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बिहार की सत्ता से 'जेपी की छाप' खत्म? नीतीश-लालू का 35 साल राज... 1990 से 2026 तक कैसे बदला सियासी व्याकरण

1974 के जेपी आंदोलन से लेकर 2026 में नीतीश कुमार के इस्तीफे और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने तक का सफर। बिहार ने करीब 50 सालों में बहुत सियासी बदलाव देखें हैं। लेकिन 1990 से 2026 तक अधिकांश समय बिहार की सत्ता पर ऐसे नेता काबिज रहे जो जेपी के शिष्य थे। बात हो रही है लालू और नीतीश की। 14 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद से नीतीश के इस्तीफा देने के बाद बिहार की सत्ता से जेपी के युग का औपचारिक अंत हो गया।

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Photo : Times Now Digital
जेपी के शिष्यों ने जहां छोड़ी सत्ता, वहां से अब आगे क्या?
Authored by: Nishant Tiwari
Updated Apr 15, 2026, 16:52 IST
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बिहार की राजनीति में यह एक ऐतिहासिक मोड़ है। 15 अप्रैल 2026 की सुबह जब बिहार सोकर उठा, तो राज्य की सियासी फिजा बदल चुकी थी। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक दिन पहले अपने पद से इस्तीफा दे चुके थे और सम्राट चौधरी बिहार में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे थे। इसी के साथ जो गौर करने लायक बात है, वह यह कि 1974 के 'जेपी आंदोलन' की कोख से निकले छात्र नेताओं का वह दौर, जिसने पिछले साढ़े तीन दशकों से बिहार की सत्ता को अपनी मुट्ठी में रखा था, अब औपचारिक रूप से सिमट गया है। नीतीश कुमार के इस्तीफे और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही बिहार में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है। बिहार की सत्ता से जेपी 'युग' के औपचारिक अंत पर आइए देखते हैं, 70 के दशक से लेकर 2026 तक कैसी रही बिहार की सियासत।

'74 आंदोलन की कोख से निकली सियासत

1970 के दशक का मध्य था। जयप्रकाश नारायण (JP) ने पटना के गांधी मैदान से 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान किया था। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि पटना विश्वविद्यालय के हॉस्टलों से निकले चंद छात्र आने वाले 50 सालों तक बिहार की नियति लिखेंगे। वो छात्र थे, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी और रामविलास पासवान।

लालू यादव जहां अपनी बेबाक शैली के लिए जाने गए और पिछड़ों की आवाज बनकर उभरे, वहीं नीतीश कुमार ने अपनी छवि एक गंभीर 'विकास पुरुष' के रूप में गढ़ी। 1990 में जब लालू पहली बार मुख्यमंत्री बने, तो वह मंडल कमीशन का दौर था। बिहार की राजनीति में 'पिछड़ा बनाम अगड़ा' का ऐसा ध्रुवीकरण हुआ जिसने कांग्रेस के वर्चस्व को हमेशा के लिए उखाड़ फेंका।

90 का दशक: 'जंगलराज' का टैग और सामाजिक न्याय

फिर आया 90 का दशक, जिसे बिहार के इतिहास में 'सामाजिक न्याय' के उदय के रूप में याद किया जाता है। लालू यादव ने दबे-कुचले वर्गों को आवाज दी, लेकिन इसी दौर में बिहार पर 'जंगलराज' का ठप्पा भी लगा। चरवाहा विद्यालय, चारा घोटाला और कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति ने बिहार को 'बिमारू' (BIMARU) राज्यों की श्रेणी में सबसे ऊपर खड़ा कर दिया। शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई और युवाओं का बड़े पैमाने पर पलायन (Migration) शुरू हुआ, जो आज भी बिहार की एक बड़ी टीस है।

