सफर झारखंड की क्षेत्रीय राजनीति और आदिवासी आंदोलन से जुड़ा रहा है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के साथ की और अलग राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 1995 में वे झामुमो के टिकट पर विधायक बने, जिससे उनकी पहचान एक जमीनी नेता के रूप में स्थापित हुई।

बाद में उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की झारखंड राज्य बनाने की नीति पर भरोसा जताते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। 2000 में झारखंड के गठन के बाद वे सरकार में मंत्री बने और 2003 में महज 35 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने तीन अलग-अलग कार्यकाल में राज्य का नेतृत्व किया। मुंडा का उदाहरण दिखाता है कि कैसे भाजपा ने क्षेत्रीय आंदोलन से जुड़े नेताओं को अपने साथ जोड़कर सत्ता में मजबूत पकड़ बनाई।

गेगॉन्ग अपांग (अरुणाचल प्रदेश)

गेगॉन्ग अपांग पूर्वोत्तर राजनीति के सबसे अनुभवी और लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने कांग्रेस से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और 1980 में पहली बार अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। लंबे समय तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने राज्य की राजनीति में गहरी पकड़ बनाई।

1990 के दशक में कांग्रेस से मतभेद के बाद उन्होंने अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाई और बाद में 2003 में भाजपा में शामिल हो गए। उनके भाजपा में आने से अरुणाचल प्रदेश में पहली बार भाजपा सरकार बनी। हालांकि, यह गठजोड़ ज्यादा लंबा नहीं चला और वे बाद में फिर कांग्रेस में लौट गए। अपांग का राजनीतिक सफर यह दिखाता है कि पूर्वोत्तर में विचारधारा से ज्यादा राजनीतिक समीकरण और नेतृत्व क्षमता अहम होती है।

सर्वानंद सोनोवाल (असम)

सर्वानंद सोनोवाल का राजनीतिक करियर छात्र राजनीति से शुरू हुआ। वे ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (NESO) जैसे संगठनों से जुड़े रहे। इसके बाद उन्होंने असम गण परिषद (AGP) से राजनीति में कदम रखा और विधायक व सांसद बने।

2011 में वे भाजपा में शामिल हुए और पार्टी ने उन्हें जल्दी ही असम में एक प्रमुख चेहरा बना दिया। 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया और जीत के बाद वे राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने। सोनोवाल की छवि साफ-सुथरे और जनप्रिय नेता की रही, जिसने भाजपा को असम में मजबूत आधार देने में मदद की।

हिमंत बिस्व सरमा (असम)

हिमंत बिस्व सरमा का नाम भाजपा के “गेम चेंजर” नेताओं में लिया जाता है। उन्होंने कांग्रेस के साथ अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की और तरुण गोगोई सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। वे असम की राजनीति में एक प्रभावशाली रणनीतिकार माने जाते थे। 2015 में कांग्रेस से मतभेद के बाद उन्होंने भाजपा जॉइन की। भाजपा में आने के बाद उन्होंने पूर्वोत्तर में पार्टी के विस्तार में अहम भूमिका निभाई। 2021 में वे असम के मुख्यमंत्री बने।

एन. बीरेन सिंह (मणिपुर)

एन. बीरेन सिंह का करियर राजनीति से पहले खेल और पत्रकारिता से जुड़ा रहा। उन्होंने एक क्षेत्रीय पार्टी से राजनीति शुरू की और बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस के टिकट पर वे कई बार विधायक बने और मंत्री भी रहे। 2016 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया, जबकि पार्टी के पास पूर्ण बहुमत नहीं था। उन्होंने गठबंधन के जरिए सरकार बनाई और मणिपुर में भाजपा की मजबूत नींव रखी।

पेमा खांडू (अरुणाचल प्रदेश)

पेमा खांडू का राजनीतिक सफर अपेक्षाकृत तेज रहा। वे कांग्रेस के नेता के रूप में उभरे और 2016 में मुख्यमंत्री बने। लेकिन कुछ ही महीनों बाद उन्होंने अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा समर्थित खेमे में चले गए। बाद में वे औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हुए और मुख्यमंत्री पद पर बने रहे। उनके नेतृत्व में भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में लगातार चुनावी सफलता हासिल की।

माणिक साहा (त्रिपुरा)

माणिक साहा का राजनीतिक सफर पारंपरिक नेताओं से अलग है। वे पेशे से डेंटिस्ट और शिक्षक रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस से राजनीति शुरू की, लेकिन 2016 में भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा में आने के बाद उन्होंने तेजी से संगठन में अपनी पकड़ मजबूत की और 2020 में त्रिपुरा भाजपा के अध्यक्ष बने। 2022 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया।

बसवराज बोम्मई (कर्नाटक)

बसवराज बोम्मई ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल से की थी। वे एचडी देवगौड़ा और रामकृष्ण हेगड़े जैसे नेताओं के साथ काम कर चुके हैं। बाद में वे जनता दल (यूनाइटेड) में गए और 2008 में भाजपा में शामिल हुए। भाजपा में आने के बाद उन्होंने मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले। 2021 में उन्हें कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाया गया।

युमनाम खेमचंद सिंह (मणिपुर)

युमनाम खेमचंद सिंह का राजनीतिक सफर भी कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। उन्होंने क्षेत्रीय पार्टी और बाद में तृणमूल कांग्रेस से राजनीति शुरू की। 2013 में वे भाजपा में शामिल हुए और धीरे-धीरे संगठन में अपनी जगह बनाई।मणिपुर में राजनीतिक संकट और जातीय संघर्ष के बीच वे एक संतुलित और स्वीकार्य चेहरे के रूप में उभरे। 2026 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया।

सम्राट चौधरी (बिहार)

सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर बिहार की बदलती राजनीति का प्रतीक है। उन्होंने राजद से अपने करियर की शुरुआत की और बाद में जदयू से जुड़े। कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बाद 2017 में उन्होंने भाजपा जॉइन की। भाजपा में आने के बाद वे तेजी से उभरे,प्रदेश अध्यक्ष बने, मंत्री रहे और फिर उपमुख्यमंत्री। अब पार्टी ने बिहार का मुख्यमंत्री बनाया है। जिसके बाद उनके नाम के साथ एक इतिहास जुड़ गया। वे राज्य के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री हैं। उनका उभार दिखाता है कि भाजपा अब सामाजिक समीकरणों और राजनीतिक अनुभव दोनों को ध्यान में रखकर नेतृत्व चुन रही है।
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