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क्यों हर राष्ट्र नहीं बन पाता UN का मान्यता प्राप्त सदस्य? मोंटेवीडियो कन्वेंशन और वीटो में उलझा है पूरा गणित

संयुक्त राष्ट्र में सदस्यता प्राप्त करना किसी भी देश के लिए केवल कानूनी मान्यता का सवाल नहीं है, बल्कि यह बहुत हद तक वैश्विक राजनीति का खेल है। कौन देश किसके पक्ष में खड़ा है, किसके हित किसके साथ जुड़े हैं — ये बातें कहीं अधिक असर डालती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, भू-राजनीतिक रणनीतियां और वैश्विक सत्ता-संतुलन निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

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कैसे मिलती है नए देश को मान्यता (फोटो-UN)

कभी सोचा है किसी भी नए राष्ट्र को मान्यता कैसे मिलती है? ऐसा नहीं है कि आज कोई राष्ट्र बना, अमेरिका-भारत समेत कुछ देशों ने मान्यता दे दी और उसे मान्यता मिल गई। जब तक संयुक्त राष्ट्र संघ से किसी देश को मान्यता नहीं मिलती है, सही मायने में उस देश को पूरी दुनिया में स्वीकार नहीं किया जाता, उस नए राष्ट्र को काफी मुश्किलों को सामना करना पड़ता है। यूएन से मान्यता मिलना इतना आसान भी नहीं है। सबसे पहले मोंटेवीडियो कन्वेंशन को पूरा करना पड़ता है, इसके कई स्टेप हैं, जिसपर किसी भी नए देश को खरा उतरना पड़ता है, उसके बाद ये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के हाथ में जाता है, जहां पांच महाशक्तियां बैठी हैं, उन पांचों में से अगर किसी ने भी विरोध कर दिया, वीटो का प्रयोग कर लिया तो मान्यता नहीं मिलेगी। चाहे दर्जनों देशों ने नए राष्ट्र को मान्यता दे रखी हो, लेकिन एक अगर एक भी वीटो आ गया तो उसे UN से मान्यता नहीं मिलेगी, मतलब नए राष्ट्र को देश होने का दर्जा नहीं मिलेगा। यूएन की सदस्यता के मुख्य खिलाड़ी यही पांच देश हैं- जिनमें अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन शामिल हैं। ये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्य हैं। यूएन की सदस्यता हासिल करने का पूरा गणित मोंटेवीडियो कन्वेंशन और वीटो के खेल में उलझा हुआ है। आइए इसे समझते हैं...

क्या है UN का मोंटेवीडियो कन्वेंशन

हर देश संयुक्त राष्ट्र (UN) का मान्यता प्राप्त सदस्य क्यों नहीं बन पाता, इसका उत्तर सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कानून में नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक गहराई से जुड़ी राजनीति और कूटनीति में छिपा है। जब कोई क्षेत्र या समूह अपने को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करता है, तो वह अपने लिए एक स्वतंत्र पहचान, सरकार, सीमाएं और लोगों का दावा करता है। इस दावे को कानूनी रूप देने के लिए 1933 में मोंटेवीडियो कन्वेंशन में कुछ स्पष्ट मानदंड तय किए गए थे — जैसे कि स्थायी जनसंख्या, परिभाषित क्षेत्र, कार्यरत सरकार और अन्य देशों से संबंध बनाने की क्षमता। इन शर्तों को पूरा करने वाला कोई भी क्षेत्र, सैद्धांतिक रूप से, एक "राष्ट्र" बन सकता है। इन चार शर्तों को पूरा करके कोई भी राजनीतिक इकाई खुद को "राष्ट्र" घोषित कर सकती है — जैसे कि कोसोवो, फिलिस्तीन, या ताइवान। लेकिन ध्यान दीजिए — ये परिभाषा "देश के अस्तित्व" के लिए है, न कि UN सदस्यता के लिए।

