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6500 उड़ानें, ढाई लाख गोले और कारगिल के 5 'गेमचेंजर' हथियार, जिनके आगे पाकिस्तान ने टेके थे घुटने

Kargil Vijay Diwas: हर साल 26 जुलाई को भारत 'कारगिल विजय दिवस' मनाता है। 1999 में द्रास और कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर पाकिस्तान ने अवैध कब्जा कर लिया था। इस युद्ध में भारतीय थलसेना के अदम्य साहस के साथ-साथ बोफोर्स तोपों, बीएम-21 ग्रैड रॉकेट लॉन्चरों, इंसास राइफलों और वायुसेना के 'ऑपरेशन सफेद सागर' ने अहम भूमिका निभाई।

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25 दिनों में 18 गन बैरल घिसने की अनसुनी कहानी (फोटो:एआई इमेज)
Edited by: monu jha
Updated Jul 26, 2026, 04:00 IST
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Kargil Vijay Diwas: आज 26 जुलाई है। हर साल इसी दिन को पूरा देश 'कारगिल विजय दिवस' के रूप में मनाता है। यह वही ऐतिहासिक दिन है जब 1999 में भारतीय सेना के जांबाजों ने लद्दाख की बर्फीली और बेहद दुर्गम चोटियों पर तिरंगा फहराकर पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ दिया था।

मई 1999 में शुरू हुए इस युद्ध में पाकिस्तान की सेना और आतंकी ऊंचे पहाड़ों पर बने बंकरों में मजबूत स्थिति में बैठे थे, जबकि भारतीय सैनिक नीचे से ऊपर चढ़कर लड़ाई लड़ रहे थे। इस बेहद मुश्किल भू-भाग में भारत की जीत का रास्ता हमारे सैनिकों के अदम्य साहस और सेना के अचूक हथियारों ने बनाया था।

युद्ध का सबसे बड़ा 'गेम चेंजर'

कारगिल युद्ध में स्वीडन से खरीदी गई 155 एमएम वाली बोफोर्स FH-77B होवित्जर तोप ने अपनी ताकत का लोहा मनवाया। 42 किलोमीटर तक सटीक निशाना लगाने वाली इस तोप ने 'डायरेक्ट फायर' तकनीक का इस्तेमाल कर ऊंची चोटियों पर बैठे दुश्मनों के बंकरों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

युद्ध के दौरान स्थिति यह हो गई थी कि टाइगर हिल और तोलोलिंग को मुक्त कराने के लिए हर दिन औसतन 5,000 से ज्यादा गोले, मोर्टार और रॉकेट दागे (Kargil Vijay Diwas Weapons) जा रहे थे। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब लगातार और भीषण गोलाबारी के कारण महज 25 दिनों में ही 18 बोफोर्स तोपों की बैरल घिस गई थीं। इस तोप के खौफ ने पाकिस्तानी सैनिकों के हौसले पूरी तरह तोड़ दिए थे।

कारगिल विजय दिवस (File Photo: PTI)

कारगिल विजय दिवस (File Photo: PTI)

बीएम-21 ग्रैड रॉकेट लॉन्चर और 105mm फील्ड गन

बोफोर्स के साथ-साथ बीएम-21 ग्रैड (BM-21 Grad) मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर ने भी दुश्मनों के बीच भारी तबाही मचाई थी। यह एक बार में दर्जनों रॉकेट दुश्मन के इलाके में दागकर पूरे पहाड़ को थर्रा देता था। इसके अलावा भारत की स्वदेशी 105mm इंडियन फील्ड गन और 120mm हैवी मोर्टार ने पैदल सेना को वह सुरक्षा कवर दिया, जिसकी बदौलत हमारे सैनिक सीधी चढ़ाई चढ़ने में आसानी से सफल हुए।

इंसास राइफल और 84mm कार्ल गुस्ताव

आमने-सामने की लड़ाई में भारतीय सैनिकों के हाथों में उस समय नई-नई शामिल हुई इंसास (INSAS) 5.56mm राइफल और एसएलआर थीं। पहाड़ियों पर बने मजबूत कंक्रीट बंकरों को उड़ाने के लिए सैनिकों ने स्वीडिश 84mm कार्ल गुस्ताव रिकॉइललेस राइफल और हाथ के गोलों (Hand Grenades) का व्यापक उपयोग किया। इसी की बदौलत प्वाइंट 4875 और तोलोलिंग जैसी चोटियों पर कब्जा संभव हो पाया।

कारगिल युद्ध (File Photo: PTI)

कारगिल युद्ध (File Photo: PTI)

वायुसेना का 'ऑपरेशन सफेद सागर'

जब ऊंची चोटियों से आ रही गोलियों के कारण थलसेना को शुरुआती नुकसान हुआ, तब तत्कालीन अटल विहारी वाजपेयी सरकार ने भारतीय वायुसेना को मैदान में उतारा। वायुसेना ने 26 मई 1999 को 'ऑपरेशन सफेद सागर' शुरू किया। शुरुआत में मिग-21, मिग-23 और मिग-27 विमानों ने टोह ली और बमबारी की। हालांकि, कम हवा और ऊंची पहाड़ियों के कारण मिग विमानों को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

इसके बाद वायुसेना ने अपने सबसे शक्तिशाली फाइटर जेट मिराज-2000 (Mirage 2000) को आगे किया। मिराज-2000 में इजराइल से मंगाए गए लेजर गाइडेड बम (LGB) फिट किए गए। इन बमों ने मुश्कोह घाटी और मूनलाइट पिक पर बने पाकिस्तानी रसद डिपो और मुख्य कमान सेंटरों को पूरी तरह नष्ट कर दिया।

Kargil Yuddh (File Photo: PTI)

Kargil Yuddh (File Photo: PTI)

इजराइली नाइट-विजन और जीपीएस तकनीक

कारगिल में भारतीय जीत के पीछे उस गुप्त तकनीक का भी हाथ था जो युद्ध के दौरान भारत को इजराइल से मिली थी। इजराइल ने भारत को तत्काल प्रभाव से नाइट-विजन डिवाइसेज (NVD), लेजर पॉड्स और उच्च तकनीक वाले ड्रोन (UAV) मुहैया कराए। रात के घने अंधेरे में पहाड़ियों पर छिपे दुश्मनों को देखने और सटीक जीपीएस लोकेशन ट्रैकिंग ने भारत के पक्ष में पलड़ा झुका दिया।

60 दिनों से अधिक चले इस युद्ध में वायुसेना के 300 से अधिक लड़ाकू विमानों व हेलिकॉप्टरों ने 6,500 से ज्यादा उड़ानें भरीं। आखिरकार, भारतीय वीरों के शौर्य और हथियारों की अचूक मार के आगे 26 जुलाई 1999 को पाकिस्तान ने पूरी तरह समर्पण कर दिया और भारत ने अपनी सीमाओं पर पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया।

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