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Gaura Bauram Chunav 2025: आपस में फाइट करेगी VIP-RJD, BJP उम्मीदवार सुजीत सिंह के लिए रास्ता साफ! समझें गौरा बौराम सीट का समीकरण

गौरा बौराम में दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है। वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी इस सीट से चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन आखिरी वक्त में उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया और अपने भाई संतोष सहनी का नामांकन कराया। हालांकि, आरजेडी भी यहां से चुनाव मैदान में हैं। वहीं, भाजपा ने वर्तमान विधायक स्वर्णा सिंह के पति सुजीत कुमार सिंह को मैदान में उतारा है। आइये जानते हैं इस बार सीट का चुनावी समीकरण क्या है?

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गौरा बौराम विधानसभा सीट चुनाव

Gaura Bauram Assembly Election 2025: दरभंगा जिले का गौरा बौराम विधानसभा बिहार की राजनीति में एक अहम स्थान रखता है। यह विधानसभा क्षेत्र 2008 के परिसीमन आयोग की सिफारिश पर अस्तित्व में आया और तब से अब तक तीन चुनाव देख चुका है। जिले के 10 निर्वाचन क्षेत्रों में प्रथम चरण में 6 नवंबर को वोट डाले जायेंगे और 14 नवंबर को परिणाम आएंगे। इन सीटों में कुशेश्वर स्थान, गौराबौराम, बेनीपुर, अलीनगर, दरभंगा ग्रामीण, दरभंगा, हायाघाट , केवटी, जाले और बहादुरपुर शामिल हैं। इस बार गौरा बौराम विधानसभा सीट पर आरजेडी और वीआईपी पार्टी के बीच खींचातानी रही है। इस बार मुकेश सहनी के छोटे भाई संतोष सहनी वीआईपी से प्रत्याशी हैं तो आरजेडी भी यहां से चुनाव लड़ रही है, जिनका सीधा मुकाबला एनडीए की ओर से BJP की सीटिंग विधायक स्वर्णा सिंह के पति सुजीत कुमार सिंह से है।

गौरा बौराम में दिलचस्प मुकाबले के आसार

गौरा बौराम में दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है। वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी इस सीट से चुनाव लड़ रहे थे लेकिन आखिरी वक्त में उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया। भाजपा ने वर्तमान विधायक स्वर्णा सिंह के पति सुजीत कुमार सिंह को मैदान में उतारा है। सुजीत पूर्व आईआरएस हैं जिन्हें आयकर विभाग में चीफ कमिश्नर के पद पर पदोन्नत किया गया था। लेकिन उन्होंने वीआरएस ले लिया और भाजपा में शामिल हो गए। मतदाताओं के बीच उनकी अच्छी छवि है कि उन्होंने लोगों की सेवा के लिए इतना बड़ा पद त्याग दिया।

विपक्ष की ओर से महागठबंधन के दो उम्मीदवार हैं। राजद से अफजल अली लालटेन चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन महागठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार संतोष सहनी (वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी के छोटे भाई) हैं जिनका चुनाव चिह्न नाव है। तेजस्वी यादव 30 अक्टूबर को मुकेश सहनी के साथ गौरा बौराम आए और उन्हें आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया। इससे यादव और मुस्लिम मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। अफजल का एक मजबूत आधार वोट है फिलहाल वे जमीनी स्तर पर मजबूत दिख रहे हैं और साहनी पीछे हैं क्योंकि अब मुकाबला सुजीत सिंह और अफजल अली के बीच हो गया है। इससे हिंदू वोटरों का भाजपा के सुजीत कुमार सिंह के पक्ष में एकजुट होना तकरीबन तय है।

आपस में उलझी आरजेडी और वीआईपी

दरअसल, दरभंगा की गौरा बौराम विधानसभा सीट पर शुरू से ही महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर गतिरोध बना हुआ था। शुरू में लालू यादव ने यहां से अफजल अली खां को राजद का सिंबल दे दिया था। उन्होंने राजद उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल भी कर दिया था। इसी बीच लंबी जद्दोजहद के बाद नामांकन के आखिरी दिन गौरा बौराम सीट VIP के खाते में चली गयी। VIP के अध्यक्ष मुकेश सहनी जातीय वोटरों के आधार पर यह सीट अपने लिए सुरक्षित मानते थे। यहां से राजद उम्मीदवार नामांकन कर चुका था। फिर मुकेश सहनी ने जिद कर अपने लिए यह सीट राजद से मांग ली। फिर आखिरी लम्हों में पलट गये। उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया और अपने छोटे भाई संतोष सहनी यहां से VIP का उम्मीदवार बना दिया। लिहाजा, इस बार एनडीए समर्थित सुजीत कुमार के लिए चुनावी मुकाबला और आसान हो गया है।

