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Sharad Pawar: सबसे कम उम्र में महाराष्ट्र के सीएम बने थे शरद पवार, सियासी मास्टरस्ट्रोक चलने में माहिर

  • Written by: अमित कुमार मंडल
  • Updated May 3, 2023, 04:40 PM IST

शरद पवार अपने लंबे राजनीतिक जीवन में चौंकाने वाले फैसले लेने और कुछ समय बाद उन फैसलों को पलटने के लिए मशहूर रहे हैं।

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शरद पवार सियासी सफरनामा

Photo : BCCL

Sharad Pawar Political Journey: शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर सियासी धमाका किया है। पवार से ऐसे फैसले की उम्मीद कोई नहीं कर रहा था। पार्टी में हर कोई उनके फैसले से हैरान है। राजनीति में पवार अक्सर अपने सियासी मास्टर स्ट्रोक के लिए जाने जाते हैं।

सुप्रिया सुले ने कहा था- दो सियासी धमाके होंगे

एनसीपी के सुप्रीमो शरद पवार की बेटी और सांसद सुप्रिया सुले 18 अप्रैल को कहा था कि महाराष्ट्र की राजनीति में अगले 15 दिनों में दो बड़े धमाके होने वाले हैं। एक धमाका दिल्ली में होगा और दूसरा महाराष्ट्र में। ऐसा लगता है कि पहला धमाका हो गया है। आइए इस सियासी घटना के बीच शरद पवार के सियासी सफरनामे पर नजर डालते हैं।

शरद पवार अपने लंबे राजनीतिक जीवन में चौंकाने वाले फैसले लेने और कुछ समय बाद उन फैसलों को पलटने के लिए मशहूर रहे हैं। वे कब क्या फैसला लेंगे, इसकी अंदाजा उनके भरोसेमंद राजनीतिक सहयोगियों को भी नहीं रहता है। उनके सियासी कदम विरोधियों और सहयोगियों दोनों को चौंकाते हैं।

सबसे कम्र उम्र में बने महाराष्ट्र के सीएम

शरद पवार ने 967 में 27 साल की उम्र अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। उन्होंने कांग्रेस के जरिए सियासत में कदम रखा था। वह बेहद महत्वाकांक्षी रहे हैं। 1977 में जब कांग्रेस पहली बार केंद्र की सत्ता से बाहर हुई और पार्टी का विभाजन हुआ तो उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ छोड़कर अपने राजनीतिक गुरू यशवंत राव चह्वाण की अगुवाई वाली कांग्रेस को चुना। लेकिन बहुत जल्दी ही वे उस पार्टी से अलग हो गए। तब उन्होंने समाजवादी कांग्रेस के नाम से नई पार्टी बनाई।

नई पार्टी बनाने के साथ ही उन्होंने वसंतदादा पाटिल की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार को गिरा दिया। फिर केंद्र में सत्तारूढ़ जनता पार्टी के साथ मिलकर 'पुरोगामी लोकपक्ष अघाड़ी' के नाम से गठबंधन की सरकार बनाई। वह सबसे कम उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। लेकिन उनकी यह सरकार ढाई साल तक ही चल पाई। 1980 में इंदिरा गांधी की अगुवाई में कांग्रेस की सत्ता में वापसी होने पर उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई।

सरकार बर्खास्त होने के तीन साल बाद शरद पवार ने महाराष्ट्र में विपक्ष की राजनीति करते हुए केंद्र की राजनीति में भी हाथ आजमाने शुरू किए। उन्होंने 1984 में पहली बार बारामती से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। लेकिन जल्दी ही लोकसभा से इस्तीफा देकर राज्य की राजनीति में लौट आए और विधानसभा में नेता विपक्ष की कमान संभाली।

राजीव गांधी से बैठा तालमेल

इस बीच इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और राजीव गांधी को कांग्रेस की कमान मिली। राजीव गांधी के साथ शरद पवार का तालमेल बैठ गया। 1987 में पवार फिर से कांग्रेस में लौट आए। कांग्रेस में लौटने के कुछ महीनों बाद ही 26 जून 1988 को उन्हें शंकरराव चह्वाण की जगह महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना दिया गया। करीब 20 महीने बाद उनकी ही अगुवाई में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव लड़ा और दोबारा सत्ता में लौटी।

इस तरह शरद पवार तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने और जून 1991 तक इस पद पर बने रहे। इस बीच 1991 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही राजीव गांधी की हत्या हो गई। पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने और कांग्रेस को संभाला। नरसिंह राव के प्रधानमंत्री बनने पर शरद पवार भी केंद्र की राजनीति में आ गए और पहली बार केंद्र सरकार में मंत्री बने। उन्हें रक्षा मंत्रालय सौंपा गया। नरसिंह राव ने उन्हें दोबारा महाराष्ट्र भेजा और वह मार्च 1993 में चौथी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने।

1995 में विधानसभा चुनाव तक वे मुख्यमंत्री रहे, लेकिन इस बार उनकी अगुवाई में कांग्रेस हार गई। राज्य में पहली बार शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार बनी। कुछ समय बाद कांग्रेस केंद्र की सत्ता से भी बाहर हो गई। नरसिंह राव के पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद सीताराम केसरी को कमान सौंपी गई। जब 1998 में सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभाली तो शरद पवार ने अलग राह पकड़ ली।

सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर एनसीपी बनाई

शरद पवार ने पीए संगमा और तारिक अनवर जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ मिलकर सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए कांग्रेस छोड़ दी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नाम से नई पार्टी का गठन कर लिया। महाराष्ट्र में 1999 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को 58 सीटें मिली थीं, तब कांग्रेस 75 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और कांग्रेस-एनसीपी ने मिलकर सरकार बनाई जो पूरे 5 साल तक चली।

धीरे-धीरे शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा भी छोड़ दिया और 2004 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा। मनमोहन सिंह की अगुवाई में यूपीए सरकार में वे पूरे 10 साल तक मंत्री रहे। 2004 में महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव भी उन्होंने कांग्रेस के साथ मिल कर लड़ा। एनसीपी 71 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस 69 सीट के साथ दूसरे नंबर पर रही।

2019 चुनाव में बहुमत तो बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को मिला, लेकिन शिवसेना सीएम पद पर अड़ गई। तब एनसीपी-शिवसेना-कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाई जो 2002 तक ही चली। शिंदे गुट के अलग होने से सरकार गिर गई। विधानसभा में एनसीपी के अब भी 53 विधायक हैं और वह मुख्य विपक्षी पार्टी है।

अमित कुमार मंडल
अमित कुमार मंडलauthor

अमित मंडल टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में न्यूज डेस्क पर Assistant Editor के रूप में काम कर रहे हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल—तीनों माध्यमों में कुल मिलाकर 15 सालों से अधिक का अनुभव उन्हें खबरों को देखने की व्यापक दृष्टि देता है। ब्रेकिंग न्यूज, लाइव ब्लॉग, स्पेशल स्टोरीज और एक्सप्लेनेर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। एंगल चुनने की कला, खबरों की गति को समझना और समय पर सही जानकारी पहुंचाना—ये उनकी सबसे बड़ी खूबियां हैं। अमित अपने करियर में करीब 20 हजार से अधिक न्यूज आर्टिकल, एनालिसिस और एक्सप्लेनर पब्लिश कर चुके हैं।

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