Bihar Assembly Election: कौन कहता है कि आसमान में सुराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों...और बड़ी तबीयत से पत्थर उछाला है बिहार में प्रशांत किशोर ने। बिहार वोट डालने जा रहा है। चंद घंटों में पहले चरण के वोट डाले जाएंगे। हफ्ते दस दिन में परिणाम आएंगे जो बताएंगे कि बिहार में प्रशांत किशोर और जन सुराज का राजनीतिक अंजाम क्या हुआ। जनता ने प्रशांत किशोर को सुना तो बहुत लेकिन क्या उनका कहा माना भी या नहीं? ये सब साफ हो जाएगा लेकिन अब जब चुनाव प्रचार थम चुके हैं। बिहार वोट करने को तैयार है। प्रशांत किशोर के इस राजनीतिक प्रयोग को ठीक से देख लेना ज़रूरी है।
प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार रहे हैं उससे पहले UN में नौकरी कर चुके हैं। प्रतिभाशाली हैं और देश-दुनिया में उनकी पॉपुलारिटी ठीक ठाक रही है। नीतीश कुमार ने उन्हें अपनी पार्टी का उपाध्यक्ष भी बनाया था। लेकिन इस बार परीक्षा रणनीतिकार प्रशांत किशोर की नहीं राजनेता प्रशांत किशोर की है। तो यह सफर बिहार के चंपारण से शुरू हुआ। महात्मा गांधी के सिद्धांतों को जन सुराज ने अपना वैचारिक आधार बनाया। इसके बाद प्रशांत किशोर पदयात्रा पर निकले।
पदयात्रा जो है बड़ी चमत्कारी चीज़ है। भारत में इसका आध्यात्मिक, राजनीतिक दोनों महत्व है। बुद्ध से लेकर गांधी तक को पदयात्राओं ने निखारा, सिखाया और संवारा। महात्मा गांधी की पदयात्राएं ऐताहिसक रही हैं। भारत में राजनीतिक और सामाजिक तौर पर जागृति के लिए पदयात्राओं को गांधी ने बड़ा टूल बनाया। बाद में गांधी तो चले गए रह गए उनके चेले, उनकी टोपी और गांधी के रास्ते पर चलने का दावा करते नेता। अन्ना नहीं आंधी है देश का दूसरा गांधी है ये नारा इसी दिल्ली शहर में गूंजा था। इसके बाद अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक उदय हुआ। लेकिन आम आदमी पार्टी को भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे आंदोलन का फायदा मिला। उस गुस्से का फायदा मिला।
बिहार में प्रशांत किशोर बार बार यह कहते रहे कि आंदोलनों में उनका विश्वास नहीं है। वो संवाद के ज़रिए समाज़ को समझने और उसे विकल्प देने की यात्रा पर उतरे। प्रशांत किशोर ने मैराथन यात्रा की। गांव गांव तक गए। उनकी मेहनत की तारीफ विपक्षी भी करते हैं। लंबे वक्त तक प्रशांत किशोर की यह यात्रा मीडिया की सुर्खियों से दूर रही।
मीडिया ने प्रशांत किशोर को याद भी किया तो लोकसभा चुनावों के वक्त। लेकिन मीडिया पदयात्रा कर रहे प्रशांत किशोर को नहीं चुनावी रणनीतिकार पीके को ढूंढ रही थी। इसके बावजूद प्रशांत किशोर की यात्रा जारी रही। गांधी जयंती के ही दिन उन्होंने जन सुराज नाम से राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा कर दी। बिहार में अकेले चुनाव लड़ने का बिगूल फूंक दिया और 243 उम्मीदवार उतार दिए। ये अलग बात है कि इसमें से आधा दर्जन उम्मीदवार चुनाव से पहले ही पलट चुके हैं। जिस पर पीके और बीजेपी में आरोप-प्रत्यारोप भी हुए। बहरहाल बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर ने असल में सुर्खियां बंटोरी अपने खुलासों से।
