Himanta Biswa Sarma: आज असम में भारतीय जनता पार्टी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के विधायक दल का नेता चुन लिया गया है, जिससे उनके लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। बीजेपी के आठ विधायकों ने सरमा के नाम का प्रस्ताव रखा। इसी के साथ हिमंत बिस्वा सरमा असम में इतिहास रचने जा रहे हैं। 2021 में मुख्यमंत्री बने सरमा लगातार दो कार्यकाल तक मुख्यमंत्री बनने वाले एकमात्र गैर-कांग्रेसी नेता बनकर इतिहास रचने जा रहे हैं। हिमंता खास तौर पर महिलाओं-बच्चियों के बीच लोकप्रिय रहे हैं। उन्हें स्नेह से यहां की लड़कियां 'मामा' कहकर बुलाती हैं। इसके पीछे की क्या कहानी है, आइए जानते हैं।
2015 के बाद राजनीतिक परिदृश्य बदल गया
2015 में कांग्रेस से हिमंता नाटकीय रूप से अलग होने ने असम के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया और एक कुशल रणनीतिकार के रूप में उनकी प्रतिष्ठा को और मजबूत किया। गठबंधन बनाने, दलबदल को संभालने और भाजपा की चुनावी मशीनरी को सुचारू रूप से चलाने में माहिर हैं। कुछ ही सप्ताह पहले असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोराह के भाजपा में दलबदल का उनका सुनियोजित प्रयास विपक्ष की कमजोरियों का फायदा उठाने में उनकी अचूक कुशलता का उदाहरण है।
हिमंता कैसे बने मामा?
सिर्फ रणनीति बनाने में ही नहीं, हिमंता लोक-लुभावन नीतियां बनाने और उन्हें लागू करने में उस्ताद हैं। उनकी बनाई योजनाएं इस कदर सफल रही हैं कि वह बच्चियों के मामा ही बन गए। असम में आज छोटे बच्चे हों या बुजुर्ग महिलाएं, सबके लिए हिमंत बिस्वा सरमा सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि 'मामा' हैं। इस 'मामा' ब्रैंडिंग के पीछे भी एक रणनीति छिपी है। हिमंता की इसी रणनीति का कमाल है कि महिलाओं का एक बहुत बड़ा और वफादार वोट बैंक उनके पीछे रहता है।
सीधे बहनों और भांजियों को मदद
उनकी 'अरुणोदयी 2.0' और अन्य कैश ट्रांसफर स्कीम से सीधे बहनों और भांजियों के बैंक खातों में पैसा पहुंचाया जाता है। इस जब चुनाव करीब आए, तो इन योजनाओं का बजट और दायरा दोनों बढ़ा दिए गए। इसने मास्टरस्ट्रोक का काम किया। दरअसल, कांग्रेस महंगाई को मुद्दा बनाती रही, लेकिन ग्रामीण महिलाओं के लिए 'मामा' की ओर से आई यह सीधी मदद महंगाई से लड़ने का एक बड़ा सहारा बन गई। उनकी इस एक योजना ने हिमंता को घर-घर का सदस्य बना दिया और वह 'मामा' नाम से लोकप्रिय हो गए। इस बार भी महिलाओं ने 'मामा' के नाम पर बीजेपी के पक्ष में जमकर वोटिंग की जिसका नतीजा लगातार तीसरी जीत के रूप में सामने आया है।
काम करने की शैली जबरदस्त
हिमंता के काम करने की शैली भी जबरदस्त है। वह खुद आधी रात को स्पॉट पर जाकर सरकारी प्रोजेक्ट्स का मुआयना करते हैं। इस प्रोएक्टिव गवर्नेंस की वजह से असम में सत्ता विरोधी लहर का असर नहीं दिखा। लोगों के बीच संदेश गया कि कि 'मामा' काम भी कर रहे हैं और उनके अधिकारों की रक्षा भी। कांग्रेस के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं था जो हिमंता की छवि का मुकाबला कर सके। कांग्रेस के कई नेता चुनाव से पहले छिटक गए, जो मैदान में थे मुकाबला नहीं कर पाए। तरुण गोगोई खास तौर पर हिमंता के निशाने पर रहे हैं, गोगोई ने इसका जवाब तो दिया, लेकिन हिमंता का तिलिस्म नहीं तोड़ पाए।
असम को शीर्ष पांच राज्यों में शामिल कराने का लक्ष्य
सरमा का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, असम को देश के शीर्ष पांच राज्यों में शामिल करना। राज्य ने वित्तीय स्थिति में सुधार और स्थिर विकास दिखाया है, हालांकि शीर्ष राज्यों की श्रेणी में आने से अभी भी काफी दूर है। भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में असम को पिछले पांच वर्षों में देश की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला राज्य बताया है। यह उस क्षेत्र के लिए एक अहम बदलाव है जिसे लंबे समय से औद्योगिक विविधता के बजाय संसाधन-निर्भर माना जाता रहा है। वित्त वर्ष 2020 और वित्त वर्ष 2025 के बीच, असम के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में लगभग 45% की वृद्धि हुई, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
चुनावी मैदान में डटे रहने में माहिर
हिमंता सरमा चुनावी मैदान में डटे रहने में माहिर हैं। उनके भाषणों में लोकलुभावन तत्परता और विकास के वादे का मिश्रण होता है, जिससे उनके समर्थकों को निरंतरता और स्थिरता का भरोसा मिलता है। फिर भी आलोचक चेतावनी देते हैं कि उनकी टकराव वाली शैली विभाजन को और गहरा कर सकती है। चुनाव से कुछ सप्ताह पहले, गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 26 फरवरी को अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ "घृणास्पद भाषण" और "सांप्रदायिक टिप्पणियों" के आरोप में कई जनहित याचिकाओं पर उन्हें नोटिस जारी किया था। इन सब विवादों के बीच मामा हिमंता लगातार अपने अंदाज में आगे बढ़ रहे हैं, और कांग्रेस के पास उन्हें रोकने का कोई तरीका नजर नहीं आता है।