मुमताज को ताजमहल समेत तीन बार किया गया दफन
Taj Mahal - The Eternal Symbol of Love: उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में यमुना नदी के किनारे स्थित ताजमहल किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यह भव्य ऐतिहासिक स्मारक न केवल भारत की शान है, बल्कि दुनिया के 7 अजूबों में भी शुमार है। ताजमहल को मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी प्रिय बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था। इस कारण ताजमहल को मोहब्बत की निशानी भी कहा जाता है। मुमताज की मृत्यु से पहले शाहजहां ने उनसे वादा किया था कि उनकी याद में दुनिया का सबसे खूबसूरत मकबरा बनवाया जाएगा। शाहजहां का यही वादा आज ताजमहल के रूप में अमर हो गया। ताजमहल के अंदर शाहजहां और मुमताज दोनों की कब्रें हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि मुमताज महल को ताजमहल में दफनाने से पहले दो बार और दफनाया गया था। आइए जानते हैं, ताजमहल से पहले मुमताज को कहां और क्यों दफनाया गया था?
इतिहासकारों के अनुसार अर्जुमंद बानो बेगम उर्फ मुमताज महल मुगल बादशाह शाहजहां की 13वीं पत्नी थीं। शाहजहां के शासन संभालने के सिर्फ 4 साल के अंदर ही मुमताज का निधन हो गया था। कहा जाता है कि मुमताज बहुत खूबसूरत थीं। इतिहासकारों के अनुसार शाहजहां की कई बेगमों के बावजूद वे मुमताज से सबसे अधिक प्रेम करते थे। मुमताज न केवल उनकी प्रिय पत्नी थीं, बल्कि राज्य के महत्वपूर्ण कार्यों में भी उनका साथ देती थीं।
मुमताज महल की मौत अपने 14वें बच्चे को जन्म देते समय साल 1631 में हुई। इतिहासकारों के मुताबिक, करीब 30 घंटे की प्रसव पीड़ा से जूझने के बाद मुमताज ने 17 जून 1631 को अंतिम सांस ली। उस समय वे शाहजहां के साथ मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में थीं। मुमताज की मृत्यु के बाद उन्हें बुरहानपुर में ही ताप्ती नदी के किनारे एक सुंदर बगीचे में अस्थायी रूप से दफनाया गया था। प्रारंभ में शाहजहां ने यहीं स्थायी मकबरा बनवाने की योजना बनाई। लेकिन भूमि की स्थिति और नदी की दिशा अनुकूल न होने के कारण उन्हें इस विचार को छोड़ना पड़ा।
इतिहासकारों के अनुसार बुरहानपुर में दफनाए जाने के कुछ महीनों बाद शाहजहां के आदेश पर मुमताज के शव को बाहर निकाला गया। जिसके बाद शाहजहां के 15 वर्षीय बेटे शाह शुजा की देखरेख में मुमताज के पार्थिव शरीर को आगरा लाया गया। 8 जनवरी 1631 को दूसरी बार मुमताज को आगरा किले के पास यमुना नदी के किनारे दफन किया गया। लेकिन अभी भी शाहजहां का दिल बेचैन था, उन्हें मुमताज से किया हुआ अपना वादा पूरा करना था। इसके लिए उन्होंने दक्षिणी ईरान से भारत आए प्रसिद्ध वास्तुकार मुकम्मत खां जहांगीर को अपना निर्माण मंत्री नियुक्त किया। जहांगीर ने उन्हें यमुना के तट पर मुमताज की याद में एक भव्य मकबरा बनाने का आदेश दिया।
ताजमहल का निर्माण कार्य साल 1632 में शुरू हुआ था। जिसे पूरा होने में लगभग 22 साल का समय लगा। इसके निर्माण में लाल पत्थर, सफेद मार्बल, सोना, पीतल, नीलम, मोती, मकरानी पत्थर समेत अन्य कीमती रत्नों का इस्तेमाल हुआ था। 1653 में ताजमहल का निर्माण पूरा हुआ। उस समय इस भव्य इमारत को रऊजा-ए-मुनव्वरा कहा जाता था। लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर ताजमहल रख दिया गया। ताजमहल की मुख्य गुबंद के नीचे ही मुमताज की कब्र है। शाहजहां की मृत्यु के बाद उन्हें भी मुमताज की कब्र के पास दफन किया गया।