Gulzar Birthday: जन्‍मदिन पर पढ़ें गीतों के जादूगर गुलजार की कुछ बेहतरीन गजलें

Gulzar Birthday: गुलजार को बच्चपन से शेरो-शायरी का शौक था। अपने जीवन में गुलजार ने कुछ ऐसे खूबसूरत गजलों को लिखा है जो हर पिढ़ी का दिल छू लेते हैं। 

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Gulzar Birthday  |  तस्वीर साभार: Times of India
मुख्य बातें
  • 18 अगस्त 1936 में पाकिस्तान के दीना गांव में हुआ था गुलजार का जन्म।
  • मायानगरी मुंबई से गुलजार ने भरी थी अपने सपनों की उड़ान।
  • बच्चन से शेरो-शायरी का शौक रखते थे गुलजार। 

Gulzar Ki Gazal: सिनेमा जगत को अपने शब्दों से गुलजार करने वाले गुलजार साहब का आज जन्मदिन है। दुनिया के चुनिंदा नगीनों में उनका भी नाम शामिल है। अपनी जिंदगी में गुलजार साहब ने कुछ ऐसे खूबसूरत गीत, संवाद, कहानी और पटकथा लिखी हैं जो हर एक पीढ़ी का दिल छू लेती हैं। 18 अगस्त 1936 में पाकिस्तान के झेलम जिले के पास स्थित दीना गांव में जन्मे गुलजार को बचपन से शेरो-शायरी का शौक था। बहुत कम लोग ही जानते हैं कि गुलजार के बचपन का नाम संपूर्ण सिंह कालरा था।

विभाजन के दौरान सरहद पार करने के बाद किशोरावस्था से वह अपनी लेखनी में सुधार करते रहे। अमृतसर में बसने के बाद उन्होंने अपने सपनों की उड़ान मायानगरी मुंबई से भरी। जहां अपनी जीविका के लिए उन्होंने मैकेनिक की नौकरी भी की। विमल राय प्रोडक्शन में जगह मिलने के बाद उन्होंने भारतीय फिल्मों को अपने गानों से गुलजार कर दिया था। आज भी लोग गुलजार के अल्फाजों में अपनी कहानी ढूंढ लेते हैं। गुलजार के कलम से लिखे कुछ चुनिंदा गजल कभी भुलाए नहीं जा सकते हैं।

यूं भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता
कोई एहसास तो दरिया की अना का होता

काई सी जम गई है आंखों पर
सारा मंजर हरा सा रहता है

कांच के पीछे चांद भी था और कांच के ऊपर काई भी
तीनों थे हम वो भी थे और मैं भी था तन्हाई भी

हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते

कल का हर वाकिआ तुम्हारा था
आज की दास्तां हमारी है

आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई

वो उम्र कम कर रहा था मेरी
मैं साल अपने बढ़ा रहा था

तुम्हारी खुश्क सी आंखें भली नहीं लगतीं
वो सारी चीज़ें जो तुम को रुलाएं, भेजी हैं

आप के बाद हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुजारी है

जमीं सा दूसरा कोई सखी कहां होगा
जरा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है

खुली किताब के सफ्हे उलटते रहते हैं
हवा चले न चले दिन पलटते रहते है

आंखों से आंसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमां ये घर में आएं तो चुभता नहीं धुआं

वो उम्र कम कर रहा था मेरी
मैं साल अपने बढ़ा रहा था

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