Tax News : देश की सर्वोच्च अदालत ने टैक्स मामलों से जुड़े एक महत्वपूर्ण विवाद पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने साल 1974 के एक पुराने संविधान पीठ के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है कि राज्यों के पास मौजूदा बिक्री कर (Sales Tax) के प्रतिशत के आधार पर अतिरिक्त बिक्री कर या अधिभार (Surcharge) लगाने की पूरी कानूनी शक्ति है। अदालत ने साफ किया है कि इस तरह का चार्ज किसी कारोबारी की आय पर अलग से लगाया जाने वाला टैक्स नहीं है, बल्कि इसे सीधे तौर पर बिक्री कर की दर में हुई वृद्धि ही माना जाएगा।
क्या था पूरा मामला और किसकी याचिका पर आया फैसला?
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक यह पूरा कानूनी विवाद 'अर्जुन फ्लोर मिल्स' के नेतृत्व में दायर की गई कई अपीलों से जुड़ा हुआ था। इन अपीलों के माध्यम से मुख्य रूप से उड़ीसा बिक्री कर अधिनियम, 1947 और पंजाब सामान्य बिक्री कर अधिनियम, 1948 के कुछ चुनिंदा प्रावधानों को चुनौती दी गई थी। इन पुराने कानूनों के तहत उन कारोबारियों पर, जिनका कारोबार एक तय सीमा को पार कर जाता था, कुल देय बिक्री कर का 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स के रूप में वसूला जाता था। करदाताओं और व्यापारियों की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया था कि पहले से ही तय और देय कर के आधार पर अतिरिक्त टैक्स वसूलना एक तरह से 'कर पर कर' (Tax on Tax) लगाने जैसा है। उनका यह भी कहना था कि संविधान के प्रावधानों के तहत राज्य विधानसभाओं के पास इस प्रकार का अतिरिक्त टैक्स लगाने का अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की सात-सदस्यीय संविधान पीठ का फैसला
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 7-सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले पर 47 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि करीब 27 साल पहले विचार के लिए भेजे गए इस कानूनी सवाल पर अब अलग से कोई नया फैसला सुनाने या विचार करने की जरुरत नहीं है, क्योंकि इस पर कानूनी स्थिति साल 1974 में ही पूरी तरह स्पष्ट कर दी गई थी। इसके अलावा, देश की टैक्स व्यवस्था में समय के साथ बड़े बदलाव आ चुके हैं और अब पूरे देश में वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था लागू हो चुकी है।
फैसले में विशेष रूप से उल्लेख किया गया कि 'एस कोडार बनाम केरल राज्य' मामले में 1974 की संविधान पीठ ने यह बात बिल्कुल साफ कर दी थी कि देय बिक्री कर के प्रतिशत के आधार पर गणना किया जाने वाला कोई भी अतिरिक्त टैक्स या अधिभार असल में बिक्री कर की दर में हुई बढ़ोतरी ही है। यह संविधान की 7वीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि (Entry) 54 के तहत वस्तुओं की बिक्री या खरीद पर लगाया जाने वाला टैक्स है। अदालत ने कहा कि वह पुराना फैसला आज भी पूरी तरह प्रभावी और वैध है।
टैक्स का विषय और गणना का आधार दो अलग बातें
व्यापारियों और करदाताओं की दलीलों को खारिज करते हुए संविधान पीठ ने बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि 'कर का विषय' (Subject Matter of Tax) और 'उसकी गणना का आधार' (Basis of Calculation) ये दोनों बिल्कुल अलग-अलग चीजें हैं। अधिभार की गणना भले ही देय बिक्री कर की राशि के किसी तय प्रतिशत के आधार पर की जाती हो, लेकिन मात्र इस वजह से उस कर का मूल स्वरूप नहीं बदल जाता। वह कानूनी रूप से वस्तुओं की बिक्री या खरीद पर ही लगाया जाने वाला टैक्स बना रहता है। इस पीठ में शामिल न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन ने भी मुख्य फैसले से पूरी सहमति जताई और एक अलग फैसला सुनाते हुए यह रेखांकित किया कि एस कोडार मामले में दिया गया निर्णय पूरी तरह सही था और उस पर किसी प्रकार के पुनर्विचार की कोई जरुरत नहीं है।
जीएसटी लागू होने के बाद बदला टैक्स का ढांचा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी जोड़ा कि संविधान के 101वें संशोधन के बाद देश में जीएसटी व्यवस्था के लागू होने से केंद्र और राज्य सरकारों के बीच टैक्स लगाने की शक्तियों के बंटवारे में बहुत व्यापक बदलाव आ चुके हैं। जिन पुराने राज्य कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों के तहत यह विवादित अतिरिक्त टैक्स लगाए गए थे, उनकी जगह समय के साथ पहले 'वैट' (VAT) और बाद में जीएसटी व्यवस्था ने ले ली है। यही वजह है कि अब इन पुराने कानूनी सवालों का भविष्य में कोई बड़ा व्यावहारिक या प्रभावकारी महत्व नहीं बचा है, फिर भी कानूनी स्थिति को हमेशा के लिए साफ कर दिया गया है।