मोंटेवीडियो कन्वेंशन ऑन द राइट्स एंड ड्यूटीज़ ऑफ स्टेट्स की शर्तें

  • स्थायी आबादी- एक राष्ट्र में एक स्थायी जनसंख्या होनी चाहिए, जो किसी विशेष क्षेत्र में स्थायी रूप से बसी हुई हो।
  • परिभाषित क्षेत्र- राष्ट्र के पास एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होना चाहिए, जिस पर उसका नियंत्रण हो।
  • सरकार- राष्ट्र के पास एक प्रभावी सरकार होनी चाहिए जो अपने क्षेत्र और जनसंख्या पर नियंत्रण रख सके।
  • अन्य राज्यों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता- राष्ट्र को अन्य राज्यों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने और अंतरराष्ट्रीय समझौतों में प्रवेश करने में सक्षम होना चाहिए।
  • राज्यत्व का घोषणात्मक सिद्धांत- कन्वेंशन यह भी कहता है कि एक देश का राजनीतिक अस्तित्व अन्य देशों की मान्यता से स्वतंत्र है, इसका मतलब है कि एक देश को अन्य देशों द्वारा मान्यता प्राप्त होने की आवश्यकता नहीं है ताकि वह एक देश के रूप में अस्तित्व में रहे।
  • सैन्य बल के उपयोग पर रोक- कन्वेंशन में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रों को सैन्य बल का उपयोग करके क्षेत्रीय अधिग्रहण या लाभ प्राप्त नहीं करने चाहिए।
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सुरक्षा परिषद के सदस्य मतदान करते हुए (फोटो- UN)

नए राष्ट्र को मान्यता देने में वीटो पावर का खेल

अब जब कोई भी नया राष्ट्र इन शर्तों को पूरा कर लेता तब आता है वीटो पावर का खेल। संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता सिर्फ इन मानदंडों पर निर्भर नहीं करती। इसके लिए उस राष्ट्र को पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की सिफारिश चाहिए होती है। यही वह जगह है जहां मामला सिर्फ कानून का नहीं रह जाता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और शक्ति-संतुलन का हो जाता है। सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य हैं — अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन — जिनके पास वीटो का विशेषाधिकार है। इसका मतलब यह है कि यदि इनमें से कोई भी देश किसी नए देश की सदस्यता पर आपत्ति जताए, तो बाकी दुनिया के समर्थन के बावजूद वह देश संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं बन सकता। उदाहरण के लिए बांग्लादेश के साथ ऐसा हो चुका है, जब चीन ने पाकिस्तान के कहने पर सालों तक यूएनएससी में मान्यता वाले प्रस्ताव पर वीटो लगाते रहा था। आज भी ताइवान एक देश के रूप में यूएन का सदस्य नहीं है, फिलिस्तीन को भी आजतक पूरी तरह से मान्यता नहीं मिली है।

कई देशों के खिलाफ वीटो का इस्तेमाल

सोवियत संघ / रूस ने पहले वर्षों में सबसे अधिक सदस्यता विरोधी वीटो डाले। लगभग 51 बार नए सदस्य के आवेदन को रोका गया, खास तौर पर 1946–1955 की अवधि में, जब पश्चिमी देश और सोवियत ब्लॉक एक दूसरे के खिलाफ राष्ट्रों को समर्थन या विरोध कर रहे थे।

देश कितनी बार वीटो का इस्तेमाल क्या प्रभाव पड़ा
सोवियत संघ / रूस लगभग 51 बार अनेक पूर्व यूरोपीय राष्ट्रों की सदस्यता रोकी
अमेरिका वियतनाम (6 बार), फिलिस्तीन (1 बार, 2024 में) वियतनाम की देर से सदस्यता; फिलिस्तीन पूर्ण सदस्य नहीं बना
चीन मंगोलिया, बांग्लादेश, नॉर्थ मैसेडोनिया ताइवान के समर्थन वाले राष्ट्रों को लक्ष्य बनाया, पाकिस्तान के कारण बांग्लादेश को

UN से नहीं मिलती मान्यता तो क्या नुकसान होता है?

किसी देश को संयुक्त राष्ट्र (UN) से मान्यता न मिलना सिर्फ एक औपचारिक या प्रतीकात्मक बात नहीं होती — इसका असर बहुत गहरा और बहुआयामी होता है। मान्यता न मिलने से उस देश की वैधता, अंतरराष्ट्रीय संपर्क, आर्थिक व्यवहार और राजनीतिक अस्तित्व पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जब UN किसी देश को सदस्यता नहीं देता, तो वह देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वैध राष्ट्र के रूप में नहीं माना जाता। यह स्थिति उस देश के लिए पहचान का संकट पैदा करती है। वह न तो संयुक्त राष्ट्र की महासभा में अपनी बात रख सकता है और न ही अंतरराष्ट्रीय विवादों में पक्षकार के रूप में शामिल हो सकता है। UN मान्यता न होने से अधिकांश देश ऐसे राष्ट्र से राजनयिक संबंध नहीं बनाते, क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत चलने के लिए बाध्य होते हैं। जिस देश को UN ने मान्यता नहीं दी होती, उसका पासपोर्ट कई देश स्वीकार नहीं करते। नतीजतन उसके नागरिकों को विदेश यात्रा, काम, पढ़ाई और चिकित्सा के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

