अयोध्या राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद पूरे देश के मंदिरों में मिलने वाले दान की सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो गई है। हर साल देश के छोटे-बड़े मंदिरों में हजारों करोड़ रुपये नकद, सोना-चांदी, ज्वैलरी और अन्य महंगी वस्तुओं के रूप में चढ़ावा आता है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि आखिर इस चढ़ावे की गिनती कैसे होती है और इसे सुरक्षित रखने के लिए क्या व्यवस्थाएं अपनाई जाती हैं? आइए जानते हैं देश के छह प्रमुख मंदिरों की व्यवस्था और कथित चंदा चोरी जैसे विवाद से बचने के लिए क्या कुछ किया जाना चाहिए?
जानकारी के मुताबिक कथित चंदा चोरी करने वाले कर्मचारियों ने इसके लिए अनोखा तरीका ढूंढ़ निकाला था। नोट गिनने वाले कर्मचारी हर गड्डी में कुछ (तय) एक्स्ट्रा नोट रख देते थे। बैंक में जमा करने के लिए जाने से पहले गड्डियां गिनकर वाउचर बन जाता था। इसके बाद जब चंदे की रकम को बैंक में जमा करने के लिए जाते थे तो मंदिर से बैंक जाते समय हर गड्डी में रखे एक्स्ट्रा नोट निकालकर गड्डियां बैंक में जमा करवा देते थे। इस तरह से वाउचर और गड्डी की रकम एक ही होती थी और किसी को कथिति चंदा चोरी का शक भी नहीं होता था।
चंदा चोरी करने वालों पर बुलडोजर कार्रवाई हो
मंदिरों में चढ़ावे की गिनती के लिए बाहरी लोगों को रखने की वकालत हो रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश यूथ कांग्रेस के उपाध्यक्ष शरद शुक्ला का कहना है कि बाहरी लोग भी तो लालच में फंस सकते हैं। उनका कहना है कि राम मंदिर कथित चंदा चोरी मामले के आरोपियों के खिलाफ इतनी सख्त कार्रवाई हो कि आगे से मंदिर के किसी कोने में एक रुपया भी गिरा मिले तो आकर सीधे दानपात्र में डालें। इसके साथ ही उन्होंने कथित चंदा-चोरी मामले के आरोपियों के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई की भी मांग की है।
माता वैष्णो देवी मंदिर
चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है... माता का जिस-जिस को भी बुलावा आता है, वह भक्त दौड़ा चला जाता है। श्रद्धालु मंदिर में आते हैं तो दान-पुण्य भी करते हैं। यहां की पूरी व्यवस्था को माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड संभावता है, जो देश के सबसे संगठित मंदिर प्रशासन में गिना जाता है। यहां दानपात्रों से निकाली गई नकदी की गिनती आधुनिक मशीनों से की जाती है।
श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (SMVDSB) के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा कड़ी सुरक्षा और सीसीटीवी निगरानी में चढ़ावे की गिनती की जाती है। प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए रखने के लिए विशेष तकनीकी और प्रशासनिक उपाय अपनाए जाते हैं। यहां मंदिर परिसर और यात्रा मार्ग पर रखी दान पेटियों को तय समय पर खोला जाता है। चढ़ावे की गिनती में लगे कर्मचारियों को पारंपरिक वस्त्र पहनाए जाते हैं और उन्हें मोबाइल या पर्स जैसी निजी वस्तुएं अंदर ले जाने की अनुमति भी नहीं होती है। सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में पूरी प्रक्रिया होती है, ताकि सुरक्षा और पारदर्शिता बनी रहे।
भगवान के नाम आए चढ़ावे की गिनती कैसे होती है?
