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मंदिरों में चढ़ावा देने के बाद क्या उसे ट्रैक किया जा सकता है? समझिए पूरा सिस्टम

मंदिरों में अगर आप दान करते हैं तो उस दान को कैसे ट्रैक करें, कहां पता लगाएं कि दान सही जगह उपयोग हुआ है या नहीं? दान का सबसे बेस्ट तरीका क्या है? आइए जानते हैं।

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मंदिरों में दान कैसे होता है ट्रैक (AI Photo)
Curated by: Shishupal Kumar
Updated Jul 1, 2026, 10:17 IST
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भारत जैसे विशाल देश में, साल भर धार्मिक यात्राएं चलती रहती हैं, लाखों लोग हर साल विभिन्न मंदिरों और धार्मिक स्थानों पर तीर्थयात्रा के लिए जाते हैं, अपने इष्ट देव का दर्शन करते हैं। इस दौरान भारतीय तीर्थयात्री जमकर दान भी करते हैं। मंदिरों के निर्माण हेतु, भंडारे हेतु, शिक्षा हेतु, दान पात्र में आदि। एक अनुमान अगर रखें तो हर साल मंदिरों में अरबों रुपये चढ़ावे के रूप में आते हैं, सिर्फ तिरुपति बालाजी मंदिर की ही वार्षिक आय 4,700 करोड़ से 5,400 करोड़ रुपये है। आज जब से अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का खुलासा हुआ है और लोग पकड़े गए हैं तब से इन चढ़ावों को लेकर कई सवाल होने लगे हैं। जिसमें से एक ये है कि आखिर चंदे की ट्रैकिंग कैसे हो, कैसे पता चलेगा कि जो दान, भक्तों ने मंदिरों में दिया है, वो सही जगह प्रयोग हुआ है।

इस सवाल का जवाब देखने में सीधा लगता है क्योंकि देश के ज्यादातर बड़े मंदिर अपने आय और व्यय का हिसाब हर साल देते हैं, हर साल ऑडिट होता है, लेकिन छोटे मंदिर ऐसा नहीं करते। चंदे में हेरफेर की गुंजाइश दान पात्र वाले में रहता है, क्योंकि वही एक दान का रास्ता ऐसा है, जिसका रिकॉर्ड बाद में तैयार होता है। राम मंदिर में भी इसी के पैसे में हेरफेर हुआ है। इसके अलावा बाकी जो सिस्टम है, जैसे- ऑनलाइन दान, चंदे की रशीद प्राप्ति... इसमें हेरफेर की गुंजाइश कम रहती है।

देश के बड़े मंदिरों में दान के हिसाब का हाल?

तिरुपति बालाजी मंदिर दान का हिसाब कैसे देता है?

तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD), जो विश्व प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर का प्रबंधन करता है, अपने दान और वित्तीय व्यवस्था के प्रबंधन में पारदर्शिता और आधुनिक तकनीक का एक बेहतरीन उदाहरण है। हर साल करोड़ों रुपये का चढ़ावा और टन सोना-चांदी प्राप्त करने वाले इस मंदिर की वित्तीय व्यवस्था बेहद कड़क और व्यवस्थित है। तिरुपति मंदिर के खातों और दान की पाई-पाई का ऑडिट कैग द्वारा किया जाता है। हर दिन मंदिर के कपाट बंद होने के बाद, TTD आधिकारिक तौर पर घोषणा करता है कि पिछले 24 घंटों में हुंडी से कितनी नकदी इकट्ठा हुई और कितने श्रद्धालुओं ने दर्शन किए। यह जानकारी मीडिया, टीटीडी की वेबसाइट और उनके आधिकारिक टीवी चैनल पर तुरंत प्रसारित की जाती है। TTD नियमित रूप से 'श्वेत पत्र' जारी करके देश को बताता है कि मंदिर के पास विभिन्न सरकारी और राष्ट्रीयकृत बैंकों में कुल कितना सोना और कितनी नकदी फिक्स डिपॉजिट के रूप में जमा है। मंदिर अपने सोने को केंद्र सरकार की 'गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम' के तहत जमा करता है, जिससे मिलने वाले ब्याज का हिसाब भी ऑडिट रिपोर्ट में दिया जाता है। ऑनलाइन दान करने वाले हर श्रद्धालु को तुरंत एक डिजिटल रसीद और ट्रैकिंग नंबर मिलता है। श्रद्धालु यह चुन सकते हैं कि उनका पैसा किस काम में जाएगा, जैसे- अन्नप्रसादम (मुफ्त भोजन), प्राणदान (मुफ्त चिकित्सा), या गो-संरक्षण (गौशाला)। TTD इन सभी ट्रस्टों का अलग-अलग खाता रखता है और उनकी वेबसाइट पर इसके उपयोग की जानकारी उपलब्ध होती है।

तिरुपति मंदिर में दान कैसे करें?

तिरुपति मंदिर में दान कैसे करें?

महावीर मंदिर पटना चंदे का हिसाब कैसे देता है?

