हाल के दिनों में राम मंदिर एक बार लगातार चर्चा में बना हुआ है और उसका कारण है वहां के चढ़ावे में गबन को लेकर लगातार उठ रहे सवाल। इस मामले के तूल पकड़ने के साथ ही मंदिरों में चढ़ावे को लेकर लोगों के मन में संशय भी पैदा हुआ है। श्रद्धालुओं के मन में सवाल है कि एक आम आदमी जब किसी मंदिर की चौखट पर माथा टेकता है और अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा भगवान के चरणों में अर्पित करता है, तो कहीं इसका दुरुपयोग तो नहीं हो जाता। व्यक्ति इस विश्वास के साथ धन चढ़ाता है कि चढ़ाए गए धन का इस्तेमाल मंदिर के रख-रखाव, समाज कल्याण, भंडारे या दीन-दुखियों की सेवा में होगा, लेकिन जब उसी आस्था के पैसे में हेरफेर या 'चढ़ावा चोरी' की खबरें आती हैं, तो दिल टूट जाता है। ऐसे मे मन में एक सवाल आना लाजमी है- "आस्था अपनी जगह है, लेकिन हम अपना दान कहां और कैसे दें, ताकि उसका एक-एक पैसा सही काम में ही लगे?"
क्या हमें पंडा या पुजारी के हाथ में पैसा देना चाहिए? क्या मूर्ति के आगे नकद छोड़ देना ठीक है? या फिर दानपात्र, ऑनलाइन पोर्टल और रसीद कटवाना बेहतर विकल्प हैं? आइए, दान के हर माध्यम की बारीक कुंडली खंगालते हैं और जानते हैं कि सबसे पारदर्शी तरीका कौन सा है।
सबसे पहले: इन्हें पैसा देने की भूल कतई न करें
यदि आप चाहते हैं कि आपके चढ़ावे का शत-प्रतिशत सही इस्तेमाल हो, तो सबसे पहले अपनी इस सूची से दो पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह काट दीजिए। पहला, पंडे-पुजारियों को सीधे नकद देना और दूसरा, गर्भगृह में मूर्ति के ठीक सामने, चरणों में पैसा रखना।
देश के लगभग सभी बड़े और प्रतिष्ठित मंदिरों जैसे तिरुपति, वैष्णो देवी या शिरडी में बड़े-बड़े अक्षरों में बोर्ड लगाकर साफ-साफ लिखा होता है कि "पुजारियों को व्यक्तिगत रूप से दान न दें"। मूर्ति के सामने रखा गया पैसा अक्सर गर्भगृह के भीतर काम करने वाले निजी अमले की जेब में चला जाता है या उसकी गिनती का कोई पुख्ता रिकॉर्ड नहीं रख पाता। यह पैसा मंदिर के केंद्रीय कोष तक नहीं पहुंच पाता, जिससे समाज कल्याण के कार्य नहीं हो पाते। तो क्या करें?
तरीका नंबर 1: दानपात्र या दानपेटी
यह हर मंदिर में दिखने वाला सबसे आम और पुराना माध्यम है। जब आप अपनी जेब से पैसा निकालकर दानपेटी के छेद में डालते हैं, तो वह सीधे मंदिर के बॉक्स में बंद हो जाता है, जिसपर ताला बंद होता है।
मंदिर प्रशासन या बैंक अधिकारियों की एक पूरी कमेटी के सामने सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में इन पेटियों को एक निश्चित समय (जैसे साप्ताहिक या मासिक) पर खोला जाता है। इसके बाद रुपयों की गिनती होती है और उसे मंदिर ट्रस्ट के बैंक खाते में जमा किया जाता है।
इसका फायदा यह है कि ये पूरी तरह गुप्त दान होता है। आपको किसी कतार में नहीं लगना पड़ता और न ही कोई कागजी कार्रवाई करनी होती है लेकिन इसके यह माध्यम सबसे कम पारदर्शी है। क्यों? क्योंकि जब तक पैसा पेटी से निकलकर बैंक नहीं पहुंच जाता, तब तक बीच की कड़ियों में गड़बड़ी की गुंजाइश बनी रहती है। हालिया विवादों में यह बात सामने आई है कि दानपेटी खोलने के समय कई बार कैमरों को बंद किया गया या गिनती में हेरफेर की गई। इसी वजह से दानपात्र में बड़ी रकम डालने से बचने की कोशिश की जानी चाहिए क्योंकि आपको इस बात का कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता कि आपका पैसा वाकई जमा हुआ या नहीं।
तरीका नंबर 2: नकद या UPI देकर रसीद कटवाना
यह दानपात्र से कहीं बेहतर और सुरक्षित माध्यम माना जाता है, जो देश के हर मध्यम और बड़े मंदिर के प्रांगण में बने 'डोनेशन काउंटर' पर उपलब्ध होता है।
