Mumbai Vs Bombay Row: मुंबई में एक बार फिर 'बॉम्बे बनाम मुंबई' का विवाद जोर पकड़ गया है। यह विवाद तब भड़का जब केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने हाल ही में IIT बॉम्बे में आयोजित कार्यक्रम के दौरान अपने भाषण में संस्थान के नाम को लेकर टिप्पणी की। उनके इस बयान के बाद ठाकरे की शिवसेना (UBT) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) दोनों मैदान में उतर आए, जिसके चलते विवाद और उग्र हो गया।
चर्चगेट स्टेशन पर शिवसेना UBT का प्रदर्शन
डॉ. जितेंद्र सिंह के बयान के तुरंत बाद शिवसेना UBT के कार्यकर्ताओं ने चर्चगेट स्टेशन पर 'बॉम्बे बर्गर' नामक कैफ़े के बाहर विरोध प्रदर्शन शुरू किया। कार्यकर्ताओं ने कैफ़े के बोर्ड पर लिखे 'Bombay' शब्द पर कालिख पोत दी और जोरदार नारेबाजी की। उनका कहना था कि शहर का नाम मुंबई है और इसे किसी भी कीमत पर बॉम्बे कहकर नहीं पुकारा जाना चाहिए। शिवसेना UBT ने चेतावनी दी कि यदि कैफे का नाम तुरंत नहीं बदला गया, तो वे इसे 'अपने तरीके' से बदलवाने के लिए मजबूर होंगे। उनके अनुसार 'बॉम्बे' शब्द का इस्तेमाल मराठी अस्मिता के खिलाफ है, और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कैसे छिड़ा विवाद
मूल विवाद केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह की उस टिप्पणी से शुरू हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि संस्थान का नाम अब भी IIT बॉम्बे है, और इसी तरह IIT मद्रास भी अपने पुराने नाम के साथ कायम है। उनके इस बयान को क्षेत्रीय पहचान के संदर्भ में देखा गया, जिससे स्थानीय राजनीतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी।
राज ठाकरे की कड़ी प्रतिक्रिया
मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने केंद्रीय मंत्री की टिप्पणी की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह बयान दुर्भावनापूर्ण मानसिकता का प्रतीक है। राज ठाकरे ने अपनी एक्स पोस्ट में लिखा कि मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की पुरानी साजिश को मराठी नेताओं और जनता ने नाकाम किया था। उनके अनुसार ऐसे बयान मुंबई के नाम और उसकी पहचान से नफरत की मानसिकता को दर्शाते हैं। राज ठाकरे ने यह भी कहा कि मुंबई नाम से नफरत इसलिए है क्योंकि यह शहर देवी मुंबादेवी के नाम पर बसाया गया है और यह महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
विवाद क्यों बार-बार भड़कता है?
मुंबई का 1995 में आधिकारिक नाम बदलकर “बॉम्बे” से “मुंबई” किया गया था, लेकिन कई संस्थानों और पुराने ब्रांड्स में आज भी बॉम्बे नाम का इस्तेमाल होता है। राजनीति के स्तर पर यह अक्सर मराठी अस्मिता बनाम औपनिवेशिक पहचान का मुद्दा बन जाता है। केंद्रीय मंत्री की टिप्पणी ने इस लंबे समय से चल रहे विवाद को एक बार फिर सतह पर ला दिया है।