BJP कैंडिडेट सुजीत कुमार की पत्नी सीटिंग एमएलए

पिछले चुनावी रुझानों के अनुसार भाजपा यहां मजबूत स्थिति में है। स्वर्णा सिंह के भाजपा में शामिल होने के बाद पार्टी को अतिरिक्त बढ़त मिली है। वहीं आरजेडी मुस्लिम-यादव समीकरण पर भरोसा करती है, लेकिन राह आसान नहीं है। जनता के बीच बाढ़, रोजगार और पलायन सबसे बड़े मुद्दे हैं। ग्रामीण मतदाता भाजपा को एक स्थिर विकल्प मानते हुए उसकी ओर झुकते नजर आ रहे हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो 2025 के विधानसभा चुनाव में गौरा बौराम सीट पर भाजपा का पलड़ा भारी दिख रहा है।

जन संपर्क के दौरान सुजीत कुमार सिंह

जन संपर्क के दौरान सुजीत कुमार सिंह

कौन हैं सुजीत कुमार सिंह

सुजीत कुमार शिक्षित उम्मीदवार की श्रेणी में आगे हैं। उन्होंने सैनिक स्कूल तिलैया से स्कूली शिक्षा प्राप्त की और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद जे.एन.यू. नई दिल्ली से राजनीति शास्त्र में एम.ए. की डिग्री हासिल की। बाद उन्होंने सिविल सर्विसेज परीक्षा में सफल होकर भारतीय राजस्व सेवा (IRS) में सेवा दी और राजनीति की दुनिया में कदम रखा है। एक शिक्षित उम्मीद होने और राजनीतिक पृष्ठभूमि होने के नाते युवाओं सहित अन्य वर्गों का खास समर्थन मिल रहा है। भाजपा का कोर वोट बैंक भी उनके साथ है। लिहाजा अन्य प्रत्याशियों के मुकाबले अभी से बढ़त बनाते दिख रहे हैं।

गौरा बौराम की भौगोलिक पृष्ठभूमि

इस विधानसभा में गौरा बौराम और किरातपुर प्रखंडों के साथ-साथ बीरौल प्रखंड के 12 ग्राम पंचायत शामिल हैं। यह क्षेत्र पूरी तरह ग्रामीण और कृषि प्रधान है। पास से बहने वाली कमला नदी खेती को सहारा देती है, लेकिन हर साल की मौसमी बाढ़ यहां की खेती और विकास दोनों को प्रभावित करती है। औद्योगिक इकाइयों की अनुपस्थिति के कारण इसे कम औद्योगीकृत क्षेत्र माना जाता है, जिससे पलायन की समस्या भी बढ़ी हुई है।

गौरा बौराम का चुनावी इतिहास

इस सीट के राजनीतिक इतिहास पर अगर हम नजर डालें तो 2010 और 2015 में यहां जेडीयू ने जीत हासिल की थी। इसके बाद 2020 के चुनाव में वीआईपी प्रत्याशी स्वर्णा सिंह ने आरजेडी के अफजल अली खान को हराकर सीट अपने नाम की। हालांकि, 2022 में स्वर्णा सिंह ने भाजपा का दामन थाम लिया, जिसे उनकी पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए स्वाभाविक कदम माना गया। लोकसभा चुनावों में भाजपा इस क्षेत्र में लगातार बढ़त बनाए हुए है, जिससे आगामी विधानसभा चुनाव 2025 में पार्टी की स्थिति और मजबूत मानी जा रही है।

गौरा बौराम विधानसभा दरभंगा मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर और पटना से 158 किलोमीटर दूर स्थित है। आसपास के प्रमुख शहरों में झंझारपुर, सुपौल, सहरसा और रोसड़ा आते हैं। यहां रेलवे स्टेशन नहीं है और सबसे नजदीकी स्टेशन दरभंगा जंक्शन है।

गौरा बौराम विधानसभा में कितने मतदाता

चुनाव आयोग के 2024 के आंकड़ों के अनुसार यहां की कुल जनसंख्या 4,41,617 है। कुल मतदाता 2,61,037 हैं, जिनमें 1,36,597 पुरुष और 1,24,440 महिलाएं शामिल हैं।

Pushpendra kumar
पुष्पेंद्र कुमारauthor

पुष्पेंद्र कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में चीफ कॉपी एडिटर के रूप में सिटी डेस्क पर कार्यरत हैं। जर्नलिज्म में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद से वे पिछले 7 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में जुड़े हैं। इस दौरान उन्होंने 10,000 से अधिक खबरें लिखी हैं। पुष्पेंद्र हाइपर-लोकल मुद्दों, रेलवे, रोड, इंफ्रास्ट्रक्चर, डेवलपमेंट, कृषि और मौसम से जुड़ी खबरों पर गहरी पकड़ रखते हैं। शहर से लेकर गांव-देहात तक की संवेदनशीलताओं को समझते हुए वे लोकल खबरों को ऐसा रूप देते हैं जो न केवल तथ्यपूर्ण होता है, बल्कि पाठकों से भावनात्मक रूप से भी जुड़ता है।

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