तिरुपति बालाजी मंदिर
तिरुपति बालाजी मंदिर देश के सबसे अमीर मंदिरों में शामिल है, जहां श्रद्धालु हर रोज करोड़ों रुपये के चढ़ावा चढ़ाते हैं। यहां श्रद्धालुओं से मिले चंदे की गिनती 'परकामणि' (Parakamani) नाम प्रक्रिया के जरिए होती है। इस पूरी प्रक्रिया की 'तिरुमला तिरुपति देवस्थानम' (TTD) के अधिकारी निगरानी करते हैं। इसके अलावा प्रक्रिया की 24 घंटे काम करने वाले AI-आधारित हाई-रिजॉल्यूशन CCTV कैमरों और मल्टी-लेयर सुरक्षा की कड़ी निगरानी भी होती है। TTD के स्थायी कर्मचारियों और पुजारियों की देखरेख में ही नकद दान, सिक्कों और सोने-चांदी के आभूषणों को अलग किया जाता है। कीमती वस्तुओं और नोटों की गिनती एक सख्त निगरानी वाले हॉल में की जाती है।तिरुपति बालाजी मंदिर का मॉडल तकनीक, मानवीय निगरानी और बैंकिंग सिस्टम का एक बेहतरीन मिश्रण है। हालांकि, इतनी बड़ी व्यवस्था में भी नियमित ऑडिट और बाहरी निगरानी की जरूरत बनी रहती है। ताकि किसी छिपी हुई खामी का कोई भी लाभ न उठा सके।
सिद्धिविनायक मंदिर (मुंबई)
मुंबई के मशहूर सिद्धिविनायक मंदिर में भी हर रोज हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं और चढ़ावा चढ़ाते हैं। यहां नकद दान के साथ ऑनलाइन भुगतान और डिजिटल डोनेशन को भी लगातार बढ़ावा दिया जाता है। मंदिर परिसर में कई जगहों पर डिजिटल भुगतान की सुविधा उपलब्ध है। चढ़ावे की गिनती में मंदिर के सुरक्षाकर्मी, बैंक अधिकारी, और ट्रस्ट के सदस्य शामिल होते हैं। यहां चढ़ावे की गिनती करने वाले कर्मचारियों को बिना जेब वाले कपड़े पहनने होते हैं। यहां तक कि गिनती वाले हॉल में मोबाइल फोन भी नहीं ले जाने दिया जाता है। हफ्ते में निर्धारित दिन दान पेटियों को मंदिर की चौथी मंजिल पर ले जाया जाता है। यहां नकद राशि की छंटनी में नोट गिनने वाली मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा विदेशी मुद्रा और चिल्लर को अलग गिना जाता है।
कई भक्त सोने-चांदी के आभूषण और सिक्के चढ़ाते हैं, उनकी गिनती अलग होती है। आभूषणों के मूल्यांकन के बाद इन्हें सार्वजनिक नीलामी के बाद ट्रस्ट की आय में जोड़ दिया जाता है। पूरी राशि का मिलान करने के बाद बैंककर्मी इसकी रसीद ट्रस्ट को सौंपते हैं। सिद्धिविनायक मंदिर के अकाउंट्स का नियमित रूप से ऑडिट भी किया जाता है। डिजिटल भुगतान नकदी की हैंडलिंग कम जरूर करता है, लेकिन जानकारों के अनुसार सिर्फ ऑनलाइन दान ही पर्याप्त नहीं है। खर्च और फंड के इस्तेमाल में पारदर्शिता भी उतनी ही अहम है।
शिरडी साईं बाबा मंदिर (महाराष्ट्र)
शिरडी साईं बाबा संस्थान में हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और उतनी ही मात्रा में नकद व आभूषण भी चढ़ावे के रूप में मिलते हैं। यहां दानपात्र खोलने, नकदी की गिनती और धनराशि बैंक में जमा करने की पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी की निगरानी में होती है। मंदिर परिसर में जगह-जगह दानपात्र रखे गए हैं। हफ्ते में दो बार, मंगलवार और शुक्रवार को ये सभी दानपात्र खोले जाते हैं। चढ़ावे की गिनती की प्रक्रिया के लिए एक स्पेशल हॉल बनाया गया है, जहां हर तरफ सीसीटीवी कैमरों की निगरानी रहती है। दान की गिनती के दौरान श्रद्धालुओं के साथ ही शिर्डी गांव के प्रतिनिधि, मंदिर के कर्मचारी और बैंक अधिकारियों सहित कुल 200 से ज्यादा लोग मौजूद रहते हैं।