पटना का प्रसिद्ध महावीर मंदिर देश के उन चुनिंदा बड़े धार्मिक स्थलों में से एक है, जो अपने दान और चढ़ावे के पाई-पाई के हिसाब को बेहद पारदर्शी रखता है। बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड के तहत आने वाले इस मंदिर का प्रबंधन 'महावीर मंदिर न्यास समिति'द्वारा किया जाता है। मंदिर परिसर में लगे मुख्य नोटिस बोर्ड पर हर दिन यह जानकारी लिख दी जाती है कि पिछले दिन 'नैवेद्यम' (लड्डू का प्रसाद), दान पात्र और अन्य काउंटरों से कुल कितनी राशि प्राप्त हुई। मंदिर प्रशासन हर महीने अपनी आधिकारिक पत्रिका 'महावीर टाइम्स' प्रकाशित करता है। इस पत्रिका में मंदिर की मासिक आय और व्यय का पूरा ब्योरा छपा होता है, जिसे कोई भी आम श्रद्धालु देख और पढ़ सकता है। महावीर मंदिर की पारदर्शिता की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह चंदे के पैसे का उपयोग कहां कर रहा है, यह समाज को साफ-साफ दिखाई देता है। मंदिर न्यास द्वारा पटना और बिहार में कई बड़े सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल चलाए जा रहे हैं: महावीर कैंसर संस्थान, महावीर वात्सल्य अस्पताल, महावीर आरोग्य संस्थान, महावीर हार्ट हॉस्पिटल। मंदिर के खातों का ऑडिट न केवल ट्रस्ट के चार्टर्ड अकाउंटेंट करते हैं, बल्कि सरकारी ऑडिटर्स द्वारा भी इसकी गहन जांच की जाती है। हर साल मंदिर न्यास आगामी वित्तीय वर्ष का बजट तैयार करता है, जिसे धार्मिक न्यास बोर्ड और कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति से पास कराना अनिवार्य होता है।

स्वर्ण मंदिर-अमृतसर में दान का रिकॉर्ड

अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन 100,000 से अधिक आगंतुक आते हैं, जो इसे विश्व स्तर पर सबसे अधिक देखे जाने वाले आध्यात्मिक स्थलों में से एक बनाता है। यहां भी दान भरपूर आता है, पैसे से लेकर लंगर सेवा के लिए आनाज, घी, तेल आदि तक। यहां आने वाले चढ़ावे, ऑनलाइन दान और विदेशी फंड्स के प्रबंधन की जिम्मेदारी शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के पास होती है। दानपात्र को जब भी खोला जाता है, वह पूरी प्रक्रिया CCTV कैमरों की सीधी निगरानी में होती है। गिनती के समय एसजीपीसी के अधिकारियों के साथ-साथ बैंकों के अधिकृत प्रतिनिधि भी मौजूद रहते हैं। रोज की गिनती पूरी होने के बाद उस राशि को तुरंत एसजीपीसी के मुख्य खातों और बैंकों में जमा कर दिया जाता है। इसका दैनिक रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। श्रद्धालु ऑनलाइन पोर्टल के जरिए यह चुन सकते हैं कि उनका दान किस कार्य में इस्तेमाल होगा- जैसे लंगर सेवा, कड़ाह प्रसाद सेवा, इमारत का रखरखाव, या शिक्षा व चिकित्सा सेवा। स्वर्ण मंदिर में रोजाना 1 लाख से अधिक लोगों के लिए लंगर बनता है। यहां नकदी के साथ-साथ भारी मात्रा में राशन (आटा, दाल, घी, चीनी) भी दान में आता है। मंदिर के पास एक विशाल स्टोर (रसद विभाग) है, जहां आने वाली सामग्री का हिसाब रखने के लिए विशेष सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जाता है। किस दिन कितना राशन दान में आया और कितना लंगर में इस्तेमाल हुआ, इसका सटीक डिजिटल ब्योरा रखा जाता है। एसजीपीसी हर साल मार्च के महीने में अपना वार्षिक बजट सत्र आयोजित करती है, जिसे मीडिया के सामने लाइव या सार्वजनिक रूप से पेश किया जाता है। इस बजट में यह साफ-साफ बताया जाता है कि पिछले वर्ष कुल कितनी आय हुई और आगामी वर्ष में गुरुद्वारों के रखरखाव, लंगर, अस्पतालों और कॉलेजों पर कितना खर्च किया जाएगा।

स्वर्ण मंदिर में लंगर सेवा (फोटो-goldentempleamritsar.org)

स्वर्ण मंदिर में लंगर सेवा (फोटो-goldentempleamritsar.org)

कामाख्या मंदिर, असम में दान कैसे होता है ट्रैक?

