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बाजार जितना क्यों नहीं भागता आपका पोर्टफोलिया? दिग्गज निवेशक देविना मेहरा ने खोला राज

कई बार आपको लगता होगा कि आपके फंड या शेयर उस रफ्तार से नहीं भागते हैं, जिस रफ्तार से बाजार या इंडेक्स में तेजी आती है। इसे लेकर दिग्गज निवेशक देविना मेहरा ने बड़ा खुलासा किया है।

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बाजार में टिके रहना जरूरी

Market Vs Portfolio : शेयर बाजार ने पिछले दो दशक में निवेशकों को शानदार रिटर्न दिया है, लेकिन क्या आपके पोर्टफोलियो ने भी उतना ही कमाया है? अगर जवाब ‘नहीं’ है तो इसकी वजह जरूरी नहीं कि खराब शेयर या कमजोर फंड हो। दिग्गज निवेश व मार्केट एक्सपर्ट देविना मेहरा (Devina Mehra) के मुताबिक, असली समस्या निवेशक के व्यवहार में छिपी है। बाजार जब तेज भागता है, तब निवेशक पैसा लगाते हैं और जब गिरावट आती है, तो घबराकर पैसा निकाल लेते हैं। यही आदत लंबे समय में कंपाउंडिंग की सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है।

बाजार से पोर्टफोलियो का रिटर्न अलग क्यों?

देविना मेहरा ने इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश के लंबे समय के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताती हैं कि 2004 से निवेशकों के व्यवहार में एक पैटर्न लगातार दिखाई देता है। बाजार में तेजी आने के बाद म्यूचुअल फंड में पैसा तेजी से आता है। इसके उलट, जब बाजार गिरता है तो निवेशक डरकर निकासी बढ़ा देते हैं। यानी निवेश का फैसला अक्सर बाजार की वास्तविक स्थिति देखकर नहीं, बल्कि हाल के प्रदर्शन और उस समय की भावनाओं के आधार पर लिया जाता है। यही वजह है कि किसी इंडेक्स या अच्छे फंड का लंबे समय का रिटर्न देखकर निवेशक सोचता है कि उसे भी इतना फायदा होना चाहिए था, लेकिन वास्तविक पोर्टफोलियो रिटर्न काफी कम निकलता है।

2003-07 से कोरोना तक एक ही कहानी

यह व्यवहार किसी एक दौर तक सीमित नहीं रहा। 2003 से 2007 की बड़ी तेजी के दौरान निवेशकों ने बाजार के काफी ऊपर जाने के बाद पैसा लगाना शुरू किया। फिर वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान जब बाजार बुरी तरह टूटा, तो कई निवेशकों ने डर में अपना पैसा निकाल लिया। इसके बाद कोरोना महामारी के दौरान बाजार में तेज गिरावट आई। उस समय भी घबराहट बढ़ी और निवेशकों के लिए बाहर निकलने का दबाव बना। लेकिन इसके तुरंत बाद बाजार में आई तेज रिकवरी ने फिर साबित किया कि सबसे मुश्किल समय के दौरान निवेश से बाहर निकलना कितना महंगा पड़ सकता है। मेहरा का कहना है कि बाजार ने जो कुछ किया, निवेशकों ने उसे देखा जरूर, लेकिन जरूरी नहीं कि उनके पोर्टफोलियो ने उसका पूरा फायदा उठाया हो।

असली नुकसान ‘बाय हाई, सेल लो’ से

निवेश में सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ गलत शेयर खरीदने से नहीं होता। कई बार नुकसान का कारण सही निवेश को गलत समय पर बेचना होता है। जब बाजार में तेजी होती है तो निवेशक को आत्मविश्वास आता है। उसे लगता है कि बाजार और ऊपर जाएगा। नतीजा यह होता है कि वह ऊंचे स्तर पर निवेश बढ़ाता है। लेकिन जैसे ही गिरावट आती है, वही निवेशक डरने लगता है और घाटे में बेच देता है। इस तरह एक बेहद नुकसानदायक चक्र बन जाता है, जिसमें महंगे स्तर पर खरीदारी और सस्ते स्तर पर बिक्री से नुकसान होता रहता है।

कंपाउंडिंग को चाहिए समय

कंपाउंडिंग का फायदा तभी मिलता है, जब निवेश को पर्याप्त समय दिया जाए। शुरुआती कुछ वर्षों में रिटर्न सामान्य लग सकता है, लेकिन लंबी अवधि में रिटर्न पर मिलने वाला रिटर्न ही संपत्ति को तेजी से बढ़ाता है। यही कारण है कि इक्विटी निवेश में 10, 15 या या 20 साल का नजरिया ज्यादा अहम माना जाता है। बार-बार बाजार से बाहर निकलने पर निवेशक उन अवधियों को गंवा देता है, जब उसका पैसा सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ सकता था।

मेहरा ने अमेरिकी बाजार का उदाहरण देते हुए बताया कि दुनिया के सबसे सफल म्यूचुअल फंडों में शामिल फंडों के निवेशकों ने भी कई बार कमजोर रिटर्न हासिल किया, क्योंकि उन्होंने गलत समय पर निवेश किया या घबराकर बाहर निकल गए। समस्या फंड की नहीं, निवेशक की टाइमिंग की थी।

जब डर कहे ‘बेच दो’, तब क्या करें?

बाजार में गिरावट के दौरान सबसे बड़ी चुनौती आंकड़े नहीं, मनोविज्ञान होता है। पोर्टफोलियो में लाल निशान बढ़ते हैं, तो निवेशक को लगता है कि नुकसान और बढ़ सकता है। ऐसे समय में बेच देना मानसिक तौर पर आसान फैसला लगता है। लेकिन यही वह समय हो सकता है जब निवेश में अनुशासन सबसे ज्यादा जरूरी हो। मेहरा के संदेश का मूल यही है कि बाजार की हर गिरावट को बाहर निकलने का संकेत मानना गलत हो सकता है। लंबे समय के निवेशक के लिए अस्थिरता प्रक्रिया का हिस्सा है। हर गिरावट भविष्य की स्थायी गिरावट नहीं होती और हर तेजी हमेशा जारी नहीं रहती।

बाजार को हराना नहीं, बाजार में बने रहना जरूरी

देविना मेहरा सबसे ज्यादा जोर इस बात पर देती हैं कि निवेश में सबसे कठिन काम सही शेयर ढूंढना नहीं, लंबे समय तक उस शेयर में टिके रहना है।

भारतीय इक्विटी बाजार ने लंबी अवधि में कंपाउंडिंग का मौका दिया है, लेकिन उस मौके का फायदा उठाने के लिए निवेशक का पैसा बाजार में मौजूद भी होना चाहिए। जो निवेशक हर तेजी के बाद उत्साहित होकर खरीदता है और हर गिरावट में डरकर बेचता है, उसके लिए बाजार का शानदार प्रदर्शन भी सीमित फायदा ही पैदा करता है।

डिस्क्लेमर: TIMES NOW नवभारत किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ या कमोडिटी में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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