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Explained: जापान का 'यासुकुनी मंदिर' क्यों बना विवादों का केंद्र? WWII का वो कनेक्शन जिससे भड़क उठते हैं चीन और दक्षिण कोरिया

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की 81वीं वर्षगांठ पर सम्राट नारुहितो ने पछतावे की बात कही, जबकि प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने युद्ध के अपराधों पर चुप्पी साधे रखी। अब इस रवैये से चीन और दक्षिण कोरिया से तल्खियां बढ़ने का खतरा हो गया है। जानिए इस विरोधाभास और यासुकुनी मंदिर के विवाद की पूरी कहानी।

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क्या है यासुकुनी मंदिर का विवाद
Authored by: Nishant Tiwari
Updated Aug 16, 2026, 14:00 IST
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द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की 81वीं वर्षगांठ के अवसर पर टोक्यो में आयोजित श्रद्धांजलि सभा ने एक बार फिर उस ऐतिहासिक कड़वाहट को उजागर कर दिया है, जो दशकों से पूर्वी एशिया की राजनीति को प्रभावित करती रही है। इस वर्षगांठ पर दुनिया का ध्यान दो प्रमुख हस्तियों के संबोधनों पर केंद्रित रहा। एक तरफ जापान के सम्राट नारुहितो थे, तो दूसरी तरफ देश की पहली महिला प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची। दोनों ही शीर्ष हस्तियों ने युद्ध की विभीषिका को याद किया, लेकिन उनके लहजे और शब्दों का अंतर बहुत गहरा था। सम्राट के भाषण में अतीत का पश्चाताप झलका, जबकि प्रधानमंत्री के भाषण में जापान के युद्धकालीन अपराधों से एक सोची-समझी दूरी नजर आई। जानते हैं बयानों में अंतर के कारण क्या हैं।

सम्राट नारुहितो और पीएम ताकाइची: बयानों में अंतर क्यों?

जापान के संवैधानिक ढांचे में सम्राट और प्रधानमंत्री की भूमिकाएं अलग-अलग हैं, लेकिन इस अवसर पर उनके बयानों का विरोधाभास केवल संवैधानिक सीमा का मामला नहीं है। यह जापान के समाज और राजनीति में इतिहास को देखने के दो अलग-अलग दृष्टिकोणों को दर्शाता है। सम्राट नारुहितो ने निप्पॉन बुडोकन में अपने भाषण में "गहरे पश्चाताप" की भावना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अतीत पर विचार करते हुए और युद्ध के दर्द को याद रखते हुए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि युद्ध का विनाश फिर कभी न दोहराया जाए। बता दें कि जापानी राजपरिवार 1978 के बाद से यासुकुनी मंदिर से दूरी बनाए हुए है, जब वहां क्लास-ए युद्ध अपराधियों को स्थान दिया गया था।

वहीं पीएम ताकाइची ने हिरोशिमा, नागासाकी, ओकिनावा और विदेशों में मारे गए जापानी सैनिकों व नागरिकों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि "जापान ने युद्ध के बाद से लगातार वैश्विक शांति में योगदान दिया है," हालांकि, ताकाइची ने समारोह में अपने भाषण में एशिया में अपने देश के युद्ध के समय के अतीत का जिक्र नहीं किया और न ही उसके लिए अफसोस जताया। उन्होंने एशिया में जापान के ऐतिहासिक आक्रमणों, बंधुआ मजदूरी या महिलाओं के यौन उत्पीड़न का कोई जिक्र नहीं किया।

सम्राट नारुहितो और महारानी मासाको के पास से गुजरतीं पीएम ताकाइची (चित्र: Kyodo News via AP)

सम्राट नारुहितो और महारानी मासाको के पास से गुजरतीं पीएम ताकाइची (चित्र: Kyodo News via AP)

राजनीतिक ढाल के लिए इतिहास बदलने की कोशिश?

सनाए ताकाइची पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की राजनीतिक उत्तराधिकारी मानी जाती हैं। 2013 के बाद से, शिंजो आबे द्वारा तय किए गए ढर्रे पर चलते हुए, जापानी प्रधानमंत्रियों ने युद्ध के पीड़ितों से औपचारिक रूप से माफी मांगना बंद कर दिया है। ताकाइची का मानना है कि वे युद्ध के बाद की पीढ़ी से ताल्लुक रखती हैं, इसलिए उन पर अतीत की गलतियों की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। वे अतीत में स्कूली किताबों से युद्धकालीन अपराधों के संदर्भों को हटाने के अभियानों से जुड़ी रही हैं। उनके समर्थकों के लिए यह 'राष्ट्रीय गौरव' की रक्षा है, जबकि आलोचकों और पड़ोसी देशों के लिए यह इतिहास को बदलने या उस पर पर्दा डालने की कोशिश है।

यासुकुनी मंदिर पर पड़ोसी देशों का गुस्सा

टोक्यो स्थित यासुकुनी मंदिर में 24 लाख से अधिक युद्ध मृतकों की आत्माओं को पूजा जाता है। विवाद तब शुरू हुआ जब 1978 में द्वितीय विश्व युद्ध के 14 सजायाफ्ता क्लास-ए यानी मुख्य युद्ध अपराधियों को भी यहां दर्जा दिया गया। चीन और दक्षिण कोरिया के लिए जापानी नेताओं का इस मंदिर में जाना या चढ़ावा भेजना जापान के सैन्यवाद और युद्धकाल के अत्याचारों को स्वीकार न करने का प्रतीक है। इस बार भी रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी और अन्य कैबिनेट मंत्रियों के मंदिर जाने पर चीन और दक्षिण कोरिया ने कड़ा राजनयिक विरोध दर्ज कराया।

ताकाइची का मंदिर न जाना मजबूरी या शांति की पहल?

