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बारापुला एलिवेटेड रोड नहीं है दिल्ली की इस सड़क का नाम, जिससे आप अक्सर करते हैं ट्रैवल, जानें असली नाम

दिल्ली की व्यस्त सड़कों के बीच बारापुला एलिवेटेड रोड पूर्वी और दक्षिणी दिल्ली को जोड़ने वाला एक अहम सिग्नल-फ्री कॉरिडोर है, जिससे हजारों वाहन चालक रोजाना लाभ उठाते हैं। लगभग 400 साल पुराने ऐतिहासिक बारापुला पुल की विरासत पर खड़ा यह मार्ग आज आधुनिक यातायात की बड़ी जरूरत को पूरा कर रहा है। पर क्या आप इसका आधिकारिक नाम जानते हैं?

Barapullah Elevated Road Official Name

बारापुला एलिवेटेड रोड का ऑफिसियल नाम

Photo : PTI

Barapullah Official Name: राजधानी दिल्ली में एक से बढ़कर एक सड़क मार्ग और फ्लाईओवर हैं। पूर्वी दिल्ली, गाजियाबाद और नोएडा से बड़ी संख्या में वाहन चालक दक्षिणी दिल्ली की ओर जाने के लिए बारापुला एलिवेटेड रोड का इस्तेमाल करते हैं। यह मार्ग पूरी तरह सिग्नल-फ्री है, यानी बीच में कहीं भी रेड लाइट नहीं पड़ती। वाहन चालक सराय काले खां से इस फ्लाईओवर पर चढ़कर सीधे एम्स के पास उतर सकते हैं। सराय काले खां से एम्स तक बारापुला एलिवेटेड रोड की कुल लंबाई लगभग 6 किलोमीटर है। इसके अलावा, लाजपत नगर और लोधी रोड की दिशा में जाने वाले गाड़ियों की सुविधा के लिए बीच में चढ़ने और उतरने के लिए स्लिप रोड भी बनाई गई हैं। पर इसके बीच क्या आप बारापुल्ला एलिवेटेड रोड का आधिकारिक नाम जानते हैं? अगर नहीं तो आइए जानें।

Barapullah Bridge (Photo: Wikimedia Commons)

बारापुल्ला ब्रिज (फोटो: Wikimedia Commons)

क्या होता है बारापुला का मतलब?

लोकिन इससे पहले ये जानते हैं कि, इसका इतिहास क्या है? करीब 400 साल पहले बना बारापुला पुल 12 पायों (पियर) पर टिके मेहराबों के सहारे खड़ा है। उस दौर में इसे दूर से साफ दिखाई देने योग्य बनाने के लिए पुल के दोनों किनारों पर लगभग दो मीटर ऊंची, 12-12 मीटर लंबी मीनारें बनाई गई थीं। इन्हीं 12 पायों और दोनों ओर 12-12 मीनारों की वजह से इसका नाम ‘बारापुला’ पड़ा। इस ऐतिहासिक पुल की कुल लंबाई लगभग 195 मीटर और चौड़ाई 14 मीटर है। पूरा ढांचा पत्थरों से निर्मित है, जो इसकी मजबूती और प्राचीन स्थापत्य कला को दर्शाता है।

किसने करवाया था पुल का निर्माण?

इतिहासकारों का मानना है कि इस पुल का निर्माण मुगल सम्राट जहांगीर के शासनकाल में 1612–1613 के दौरान हुआ था। वहीं, एएसआई की एक पुस्तक में इसका निर्माण काल 1621–1622 के बीच बताया गया है। कहा जाता है कि बादशाह ने यह पुल हुमायूं का मकबरा, निजामुद्दीन दरगाह और आगरा की दिशा में आने-जाने की सुविधा के लिए बनवाया था। और आज इसी पुल के ऊपर बारापुला एलिवेटेड रोड मौजूद है।

Barapullah Elevated Road

बारापुला एलिवेटेड रोड

बारापुला एलिवेटेड रोड का आधिकारिक नाम

बारापुला एलिवेटेड रोड (Barapullah Elevated Road) का आधिकारिक नाम बाबा बंदा सिंह बहादुर सेतु है। वर्ष 2016 में दिल्ली सरकार ने इस एलिवेटेड कॉरिडोर का नाम औपचारिक रूप से बदलकर बाबा बंदा सिंह बहादुर सेतु (Baba Banda Singh Bahadur Setu) कर दिया था। फिलहाल इसके विस्तार कार्य पर भी काम जारी है। विस्तार पूरा होने के बाद मयूर विहार फेज-2 से सीधे एम्स तक पहुंचना संभव हो सकेगा। पूर्वी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली के बीच बेहतर संपर्क स्थापित करने के लक्ष्य से इस सड़क का निर्माण किया गया था।

बारापुला फेज-3 प्रोजेक्ट क्या है?

बारापुला फेज-3 प्रोजेक्ट दिल्ली में सराय काले खां से मयूर विहार को जोड़ने वाला लगभग 3.5 किलोमीटर लंबा सिग्नल-फ्री मार्ग है। इस परियोजना को अब वर्ष 2027 तक पूरा करने का संशोधित लक्ष्य निर्धारित किया गया है। करीब 1,653 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे इस कॉरिडोर के तैयार होने पर दक्षिणी और पूर्वी दिल्ली के बीच यात्रा समय में लगभग 20 मिनट की कमी आने की संभावना है। साथ ही, रिंग रोड पर ट्रैफिक दबाव कम होगा और जाम की समस्या में भी राहत मिलेगी।

Humayun's Tomb

हुमायूं का मकबरा

क्या-क्या है मौजूद आसपास?

जैसा की हमने बताया कि ये एलिवेटेड रोड पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार को दक्षिणी दिल्ली के सराय काले खां और आईएनए क्षेत्र से जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग है। इसके आसपास कई महत्वपूर्ण स्थल और व्यावसायिक केंद्र स्थित हैं। इस रास्ते के पास फेसम जगहों में हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन, हुमायूं का मकबरा, खान-ए-खाना का मकबरा, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, जंगपुरा और डीएनडी फ्लाईवे शामिल हैं। यह सड़क यमुना नदी के समानांतर (Parallel) गुजरती है और आश्रम चौक के आसपास होने वाले ट्रैफिक दबाव को कम करने में जरूरी भूमिका निभाती है।

कौन थे बाबा बंदा सिंह बहादुर?

बाबा बंदा सिंह बहादुर (1670–1716) सिख इतिहास के एक वीर योद्धा और खालसा सेना के पहले सैन्य कमांडर माने जाते हैं। उन्होंने मुगल शासन के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व किया। गुरु गोविंद सिंह के मार्गदर्शन से उन्होंने पंजाब क्षेत्र में सिखों की स्वतंत्र सत्ता की नींव रखी, सरहिंद पर विजय प्राप्त की और जमींदारी प्रथा खत्म कर किसानों को भूमि का अधिकार दिलाया। जून 1716 में दिल्ली में मुगल बादशाह फर्रुखसियर के हुक्म पर उन्हें उनके साथियों समेत यातनाएं दी गईं, जिससे अंत में उनकी मौत हो गई।

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 Nilesh Dwivedi
Nilesh Dwivedi author

निलेश द्विवेदी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में काम कर रहे हैं। वे शहरों से जुड़ी लोकल घटनाएं, क्राइम, राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यवार अप... और देखें

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