राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) द्वारा UGC NET परीक्षा के तीन प्रमुख विषयों— सोशियोलॉजी, इंग्लिश और कॉमर्स का पेपर रद्द कर दोबारा परीक्षा कराने के फैसला लिया गया था। एटीए के इस फैसल ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। NTA ने इन विषयों की परीक्षा में मिली कमियां और अनियमितताएं के बाद यह कदम उठाया। लेकिन इस निर्णय के सामने आते ही छात्रों और शिक्षक संगठनों में भारी आक्रोश देखने को मिला। अभ्यार्थियों का इस मामले को लेकर तर्क है कि एजेंसी की नाकामी और लापरवाही का खामियाजा उन ईमानदार छात्रों को क्यों भुगतना पड़ रहा है, जिन्होंने परीक्षा के लिए महीनों कड़ी मेहनत की थी।
री-एग्जाम के फैसले से क्यों भड़के छात्र?
NTA का कहना है कि तीन विषयों के प्रश्नपत्रों में कुछ तकनीकी खामियां और पिछले वर्षों के प्रश्नों का अत्यधिक दोहराव पाया गया, जिसके चलते एजेंसी द्वारा पारदर्शिता बनाए रखने के लिए दोबारा परीक्षा की जरूरत को दर्शाया। इसे देखते हुए दोबारा परीक्षा लेने का फैसला लिया। लेकिन एनटीए क इस फैसले पर अभ्यर्थियों में आक्रोश देखने को मिल रहा है। अभ्यर्थियों का कहना है कि परीक्षा की तैयारी में समय और मेहनत दोनों लगती है। दोबारा परीक्षा के आयोजन से छात्रो की न केवल मेहनत और समय बर्बाद हुआ है बल्कि उनकी आगे की योजनाएं प्रभावित हो रही है।
परीक्षा की घोषणा के बाद से ही छात्र लगातार अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। बार-बार परीक्षा रद्द होने या दोबारा कराए जाने से उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। छात्रों का कहना है कि जब प्रश्न पत्र तैयार करने और जांचने की जिम्मेदारी NTA और उसके विषय विशेषज्ञों की है, तो गलती सामने आने पर पूरी व्यवस्था के बजाय सिर्फ एजेंसी के जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
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'बिना फीस' के री-एग्जाम से संतुष्ट नहीं अभ्यर्थी
बता दें कि तीन विषयों की परीक्षाओं में आई गड़बड़ियों को देखते हुए एनटीए न पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि दोबारा होने वाली परीक्षाओं के लिए छात्रों को कोई अतिरिक्त शुल्क का भुगतान नहीं करना है। लेकिन इस आश्वासन के बाद भी छात्र संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं। इसके अलावा एनटीए ने बताया कि क्वालीफाइंग उम्मीदवारों की संख्या और विषयवार सीटों के आवंटन में आने वाली कटौती नहीं की जाएगी। अभ्यार्थियों का कहना है कि भले ही परीक्षा के लिए अतिरिक्त शुल्क की मांग नहीं की गई है, लेकिन परीक्षा केंद्रों तक आने-जाने का खर्च, दूर-दराज के इलाकों से आने वाले छात्रों के ठहरने की व्यवस्था और सबसे बढ़कर पढ़ाई के माहौल को दोबारा बनाना छात्रों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
जवाबदेही और सुधार की मांग तेज
विभिन्न छात्र यूनियनों और शिक्षक निकायों ने मांग की है कि NTA को अपनी आंतरिक व्यवस्था में पूरी तरह सुधार करना चाहिए। पेपर सेटिंग, मॉडरेशन और ट्रांसलेशन के दौरान जिन अधिकारियों या पैनल विशेषज्ञों के स्तर पर लापरवाही हुई है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाने की मांग की जा रही है। यदि री-एग्जाम कराया भी जा रहा है, तो उसकी तारीखों का समय पर ऐलान हो ताकि अगली पीएचडी एडमिशन या असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती की प्रक्रिया में देरी न हो।
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NTA के सामने साख बचाने की चुनौती
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी परीक्षाएं आयोजित कराने वाली एजेंसी NTA की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इतने बड़े पैमाने पर 24,700 से अधिक सवाल तैयार करने के बावजूद मुख्य विषयों के पेपर में गड़बड़ी का सामने आना एजेंसी की समीक्षा प्रक्रिया की खामियों को दर्शाता है। अब देखना यह होगा कि NTA छात्रों के इस विरोध के बीच पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे कायम करती है।