असम के गुवाहाटी में स्थित कामाख्या मंदिर में हर साल 50 से 80 करोड़ का चढ़ावा आता है। यहां भी चढ़ावे को लेकर पारदर्शी तरीका अपनाया जाता है। फाउंडेशन में मिलने वाले प्रत्येक योगदान का उपयोग लक्ष्य आधारित सामाजिक कार्यों में किया जाता है। मंदिर की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार धनराशि को जमीनी स्तर की परियोजनाओं में लगाया जाता है और उनके परिणामों की नियमित निगरानी की जाती है। मां कामाख्या देवी चैरिटेबल सेवा फाउंडेशन भारत में ऑनलाइन दान के लिए सरल और सुरक्षित व्यवस्था उपलब्ध कराता है। मंदिर प्रबंधन समिति कहती है कि दान की वार्षिक रिपोर्ट दी जाती है। जमीनी स्तर पर किए गए कार्यों की फोटो और वीडियो शेयर किया जाता है। पात्र दानकर्ताओं को नियमों के अनुसार टैक्स लाभ संबंधी रसीद दी जाती है।

शिरडी साईं बाबा मंदिर में चढ़ावे का हिसाब

शिरडी का श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट (SSST) भारत के सबसे अमीर और सबसे बड़े धार्मिक ट्रस्टों में से एक है। शिरडी साईं बाबा मंदिर में आने वाले चढ़ावे, सोने-चांदी और गुप्त दान के प्रबंधन और उसके हिसाब-किताब के लिए एक साफ-सुथरा सिस्टम अपनाता है। यह ट्रस्ट बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट (1950) के तहत काम करता है और इसकी पूरी व्यवस्था बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति या सरकारी दिशा-निर्देशों की निगरानी में चलती है। हर दिन की गिनती पूरी होने के बाद, कुल प्राप्त नकदी और कीमती धातुओं का ब्योरा तुरंत रजिस्टर में दर्ज कर बैंक में जमा कराया जाता है और इसकी रिपोर्ट मीडिया व वेबसाइट के लिए जारी होती है। हर साल ट्रस्ट अपना वार्षिक बजट तैयार करता है, जिसे महाराष्ट्र सरकार और न्यास बोर्ड से मंजूरी मिलनी अनिवार्य होती है। इस बजट में यह साफ दर्ज होता है कि इस साल श्रद्धालुओं की सुविधाओं, मुफ्त भोजन और सामाजिक कार्यों पर कितना खर्च किया जाएगा। संस्थान अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर साल 2005 से लेकर अब तक का सभी हिसाब-किताब ऑनलाइन प्रकाशित किए हुए है। इसमें कुल आय, दान, और विभिन्न मदों में हुए खर्चों का पूरा ऑडिट विवरण रहता है। वेबसाइट की रिपोर्ट में स्पष्ट दिखाया जाता है कि दान का कितने प्रतिशत हिस्सा अस्पताल, मुफ्त भोजन और शिक्षा पर खर्च किया गया है।

शिरडी साईं बाबा मंदिर में चढ़ावे का हिसाब

शिरडी साईं बाबा मंदिर में चढ़ावे का हिसाब

बांके बिहारी मंदिर वृंदावन का दान कैसे ट्रैक होता है?

वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर में हर साल 20 से 25 करोड़ रुपये का दान आता है। जिसमें सबसे ज्यादा गुल्लक, फूल बंगला सेवा और सीधे दान से रकम आती है। यहां भी दान सही जगह खर्च हो, इसकी पारदर्शी तरीके से व्यवस्था की गई है। हर साल आय और व्यय की रिपोर्ट जारी होती है, ऑडिट होता है। मंदिर का यह चढ़ावा सीधे तौर पर बैंक में जमा कराया जाता है और इसका प्रबंधन हाई पावर कमेटी द्वारा किया जाता है। यहां दान के समय ये ध्यान रखें कि दान की रशिद लें या पैसे, दान पेटी में ही डालें। सेवादारों को न दें।

काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी

काशी विश्वनाथ मंदिर भी चंदे के मामले में बेदाग रहा है। यहां चढ़ावा ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीके से आता है, ऑनलाइन वाले में तो सीधे पारदर्शिता रहती ही हैं, ऑफलाइन में दान की रशीद भी मिलती है। दानपात्र की गिनती सफ्ताह में दो दिन मंगलवार और शुक्रवार को सरकारी अधिकारियों की निगरानी में किया जाता है।

कहां है सुधार की जरूरत?

ज्यादातर बड़े मंदिरों में पारदर्शिता है, लेकिन कुछ को छोड़कर बाकी में कुछ सुधार की जरूरत है। खासकर दानपेटी में डाले जाने वाले दान का। गड़बड़ी का चांस यहीं होता है, क्योंकि यहां कितना दान आया ये पता नहीं होता है और गिनती के समय इसी में हेरफेर की गुंजाइश रहती है। धार्मिक संस्थान ऑनलाइन दान को बढ़ावा दें। दान को अगर आप ऑनलाइन देते हैं, तो यह सबसे सुरक्षित तरीका है। साथ ही लगभग सभी बड़े मंदिर अपनी वेबसाइट पर डोनेशन के पेज पर यह कॉलम बनाए हुए है कि आप किस चीज के लिए दान देना चाहते हैं, मंदिर के लिए, पढ़ाई के लिए, खाने के लिए आदि। आप जहां दान करना चाहते हैं, वहीं करें जिसकी सीधे रसीद आपको ऑनलाइन ही मिल जाएगी। किसी भी मंदिर में सीधे सेवादारों को दान न दें, ये मंदिरों में भी आम तौर पर लिखा होता है।
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