इसके लिए आप काउंटर पर जाते हैं, वहां तैनात क्लर्क को नकद राशि देते हैं या काउंटर पर लगे आधिकारिक QR कोड को स्कैन करके UPI के जरिए भुगतान करते हैं। इसके बदले में कंप्यूटर से बनी या हाथ से लिखी आधिकारिक रसीद आपको दी जाती है, जिस पर मंदिर ट्रस्ट की मुहर, तारीख और राशि साफ तौर पर अंकित होती है।
यह तरीका दानपात्र से कहीं अधिक पारदर्शी है। चूंकि रसीद कटती है, इसलिए मंदिर के खातों में इस पैसे की एंट्री होना अनिवार्य हो जाता है। शाम को काउंटर क्लर्क को रसीद बुक के हिसाब से नकद राशि सीधे ट्रेजरी में जमा करानी होती है। लेकिन इस तरीके का एक घाटा ये भी है कि त्योहारों या खास दिनों में काउंटरों पर लंबी कतारें होती हैं। कभी-कभी कुछ छोटे मंदिरों में फर्जी रसीद बुक के जरिए भी घोटाले की आशंका बनी रहती है, इसलिए हमेशा सुनिश्चित करें कि काउंटर आधिकारिक हो।
पटना के मशहूर महावीर मंदिर का ऑनलाइन डोनेशन पेज
तरीका नंबर 3: ऑनलाइन डोनेशन पोर्टल
डिजिटल इंडिया के इस दौर में अब लगभग सभी बड़े ज्योतिर्लिंगों, शक्तिपीठों और भव्य मंदिर ट्रस्टों ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट्स पर डिजिटल डोनेशन की सुविधा दे दी है। इसके लिए आपको मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट (जैसे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र या माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की वेबसाइट) पर जाना होता है। वहां 'Donate' या 'चढ़ावा' के विकल्प पर क्लिक करके नेट बैंकिंग, डेबिट/क्रेडिट कार्ड या सीधे UPI के जरिए आप घर बैठे पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं। भुगतान सफल होते ही आपकी रसीद (PDF फॉर्मेट में) तुरंत आपके ईमेल और मोबाइल पर आ जाती है।
यह आधुनिक युग का सबसे सुरक्षित और 100% पारदर्शी तरीका है। इसमें पैसा किसी भी इंसानी हाथ को छुए बिना सीधे आपके बैंक खाते से मंदिर ट्रस्ट के आधिकारिक और ऑडिटेड बैंक खाते में ट्रांसफर हो जाता है। इसमें चंदा चोरी या चढ़ावा गायब होने की गुंजाइश शून्य होती है। इसके डिजिटल फुटप्रिंट्स हमेशा मौजूद रहते हैं, जिसे कोई मिटा नहीं सकता।
काशी विश्वनाथ मंदिर के पोर्टल पर दान करने की व्यवस्था
लेकिन इस तरीके की कमी ये है कि बुजुर्गों या तकनीकी रूप से कम जागरूक ग्रामीण श्रद्धालुओं के लिए इसका उपयोग करना थोड़ा कठिन होता है। साथ ही इस तरीके में चूंकि सीधे जेब से पैसा नहीं जाता तो लोगों के मन में भाव की कमी दिखती है और इस कारण से वे इस तरीके से बचते भी दिखते हैं। इसके अलावा, इंटरनेट पर कई बार जालसाज असली मंदिर जैसी दिखने वाली फर्जी या क्लोन वेबसाइट बना लेते हैं, जिससे धोखाधड़ी का खतरा रहता है। इसलिए हमेशा डोनेशन देने से पहले वेबसाइट के यूआरएल (जैसे .org या .gov.in) और सुरक्षा सर्टिफिकेट (लॉक आइकन) की जांच अवश्य कर लेनी चाहिए।
तो सबसे पारदर्शी रास्ता कौन सा है?
यदि हम सुरक्षा, प्रामाणिकता और शुचिता के पैमाने पर इन सभी तरीकों को तौलें, तो 'ऑनलाइन डोनेशन' और 'आधिकारिक काउंटर से रसीद कटवाना' सबसे पारदर्शी और अचूक तरीके हैं। यदि आप मंदिर परिसर के भीतर हैं, तो दानपात्र में छोटे नोट डालना तो ठीक है, लेकिन बड़ी धनराशि हमेशा डोनेशन काउंटर पर जाकर ही दें और उसकी पक्की रसीद अपने पास रखें। वहीं, यदि आप घर बैठे विशेष पर्वों पर दान करना चाहते हैं, तो केवल और केवल आधिकारिक वेबसाइट का ही रुख करें। ईश्वर के लिए आपकी श्रद्धा की सुरक्षा करना भी आपकी ही जिम्मेदारी है। जब चंदा देने की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और रसीद युक्त होगी, तभी इन पावन केंद्रों को भी किसी भी तरह के वित्तीय विवादों और बदनामी से पूरी तरह मुक्त रख पाएंगे।