मंदिर में चढ़ावा गिनती की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इस प्रक्रिया को सामूहिक रूप से संपन्न किया जाता है। यहां गिनती के लिए जाने वाले सभी लोगों को ट्रस्ट की तरफ से बिना कॉलर और बिना जेब का अद्धी कुर्ता और इलास्टिक लगा पैजामा पहनने के लिए दिया जाता है। बैंककर्मी एक दिन की गिनती में इकट्ठा की गई पूरी नकदी की रसीद बनाकर ट्रस्ट को सौंपते हैं और नकदी लेकर पूरी सुरक्षा के साथ बैंक लौट जाते हैं। यहां की मल्टी-लेयर निगरानी और डिजिटल रिकॉर्ड इस व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं।
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पद्मनाभस्वामी मंदिर (केरल)
पद्मनाभस्वामी मंदिर को देश का सबसे अमीर मंदिर भी कहा जाता है। यहां पर श्रद्धालुओं से मिले दान (कनिका) की गिनती सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त प्रशासनिक समिति, न्यायाधीशों और बैंक अधिकारियों की कड़ी निगरानी में होती है। दान पेटियों (हुंडियों) में श्रद्धालुओं द्वारा दान की गई नकदी और आभूषणों को पारदर्शी तरीके से अलग करके गिना जाता है। इसके बाद उनका रिकॉर्ड तैयार करके बैंक में जमा कर दिया जाता है। मंदिर को चंदे और दान के रूप में मिलने वाले सोने-चांदी और अन्य बहुमूल्य आभूषणों का अलग से रिकॉर्ड तैयार होता है और उन्हें सुरक्षित तिजोरियों में रखा जाता है।
गुरुवायूर देवस्वम (केरल)
गुरुवायूर दवस्वम (Guruvayur Devaswom) में दान पेटियों (हुंडी) की गिनती के साथ ही आय-व्यय का प्रबंधन भी पूरी पारदर्शिता से होता है। निर्धारित समय पर दान पेटियां खोली जाती हैं। गुरुवायूर देवस्वम में दान पेटियां प्रबंध समिति की देखरेख में खोली जाती हैं और चढ़ावे की गिनती होती है। इस गिनती प्रक्रिया को स्थानीय नेशनलाइज्ड बैंक (जैसे CSB या यूनियन बैंक) के कर्मचारी और अधिकारी मंदिर प्रशासन की देखरेख में शामिल होते हैं। नकद रुपयों के साथ ही चढ़ावे के रूप में आए सोने और चांदी का वजन कर उनकी शुद्धता की जांच होती है।
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इन मंदिरों से देश क्या सीख सकता है?
इन छह बड़े मंदिरों की व्यवस्थाओं का अध्ययन बताता है कि सिर्फ CCTV या करेंसी काउंटिंग मशीनें ही समाधान नहीं हो सकती हैं। सबसे प्रभावी मॉडल वही है जिसमें मल्टी-लेयर सुरक्षा, डिजिटल रिकॉर्ड, इंडिपेंडेंट ऑडिट, बैंकिंग सिस्टम, आभूषणों की वैज्ञानिक इन्वेंट्री, ट्रेन्ड कर्मचारी, नियमित सार्वजनिक वित्तीय रिपोर्टिंग और स्पष्ट जवाबदेही शामिल हो। अगर देश के सभी बड़े मंदिर इन मानकों को अपनाएं तो न सिर्फ चढ़ावे की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास भी और अधिक सुदृढ़ होगा कि भगवान के चरणों में अर्पित उनकी 'पाई-पाई' सही उद्देश्य के लिए ही खर्च हो रही है।