2005 में 'सुशासन बाबू' की पारी

2005 में नीतीश कुमार ने जब भाजपा के साथ मिलकर सत्ता संभाली, तो बिहार ने 'सुशासन' शब्द सुना। सड़कों का जाल, स्कूलों में साइकिल और पोशाक योजना, और महिलाओं के लिए पंचायत चुनाव में 50% आरक्षण ने नीतीश को बिहार का नायक बना दिया। लेकिन नीतीश की राजनीति का एक दूसरा पहलू भी रहा, और वो था गठबंधन बदलने की कला। कभी लालू के साथ 'महागठबंधन', तो कभी भाजपा के साथ 'NDA'। इस खींचतान में बिहार की जनता ने नीतीश को कई बार मुख्यमंत्री बनते देखा, लेकिन उनकी राजनीतिक साख पर 'पलटीमार' का लेबल चस्पा हो गया। शराबबंदी जैसे कड़े फैसले लेकर उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनानी चाही, लेकिन इसके क्रियान्वयन पर हमेशा सवाल उठते रहे। लेकिन अपने इन फैसलों से नीतीश हमेशा महिला वर्ग के चहेते बने रहे।

2026 में खत्म हुआ एक 'युग'

अप्रैल 2026 में नीतीश कुमार का इस्तीफा मात्र एक पद का त्याग नहीं है, बल्कि उस 'जेपी पीढ़ी' का सत्ता से अंतिम विदाई पत्र है। नीतीश कुमार अब राज्यसभा का रुख कर चुके हैं, जिससे वह जेपी आंदोलन के अंतिम सक्रिय शीर्ष नेता बन गए हैं जो चुनावी राजनीति के फ्रंट-फुट से पीछे हटे हैं। उनके साथ ही वह समाजवादी विचारधारा, जो लोहिया और जेपी के नाम पर शुरू हुई थी, अब भाजपा की संगठनात्मक शक्ति के सामने नतमस्तक नजर आ रही है।

बीजेपी का पहला 'अपना' मुख्यमंत्री

बिहार में बीजेपी ने दशकों तक नीतीश कुमार के पीछे 'छोटे भाई' की भूमिका निभाई। लेकिन 2026 में सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना यह बताता है कि अब भाजपा बिहार में किसी बैसाखी के सहारे नहीं है। सम्राट चौधरी, जो खुद कभी लालू और नीतीश की सरकारों में रह चुके हैं, आज बिहार में 'केसरिया क्रांति' के चेहरे हैं। उनके नेतृत्व में बिहार की राजनीति 'मंडल' के पुराने ढर्रे से निकलकर 'हिंदुत्व और विकास' के नए मेल की ओर बढ़ रही है।

35 सालों में क्या बदला, क्या नहीं?

जेपी आंदोलन से निकले नेताओं ने 1990 से तकरीबन 35 सालों तक बिहार के सत्ता की बागडोर को थामे रखा। राबड़ी देवी और जीतनराम मांझी के कार्यकाल को छोड़ दें तो इस पूरे कालखंड में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लालू और नीतीश ही काबिज रहे। बीते इन 35 सालों में बिहार ने बहुत कुछ देखा है। महिलाओं में शिक्षा बढ़ी, विकास की दर बढ़ी, अपराध काबू में आए लेकिन जहां नालंदा की विरासत है, वहीं आज भी छात्र अच्छे कॉलेजों के लिए दिल्ली-कोटा भागने को मजबूर हैं। एक साहसी सामाजिक प्रयोग के तौर पर लागू हुई शराबबंदी, अब केवल प्रशासनिक बोझ बनती जा रही है। बिहार की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक पलायन रही। जेपी के शिष्यों ने राजनीति तो बदली, लेकिन रोजगार के अवसर कभी उस स्तर पर नहीं पैदा कर पाए।

बिहार में अब आगे क्या?

लालू यादव आज सक्रिय राजनीति से दूर स्वास्थ्य और कानूनी पचड़ों में उलझे हैं। नीतीश कुमार ने राज्यसभा की शांत राह चुन ली है। इन दोनों ने बिहार को गौरव भी दिया और विवाद भी। लेकिन हकीकत यही है कि 1974 के उस छात्र आंदोलन की लौ अब बुझ चुकी है। 2026 का बिहार अब अपनी नई कहानी लिखने को तैयार है, जहां चुनौतियां वही पुरानी हैं, वही पलायन है, वही बाढ़ है, वही बेरोजगारी है, लेकिन इस बार चेहरे बिल्कुल नए हैं और लोगों की आस भी।

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