सनाए ताकाइची खुद एक कट्टर राष्ट्रवादी नेता मानी जाती हैं और अतीत में इस मंदिर के दर्शन करती रही हैं। ऐसे में इस बार उनके खुद मंदिर न जाकर केवल अपने प्रतिनिधि के जरिए चढ़ावा भेजने के फैसले को विश्लेषक दो अलग-अलग कोणों से देख रहे हैं।

चीन और दक्षिण कोरिया के साथ जापान के व्यापारिक और सुरक्षा संबंध बेहद नाजुक मोड़ पर हैं। हाल ही में ताइवान को लेकर ताकाइची के कड़े बयानों के बाद बीजिंग के साथ तनाव काफी बढ़ गया था। ऐसी स्थिति में अगर वे खुद यासुकुनी मंदिर जातीं, तो चीन और दक्षिण कोरिया के साथ राजनयिक संबंध पूरी तरह पटरी से उतर सकते थे। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग द्वारा शांतिपूर्ण और व्यावहारिक कूटनीति की पेशकश के बीच यह कदम एक तात्कालिक मजबूरी अधिक नजर आता है।

दूसरी तरफ आलोचक ये कह रहे हैं कि यदि यह कदम शांति की सच्ची पहल होता, तो ताकाइची अपने भाषण में एशिया के पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त करतीं। चूंकि उन्होंने अपने भाषण में ऐतिहासिक अपराधों पर चुप्पी साधे रखी और पार्टी फंड से मंदिर में चढ़ावा भी भिजवाया, इसलिए इसे दिल से की गई 'शांति की पहल' के बजाय एक सोची-समझी कूटनीतिक पैंतरेबाजी माना जा रहा है।

जापान के लिए इतिहास का यह पन्ना आज भी आधा खुला हुआ है, जहां एक तरफ शांतिप्रिय राष्ट्र की छवि है, तो दूसरी तरफ इतिहास के पन्नों से मुंह मोड़ने की राजनीतिक कोशिश।

जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी यासुकुनी मंदिर में  (चित्र: Kyodo News via AP)

जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी यासुकुनी मंदिर में (चित्र: Kyodo News via AP)

यासुकुनी मंदिर क्या है और यह क्यों विवादास्पद है?

यासुकुनी मंदिर कोई साधारण धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि पूर्वी एशिया, विशेषकर चीन और दक्षिण कोरिया के साथ जापान के संबंधों में सबसे तनावपूर्ण मुद्दों में से एक है। बता दें कि यासुकुनी मंदिर की स्थापना 1869 में हुई थी। यह मंदिर जापान के लिए लड़े और मारे गए लगभग 24 लाख से अधिक लोगों की याद में बनाया गया है। इसमें पेंच तब फंसा, जब 1978 में इस मंदिर में द्वितीय विश्व युद्ध के 14 शीर्ष जापानी युद्ध अपराधियों को गुप्त रूप से "शहीदों" के रूप में समाधिस्थ कर दिया गया। इनमें जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो भी शामिल थे, जिन्हें युद्ध के बाद 'टोक्यो ट्रिब्यूनल' द्वारा मौत की सजा सुनाई गई थी। चीन और दक्षिण कोरिया को ये बात नहीं सुहाती। जब भी कोई जापानी शीर्ष नेता इस मंदिर के दर्शन करता है या वहां चढ़ावा भिजवाता है, तो वे इसे जापान को युद्धकालीन अत्याचारों और सैन्यवाद को सही ठहराते हुए देखते हैं।

चीन और दक्षिण कोरिया की नाराजगी की असली वजह

द्वितीय विश्व युद्ध से पहले और युद्ध के दौरान जापानी साम्राज्य ने चीन पर आक्रमण किया और कोरियाई प्रायद्वीप पर क्रूर औपनिवेशिक शासन चलाया। इस दौरान लाखों लोगों की जान गई और भारी मानवाधिकार उल्लंघन हुए, जिनमें बंधुआ मजदूरी और 'कम्फर्ट विमेन' जैसे पहलू शामिल थे। चीन और दक्षिण कोरिया का कहना है कि जर्मनी ने द्वितीय विश्व युद्ध के अपने नाजी इतिहास पर जिस तरह सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और पश्चाताप किया, जापान ने वैसा कभी नहीं किया। यासुकुनी मंदिर के दौरे को वे जापान के 'इतिहास को नकारने' के रूप में देखते हैं।

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