सड़क पर चलते समय आपने ध्यान दिया होगा कि गाड़ी या बाइक की हेडलाइट आमतौर पर सफेद, ब्रेक लाइट लाल और इंडिकेटर पीले या नारंगी रंग का होता है। इन सभी रंगों का अपना अलग काम है। इंडिकेटर का इस्तेमाल दूसरे वाहन चालकों को यह बताने के लिए किया जाता है कि आप दाएं या बाएं मुड़ने वाले हैं। इसका पीला-नारंगी रंग सिर्फ डिजाइन के लिए नहीं चुना गया है, बल्कि इसके पीछे सड़क सुरक्षा और नियमों से जुड़ी वजहें हैं।
1. दूर से आसानी से दिखाई देता है पीला रंग
इंडिकेटर के पीले या एम्बर रंग का एक बड़ा फायदा यह है कि यह सड़क पर दूसरे वाहनों और आसपास की रोशनी के बीच अलग नजर आता है। दिन हो या रात, इसका लगातार जलना और बुझना दूसरे ड्राइवर का ध्यान खींचता है। धूल, हल्की धुंध और खराब मौसम में भी रंग का यह अंतर संकेत पहचानने में मदद कर सकता है। हालांकि, बहुत घने कोहरे या खराब दृश्यता में कोई भी लाइट पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं देती।
2. ब्रेक लाइट और इंडिकेटर में फर्क समझना आसान
गाड़ियों में लाल रंग का इस्तेमाल मुख्य रूप से पीछे की ब्रेक लाइट में होता है। जब ड्राइवर ब्रेक लगाता है, तो पीछे चल रहे व्यक्ति को लाल रोशनी से संकेत मिलता है कि गाड़ी धीमी हो रही है या रुक रही है। वहीं, पीला इंडिकेटर बताता है कि वाहन दाएं या बाएं मुड़ सकता है। अगर दोनों संकेत एक जैसे रंग के हों, तो उन्हें पहचानने में भ्रम हो सकता है। अलग-अलग रंग होने से सड़क पर चलने वाले लोगों को वाहन की अगली गतिविधि समझने में मदद मिलती है।
3. भारत में भी हैं इसके नियम
भारत में सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स के नियम 102 के तहत दिशा बताने वाले इंडिकेटर के लिए एम्बर यानी पीला-नारंगी रंग निर्धारित किया गया है। नियमों में यह भी बताया गया है कि इंडिकेटर की रोशनी आगे और पीछे से साफ दिखाई देनी चाहिए। इसके फ्लैश होने की गति भी निर्धारित है। सामान्य तौर पर यह एक मिनट में 60 से 120 बार तक चमकता है। इन नियमों का उद्देश्य सड़क पर संकेतों को स्पष्ट और समझने योग्य बनाना है।
4. इंडिकेटर का सही इस्तेमाल भी जरूरी
सिर्फ पीले रंग का इंडिकेटर होना ही पर्याप्त नहीं है। ड्राइवर को मुड़ने से पहले सही समय पर इंडिकेटर चालू करना चाहिए, ताकि पीछे या बगल से आने वाले वाहन को संकेत मिल सके। मोड़ पूरा होने के बाद इंडिकेटर बंद करना भी जरूरी है। अगर इंडिकेटर खराब है या उसकी रोशनी साफ नहीं दिख रही, तो उसे ठीक करवाना चाहिए।