प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रशांत किशोर कभी सम्राट चौधरी, कभी दिलीप जायसवाल कभी मंगल पांडे तो कभी अशोक चौधरी जैसे बड़े नेताओं की पोल पट्टी खोलने लगे। उन पर आरोप लगाने लगे। इसके बाद अचानक से प्रशांत किशोर बिहार में एक राजनीतिक ताकत के तौर पर देखे जाने लगे। हालांकि कई विशेषज्ञ ये भी कह रहे हैं कि पीके को अपने खुलासों का यह सिलसिला जारी रखना चाहिए था क्योंकि चुनावों की घोषणा के बाद से उनके खुलासे बंद हुए तो जन सुराज की होने वाली चर्चा भी कम हो गई।
वहीं टिकट बंटवारे में प्रशांत किशोर ने सामाजिक सहभागिता से लेकर सुचिता जैसे तमाम वादों को लगभग निभाया। लेकिन सवाल उनके उम्मीदवारों पर भी उठे। वहीं हाल ही में एक इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने ये भी कहा कि अगर उनकी पार्टी को इतनी सीटें आईं जो सरकार बनाने के लिए जरूरी हों तो उनके विधायक पहली फुर्सत में दूसरी पार्टियों में भाग जाएंगे। यानी प्रशांत किशोर को अपने उम्मीदवारों के चरित्र पर इतना भरोसा भी नहीं है। यहीं पर प्रशांत किशोर को एक बार अपनी पार्टी का लोगो देखना चाहिए जिसके बीचो बीच महात्मा गांधी की तस्वीर है। अगर प्रशांत किशोर एक राजनीतिक स्टार्ट अप सफल करना चाहते हैं तो इस मामले में वो खुद ही एक्सपर्ट हैं। उन्हें किसी की सलाह की ज़रूरत नहीं है। लेकिन अगर वो वाकई गांधी के रास्ते पर चल कर सामाजिक बदलाव को अपनी राजनीति का लक्ष्य बनाना चाहते हैं तो उन्हें अपने तरीकों में थोड़े बदलाव की जरूरत है।
प्रशांत किशोर जनता से मिल रहे हैं बात कर रहे हैं लेकिन उन्हें शामिल नहीं कर पा रहे हैं। गांधी ने चरखा कातने से लेकर सफाई तक को सामाजिक सहभागिता का हथियार बनाया। नमक बनाने से लेकर खादी से कपड़े बनाने तक में जनता शामिल थी। इस बहाने गांधी अपना संदेश लोगों तक और लोगों के ज़रिए दुनिया तक पहुंचाने में कामयाब हुए। प्रशांत किशोर ऐसा कुछ नहीं कर पाए जिससे जनता उनके इस संवाद का सक्रिय हिस्सा बन पाती। जनता ने उनकी बातों को सुना, सहमति में सर भी हिलाया। लेकिन इस आक्रोश को शांत करने के लिए सरकार के पास पैसे और योजनाएं हैं जिनके मार्फत वो जनता को कुछ देती है।
विपक्ष हर घर सरकारी नौकरी जैसे सपने बेच रहा है। प्रशांत किशोर इस मामले में पिछड़ रहे हैं। क्योंकि अगर उन्हें अपने संभावित विधायकों की नैतिकता पर ही भरोसा नहीं है जिन्हें उन्होंने पूरी प्रक्रिया के बाद चुना है तो जनता के नैतिक बल पर उन्हें भरोसा होगा ये सोचना ही बेमानी है। ऐसे में प्रशांत किशोर को तय करना होगा कि उनकी राजनीतिक विचारधारा क्या है और उन्हें उस पर कितना भरोसा है। इन सबके बावजूद बिहार जैसी मुश्किल राजनीतिक ज़मीन पर प्रशांत किशोर ने अपने दम पर एक राजनीतिक मोर्चा तैयार तो कर ही दिया है।
बिहार की जनता के पास विकल्प नहीं है ये अब कोई नहीं कह सकता। पीके ने पत्थर तो ज़रूर पूरी तबीयत से उछाल दिया है देखना होगा कि आसमान में सुराख़ हो पाता है या नहीं..लेकिन इस राजनीतिक प्रयोग को राजनीति का हर छात्र बहुत चाव से देख रहा है। लेकिन फर्क इससे पड़ेगा कि बिहार की जनता प्रशांत किशोर और जन सुराज को विकल्प मानती है या नहीं।