  1. कोई दूतावास स्थापित नहीं कर पाते, वीजा प्रक्रिया बाधित रहती है।
  2. नागरिकों की आवाजाही और सुरक्षा का कोई तय प्रोटोकॉल नहीं होता।
  3. IMF, विश्व बैंक, WTO जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का सदस्य नहीं बन सकता।
  4. विदेशी निवेश आकर्षित नहीं कर पाता क्योंकि व्यापारिक संधियां मान्यता के आधार पर बनती हैं।
  5. अंतरराष्ट्रीय बाजारों और बैंकों से ऋण या सहायता नहीं ले पाता।
  6. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से सुरक्षा सहायता नहीं मांग सकता।
  7. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) या ICC में अपील नहीं कर सकता।
  8. अपने नागरिकों के लिए कानूनी रक्षा की मांग नहीं कर सकता।
  9. पेरिस जलवायु समझौते, NPT, UNESCO, WHO, UNHRC जैसी अंतरराष्ट्रीय संधियों और संस्थाओं में शामिल नहीं हो पाता।
  10. जिस राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिलती, उसका अस्तित्व हमेशा विवादित माना जाता है।
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14 अक्टूबर 1952 को 7वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा का उद्घाटन हुआ था (फोटो- UN)

UN से मान्यता मिल जाए, लेकिन कोई अन्य देश न मान्यता दे तो क्या?

यदि किसी देश को संयुक्त राष्ट्र (UN) से मान्यता मिल जाती है, लेकिन कुछ देश (या कई देश) उसे अलग से मान्यता नहीं देते, तो उस स्थिति में क्या होगा। इसका असर बहुत ज्यादा नहीं होता है, सिर्फ उस देश के साथ संबंध खराब रहता है, राजनयिक संबंध नहीं होते हैं, लेकिन यूएन का सारा लाभ वो ले सकता है, उसके कानूनी अस्तित्व पर असर नहीं पड़ता। UN की मान्यता के बावजूद, हर सदस्य देश को स्वतंत्र रूप से यह तय करने का अधिकार होता है कि वह किसी देश को द्विपक्षीय रूप से मान्यता देगा या नहीं। उदाहरण के तौर पर इजराइल को 1949 में संयुक्त राष्ट्र ने सदस्यता दी, लेकिन आज भी कई इस्लामी देशों जैसे सीरिया, ईरान, पाकिस्तान आदि ने उसे कभी द्विपक्षीय मान्यता नहीं दी। उत्तर और दक्षिण कोरिया दोनों UN सदस्य हैं, लेकिन एक-दूसरे की सरकार को वैध नहीं मानते।

Shishupal Kumar
शिशुपाल कुमारauthor

शिशुपाल कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क में कार्यरत एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें 13 वर्षों का अनुभव हासिल है। राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय और क्राइम रिपोर्टिंग में गहरी रुचि और मजबूत पकड़ के साथ वे समाचारों की बारीकियों को समझने और उन्हें प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। शिशुपाल ने अपने करियर की शुरुआत एक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के रूप में की, जहां उन्होंने प्रोडक्शन से लेकर ग्राउंड रिपोर्टिंग तक पत्रकारिता के कई महत्वपूर्ण पहलुओं में काम किया। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क दोनों स्तरों पर उनकी दक्षता है। अब तक शिशुपाल कुमार 15,000 से अधिक खबरें प्रकाशित कर चुके हैं। वह ब्रेकिंग न्यूज, रियल-टाइम कवरेज, डेटा-आधारित विश्लेषण और एक्सप्लेनर लिखने में खास महारत रखते हैं। उनकी स्टोरीज तथ्यों की सटीकता और सहज भाषा की वजह से पाठकों पर मजबूत प्रभाव छोड़ती हैं।

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